Friday, June 10, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद



तृतीय अध्याय (अंतिम भाग )
( कर्म योग )
किन्तु न मानें मेरे मत को, जो जन दोष निकाला करते
मोहित हुए अज्ञानीजन वे, दुःख को प्राप्त हुआ करते

प्रकृति के अनुसार वर्तते, परवश हुए स्वभाव के अपने
ज्ञानवान भी नहीं बचे हैं, प्रकृति किसी का हठ न माने

इन्द्रियों में ही छिपे हुए हैं, राग-द्वेष ये दोनों शत्रु
जो न हो उनके वश में, वह कल्याण का पाता हेतु  

निज धर्म में मृत्यु श्रेयस्कर, पर धर्म है भयकारी
चाहे कितना ही श्रेष्ठ हो, परधर्म न हितकारी

अर्जुन बोले हे केशव, यह पाप कौन करवाता है
न चाहते हुए भी मानव, क्यों इसमें फँस जाता है

काम, क्रोध ये दो शत्रु हैं, रजोगुण से जो उत्पन्न
नहीं तृप्ति होती है इनकी, कितना ही कोई करे जतन

जैसे ढकी धूल से अग्नि, दर्पण मैल से आच्छादित
गर्भ ढका है ज्यों जेर से, ज्ञान ढका काम से बाधित

जैसे अग्नि तृप्त न होती, डालें ईंधन पर ईंधन
ऐसे ही यह बढ़ता जाता, ढके हुए ज्ञान निशदिन

इन्द्रियों, मन बुद्धि में रहता, इनके ही द्वारा सेवित
मोहित करता जीवात्मा को, ज्ञान हो रहा इससे बाधित

वश में कर इन्द्रियों को तू, हे पार्थ ! मुक्त हो जा
ज्ञान-विज्ञान का नाश करें जो, डालें तुझे पाश मोह का

देह से परे सूक्ष्म इन्द्रियां, मन बलवान है इनसे
मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि, आत्मा श्रेष्ठ है सबसे

इसी आत्मा को पाकर तू, मन, बुद्धि वश में कर ले
मन के पीछे चलें इन्द्रियां, तू पराजित काम कर ले   

Tuesday, June 7, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


तृतीय अध्याय (शेष भाग)
(कर्म योग) 
नरश्रेष्ठ जो आत्मा रामी, तृप्त सदा आत्मा में है
कर्तव्य न शेष रहा कुछ, जो संतुष्ट आत्मा में है

 कर्म करे या त्याग कर्म दे, उसका कोई स्वार्थ नहीं
हुआ मुक्त वह संबंधों से, उसका कोई परार्थ नहीं

तज आसक्ति कर्म किये जा, परम आत्मा को पायेगा
पायी जनक ने सिद्धि जिससे, लोकसंग्रह जब अपनाएगा

श्रेष्ठ पुरुष जैसा वरतेंगे, जन उसको आदर्श बनाते
वह प्रमाण खड़ा करता है, जन साधारण अपनाते

केशव बोले सारे जग में, मुझे न कोई कर्त्तव्य है
कुछ भी नहीं अप्राप्त मुझे, फिर भी नहीं अकर्त्तव्य है

यदि कर्म त्याग दूँ मैं भी, हानि होगी बड़ी अपार
नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ प्रजाएँ, होगा नष्ट सृष्टि संसार

जैसे अज्ञानी जन करते, आसक्ति वश कर्मों को
ज्ञानी जन तज आसक्ति, नहीं त्यागते कर्मों को

ज्ञानी स्वयं भी कर्म करे, औरों से भी करवाए
दृढ़ कर दे श्रद्धा उनकी, कर्म न उनसे छुडवाए

प्रकृति के गुण कर्म कर रहे, किन्तु अहंकारी न माने
मैं करता हूँ, मैंने किया है, ऐसा अज्ञानी माने

गुण विभाग और कर्म विभाग का, तत्व जानता जो ज्ञानी
कर्म हो रहे गुणों के द्वारा, स्वयं अलिप्त रहे ज्ञानी

किन्तु गुणों से जो मोहित हैं, उनको न विचलित करते
जो आसक्त अभी कर्मों से, उनको वे करने देते

मुझमें चित्त लगा तू अर्जुन, मैं अन्तर्यामी, ईश, नियंता
तज ममता और आसक्ति, तज संताप युद्ध में लग जा

