Monday, April 20, 2026

श्रीराम का राक्षसों के वध के निमित्त की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

दशम: सर्ग:


श्रीराम का ऋषियों की रक्षा के लिए राक्षसों के वध के निमित्त

की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार प्रकट करना 


सीता की वह बात सुनी जब, ऐसे उत्तर दिया राम ने 

तुम्हें मुझसे अतीव स्नेह है, वचन हितैषी तभी कहा है 


क्षत्रियों के कुलधर्म विषय में, जो भी कहा योग्य तुम्हारे 

यदि कोई प्राणी पीड़ित, क्षत्रिय उसे पीड़ा से उबारे 


दण्डकारण्य के निवासी, मुनिजन राक्षसों से पीड़ित हैं 

खुद आकर कही निज पीड़ा, वे मेरे शरणागत हुए हैं 


कठोर व्रतों का पालन करते, फल-मूल खाकर रहते हैं 

मांसाहारी राक्षस उनको, मार जान से खा जाते हैं 


उनके मुख से बाहर आयी, रक्षा की पुकार को सुनकर 

स्वयं मैंने यह पूछा, कैसे, कर सकता आपका हितकर 


उनका मनोभाव तभी प्रकटा, रक्षा करें हमारी आप

अग्निहोत्र समय आने पर, बन जाते वे राक्षस अभिशाप 


तपस्या के प्रभाव से हम सभी, वध उनका कर सकते हैं 

किंतु न चाहें तप का खंडन, तप में सदा विघ्न आते हैं 


ऋषियों की पुकार सुनी जब, रक्षा की प्रतिज्ञा ली मैंने 

जीते जी अब नहीं त्यागूँगा, सत्य पालन सदा प्रिय मुझे 


अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, लक्ष्मण तथा तुम्हें तज सकता 

ब्राह्मणों के लिए की प्रतिज्ञा, किंतु नहीं छोड़ मैं सकता   


उनके कहे बिना ही मेरा,  कर्त्तव्य, सदा उनकी रक्षा

अब खुद आकर वे कह रहे, तब मुँह कैसे मैं मोड़ सकता 


सीते ! तुमने स्नेह, प्रेम वश, जो मुझसे यह बात कही है 

सुनकर मैं अति संतुष्ट हुआ, प्रिय का यह कहना संभव है 


कथन पूर्णतया योग्य तुम्हारे, कुल के भी सर्वथा अनुसार

तुम सह धर्मिणी हो मेरी, प्रिय हो प्राणों से सदा बढ़ कर 


ऐसा कह महात्मा राम, मिथिलेश कुमारी प्रिय सीता से 

धनुष हाथ में पकड़, रमणीय, उस वन में विचरण करते थे 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ। 



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