Sunday, July 12, 2026

श्रीराम का खर को फटकारना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्


अरण्यकाण्डम्


एकोनत्रिंश: सर्ग:  

श्रीराम का खर को फटकारना तथा खर का भी उन्हें 

कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदा का प्रहार करना 

और श्रीराम द्वारा उस गदा का खंडन 


रथहीन जब देखा खर को, श्रीराम ने उससे वचन कहे

पहले मृदु फिर कठोर शब्द में, राम उस राक्षस से बोले 


असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का, आश्रय ले अभिमान किया 

तू क्रूर व पापाचारी है, लोक विरोधी हर कर्म किया 


जो ऐसा क्रूर कर्मी है, चाहे हो त्रिलोकी का ईश्वर 

अधिक काल नहीं टिक सकता, कर्मों के फल से वह बचकर    


जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी अभिलाषा काम है 

प्राप्त वस्तु और भी मिल जाये, इसको ही कहते लोभ हैं 


काम व लोभ के वश होकर, जो भी पाप कर्म करता है 

नहीं देखे उसका परिणाम, उल्टा हर्ष अनुभव करता है


होता है उसका विनाश भी, ज्यों रक्त पुच्छिका का होता 

ओले खा लेती है जब वह, विष सरिस परिणाम तब होता 


दण्डकारण्य में रहने वाले, जो तपस्या में लीन थे 

उन मुनियों की हत्या करके, कैसे फल तुझे अभिप्रेत थे 


जिनकी जड़ें खोखली हो गयीं, अधिक काल वे तरु न रहते 

पापी, लोक निन्दित पुरुष भी, चिरकाल तक जीवित न रहते 


ऋतु आने पर फूल उगते हैं, जैसे वृक्षों पर स्वयं ही 

पापकर्म का दंड मिलता है, पापी पुरुष को अवश्य ही 


जैसे विष मिश्रित अनाज  का, खाने पर तुरंत फल मिलता 

उसी प्रकार लोक में किए, पापकर्मों का फल भी मिलता 


जगत का बुरा चाहने वाला, घोर कर्म में जो लगा है 

उसे प्राण दंड देने हेतु, राजा दशरथ ने भेजा है 


मेरे छोड़े हुए ये बाण, सर्प की भाँति जो निकलेंगे  

तेरे तन को कर विदीर्ण ये,  सीधे पाताल में गिरेंगे



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