जो अन्यों में दोष न देखे, श्रद्धापूर्ण हृदय वाला
कर्मों के बंधन से छूटे, इस मत पर चलने वाला
 क्रमशः

Monday, June 6, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद






तृतीय अध्याय
(कर्म योग )

अर्जुन बोले पुनः कृष्ण से, कर्मयोग से श्रेष्ठ ज्ञान है
घोर कर्म युद्ध का जिसमें, लगना भी तो अज्ञान है

श्रेष्ठतम ही कहिये मुझसे, जिससे हो मेरा कल्याण
मिले हुए वचनों को सुनकर, हो मोहित मैं हूँ हैरान

दो ही मार्ग प्रमुख हैं जग में, केशव ने समझाया
ज्ञान योग व कर्म योग, दोनों को ही बतलाया

कर्मों का आरम्भ न हो तो, निष्कर्मता प्राप्त न होगी
न कर्मों के त्याग से केवल, ज्ञान की ज्योति जलेगी

क्षण भर को भी कर्म के बिना, कोई न रह पाता
प्रकृतिस्थ गुणों के द्वारा, बाध्य उसे किया जाता

हठपूर्वक बैठ गया जो, ऊपर से ही है त्यागी
मन से चिंतन हो विषयों का, कहलाता वह दम्भी

मन से जिसने त्याग दिया हो, आसक्ति जिसकी छूटी
वह भी जग में कर्म करेगा, वही श्रेष्ठ कर्मयोगी

कर्म है उत्तम, कर्म बिना, तन का भी निर्वाह न होगा
यज्ञ के हेतु कर्म किये जा, तज आसक्ति, नहीं बंधेगा

कल्प के आदि में ब्रह्मा ने, यज्ञ सहित रची प्रजाएँ
यज्ञ कर्म से भोग मिलें, इससे ही जन वृद्धि पाएँ

देव समर्पित कर्म यदि हों, देवों का आशीष मिले
एक दूसरे को उन्नत कर, मानव का समुदाय खिले

बिन माँगे ही भोग मिलें, इच्छाएँ सब होंगी पूर्ण
किन्तु कहाएगा वह चोर, जो न करे देव अर्पण

शेष यज्ञ से बचा जो खाते, श्रेष्ठ वही कहलाते हैं
मुक्त हुए वे सब पापों से, किन्तु शेष पाप खाते हैं

अन्न से उपजा करते प्राणी, अन्न उपजता है वृष्टि से
यज्ञ किये से होती वृष्टि, यज्ञ पूर्ण होता कर्मों से

कर्म वेद से उत्पन्न होते, वेद परम ईश से उपजे
अतः अक्षर वह परम आत्मा, सदा प्रतिष्ठित है यज्ञ में

जो इस क्रम को नहीं मानता, कर्तव्य से विमुख हो गया

केवल भोगों में जो रत है, जीवन उसका व्यर्थ ही गया 

Friday, June 3, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद




 द्वितीय अध्याय (अंतिम भाग)
( सांख्य योग)
सदा विरागी, समता धारे, विषयों से जो दूर रहे
आसक्ति भी नष्ट हो गयी, जिसके उर में शांति बहे  

जो केवल रोके ऊपर से, भीतर संयम न धारे
ऐसे आसक्त बुद्धिमान भी, गए इन्द्रियों से हारे

विषयों का चिंतन जो करता, अंतर में कामना जगती
पूर्ण कामना हो न यदि, क्रोधाग्नि जलाने लगती

क्रोध मूढ़ता से भर देता, स्मृति भुला देती मूढ़ता
विस्मृति से नाश बुद्धि का, जिससे महा पतन होता

जिसका अंतर वश में अपने, जो राग-द्वेष से रहे मुक्त
अन्तःकरण प्रफ्फुलित उसका, हो जाते सारे दुःख नष्ट

जो न जीत सका है मन को, स्थिर बुद्धि नहीं है जिसकी
वह भावनाहीन अशांत है, सुख की नहीं प्रतीति उसकी

जैसे नाव हरी जाती है, वायु के झोंके के बल से
बुद्धि भी हर ली जाती है, मन-इन्द्रियों के छल से

जब सब प्राणी सो जाते हैं, रहे जागता वह तपस्वी
जग जब इतर सुखों में रत हो, सोया रहता वह मनस्वी

, नदियाँ जल भर-भर लातीं पर, सागर जैसे सदा अविचलित
सारे भोग समाते मन में, स्थितप्रज्ञ रहे अकम्पित

यही ब्रह्म को प्राप्त हुए की, स्थिति ब्राह्मी कही जाती
ब्रह्मानंद को प्राप्त हुआ वह, गति उसकी उन्नत होती 

Thursday, June 2, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


द्वितीय अध्याय (शेष भाग)

(सांख्य योग )


देह आत्मा का विवरण, जो सांख्य शास्त्र अनुसार कहा
अब सुन कर्म योग की चर्चा, बंधन से जो दे छुड़ा

निश्चल कर बुद्धि को अपनी, एक लक्ष्य पर इसे लगा
सत्व, रज, तम तीनों को तज दे, निर्द्वन्द्व, समचित्त हो जा

सुख-दुःख, लाभ-हानि को तजकर, कर युद्ध तू होकर निर्भय
पाप का भागी न होगा तू, चला बाण पाकर अभय

कर कामना रहित युद्ध तू, एक निष्ठ हो, रत हो जा
कर्मों के बंधन न होंगें, मुझसे यह आश्वासन पा

कर्मयोग है अद्भुत जिसमें, होता कुछ भी नाश नहीं
कर्म नहीं बंधते जिससे, जन्म-मरण की फांस नहीं

कर्मफलों हित जो नित रत हैं, स्थितप्रज्ञ न हो पाते
इधर-उधर ही डोला करते, अविवेकी ही कहलाते

भोग, स्वर्ग ही प्राप्य हैं जिनके, नाना कर्म किया करते
सुख के पीछे दौड़ा करते, एक निश्चय न कर पाते

अनासक्त हो जा तू अर्जुन, हर्ष-शोक द्वंद्वों से मुक्त
योग-क्षेम की तज आकांक्षा, नित्य रह योग में युक्त

पूर्ण जलाशय पाकर कोई, ताल तलैया नहीं खोजता
एक ब्रह्म को जाना जिसने, फल की वांछा न करता

कर्मों में अधिकार है तेरा, फल तो तेरे हाथ नहीं
एक निष्ठ हो कर्म किये जा, इसमें कोई प्रमाद नहीं

सम बुद्धि ही बुद्धियोग है, यही कर्मयोग कहलाये
पाप-पुण्य से परे रहेगा, तू योग में टिक जाये

मोह दलदल से उबर गया, तो वैराग्य फलित होगा
परम तत्व में स्थिर होकर, नित्य परमसुख पायेगा

अर्जुन सुन केशव की वाणी, स्थिर बुद्धि होना चाहे
लक्षण पूछे ऐसे जन के भय, क्रोध जिसे न सताए

स्थितप्रज्ञ का वर्णन तब, लगे कृष्ण, पार्थ से कहने
आत्मा में संतुष्ट हुआ जो, त्याग दी कामना जिसने

सुख की चाह नहीं करता, वह दुःख से न घबराता है
मन है अपने वश में जिसका, शांति वही नर पाता है

निस्वार्थ हो जग में विचरे, तज ममता और अहंकार
बुद्धियोग पा लेता वह फिर, छू न पाता उसे विकार

क्रमशः
  





Monday, May 30, 2011

भगवदगीता का भावानुवाद


द्वितीय अध्याय
(सांख्य योग )
कृष्ण कह उठे तब अर्जुन से, मोह ग्रस्त तू क्यों होता है ?
ऐसा विकट काल आया है, हे पार्थ ! तू क्यों रोता है ?

है मोह सदा ही दुखदायी, अपकीर्ति बढ़ाने वाला 
तज कायरता और मूढ़ता, है मोह गिराने वाला

किन्तु मोह अर्जुन का भारी, सीख अनसुनी कर दी
कहा न शस्त्र उठाऊंगा मैं, भीख मांग कर लूँगा जी

मैं निहत्था ही खड़ा रहूँगा, वार झेलने सब उनके
राज्य सुख के लोभ में आकर, हरने चला प्राण जिनके

 भ्रमित हो गया है मन मेरा, धर्म-अधर्म नहीं सूझता
हे केशव ! राह दिखाओ, बुद्धि को कुछ नहीं बूझता

कृष्ण देख हालत अर्जुन की, मन ही मन कुछ मुस्काए
शोक अविद्या के कारण है, आत्म ज्ञान ही हर पाए

 शांत भाव ले उर में बोले, सदा से हैं हम सदा रहेंगे
ये राजा, ये सारी सेना, बार बार यहाँ जन्मेंगे

न जीवित ही न मृत प्राणी, शोक का कारण बन सकते
जिन्हें आत्मा का ज्ञान है, वे न कभी चिंतित होते

जीवन-मृत्यू भ्रम हैं दोनों, मरता नहीं है कभी आत्मा
देह बदलता है जीव पर, सदा शाश्वत है आत्मा

जैसे कोई वस्त्र बदलता, देही देह बदल लेता है
जीर्ण-शीर्ण तन तज के प्राणी, नूतन तन धर लेता है

असत की सत्ता ही न मानो, सत का तो अभाव नहीं
व्याप रही जो सत आत्मा, असत तन में नाश नहीं

है अजन्मा, अविनाशी यह. नित्य शाश्वत सदा आत्मा
नाश देह का, पर रहता है, सदा अमर यह मुक्त आत्मा

शस्त्र काट न सकें रूह को, जला नहीं सकती अग्नि
पवन सुखा न पाए इसको, जल से भीग नहीं सकती 

मन-इन्द्रियां, सुख-दुःख पाते, सहना सीख समान भाव से  
कितने ही हों, हैं अनित्य ये, अविनाशी तू आत्मभाव से

जनम से पहले कहाँ छिपा था, बाद मृत्यु के कहाँ रहेगा
मध्य काल में ही गोचर जो, कौन उसे फिर सत्य कहेगा

मृत्यु हुई तो स्वर्ग मिलेगा, विजय हुई राज्य सुख पाए
कायर बन यदि युद्ध से भागा, अपकीर्ति ही हाथ में आये

क्रमशः

Friday, May 27, 2011

भगवदगीता का भावानुवाद


श्रीमद्भगवद्गीता
प्रथम अध्याय
(अर्जुनविषादयोग)
जब कौरव-पांडव चले युद्ध को, धृतराष्ट्र संजय से बोले
 कुरुक्षेत्र उस धर्मक्षेत्र में, क्या किया फिर उन दोनों ने

संजय ने वार्ता बढ़ाई
दिव्य दृष्टि थी उसने पायी,
दुर्योधन, द्रोण से बोला  
वीरों की संख्या गिनाई !

भीष्म हमारे रक्षक वीर, भीम शत्रुओं के नेता हैं
ग्यारह अक्षौहिणी निज सेना, मात्र सात विपक्ष में हैं

शंख बजे, बजे नगाड़े
रणभेरी सुन सब थर्राए,
हुआ भयंकर नाद जब
गोमुख व दमामे बजाए !

श्रीकृष्ण का रथ अद्भुत, मणियों से खंचित है
मेघों की आवाज करे, श्वेत अश्व सज्जित हैं

सुंदर ग्रीवा कर्ण लाल हैं
पैरों में स्वर्ण नुपुर,
बजा रहे निज शंख अनोखा
कृष्ण विराजे रथ ऊपर !

‘पांचजन्य’ शंख कृष्ण का, ‘देवदत्त’ वीर अर्जुन का,
भीमसेन का ‘पौण्ड्र’ कहाए, ‘अनंतविजय’ धर्मराज का !

अर्जुन बोला तब केशव से,
मध्य में ले चलो मुझे,
कौन-कौन हैं जरा देख लूँ
 प्राणों का भय नहीं जिन्हें !

कृष्ण हांकते रथ हौले से, ले आये ठीक मध्य में
भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, प्रिय अति, मातुल दिखे

था अति कोमल उर अर्जुन का,
कांप उठा जो लख अपनों को,
बहा स्वेद, अंतर अकुलाया,
बोला उसने तब केशव को !

नहीं चाहिए राज्य मुझे, विजय भी नहीं चाहता हूँ,
परिजनों का करके वध मैं, स्वर्ग भी नहीं मांगता हूँ

माना ये दोषी हैं हमारे
दुःख दारुण बहुत दिये हैं,
माना पाप किया इन्होंने,
कष्ट हमने बहुत सहे हैं !

लेकिन ये अपने हैं फिर भी, क्यों पाप कमाऊँ इन्हें मार
तज कर धनुष-बाण अर्जुन, जा बैठा पीछे रथ में हार ! 


अनिता निहालानी
२७ २०११