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Saturday, June 11, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


चतुर्थ अध्याय
(ज्ञानकर्मसन्यासयोग)

कल्प आदि में दिया सूर्य को, यह अविनाशी ज्ञान, योग का
सूर्य से पहुँचा पुत्र मनु तक, मनु से इक्ष्वाकु तक पहुँचा

परंपरा से चला योग यह, कुछ पीढ़ी तक रहा जागृत
लुप्त हो गया फिर पृथ्वी से, आज पुनः कर रहा अनावृत

तू है मेरा भक्त व सखा, अति प्रिय, मुझे है प्यारा
वही पुरातन योग कह रहा, अति उत्तम रहस्य यह न्यारा

अर्जुन ने झट प्रश्न किया, केशव ! तुम तो अब जन्मे हो
जन्म सूर्य का अति पुराना, कैसे कहूँ, तुम सत्य हो

तेरे व मेरे तो अब तक, जन्म हो चुके हैं अनंत
मै जानता, तू न जाने, इसीलिए तू है संतप्त

मै अजन्मा, अविनाशी हूँ, ईश्वर हूँ इस जग का
ले आश्रय योगमाया का, वेश धरा करता नर का

जब-जब धर्म की होती हानि, बढ़ता जाता है अधर्म
तब-तब मैं प्रकट होता हूँ, बन मानव निभाता धर्म

सज्जनों की बढ़ती हो जग में, दुर्जन न फल-फूलने पाएँ
युग-युग में आता हूँ जिससे, धर्म पताका  लहराए

मेरे जन्म-मरण दिव्य हैं, जो इस तत्व को जान सके
वह जीते जी मुक्त हो गया, वह नर ही मुझको पा सके

राग, भय व क्रोध मिटाकर, भक्त हुए मेरे कितने
प्रेमपूर्वक भजकर मुझको, ज्ञानी जन पा सके मुझे

जो मुझको जैसे भजता है, मै भी उसको वैसे चाहूँ
सभी अनुसरण करते मेरा, मैं ही उनको नाच नचाऊँ

जो कर्मों के फल में उत्सुक, वे देवों का पूजन करते
देव शीघ्र ही फल दे देते, जो न भक्ति, ज्ञान चाहते

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, ये चार वर्ण मैंने ही बनाये
इतने पर भी जान अकर्ता, सृष्टिक्रम मैंने ही चलाए

कर्मों का फल नहीं चाहता, कर्मों से होता नहीं लिप्त
जो तत्व से जाने मुझको, वह भी रहता सदा अलिप्त 

Thursday, June 2, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


द्वितीय अध्याय (शेष भाग)

(सांख्य योग )


देह आत्मा का विवरण, जो सांख्य शास्त्र अनुसार कहा
अब सुन कर्म योग की चर्चा, बंधन से जो दे छुड़ा

निश्चल कर बुद्धि को अपनी, एक लक्ष्य पर इसे लगा
सत्व, रज, तम तीनों को तज दे, निर्द्वन्द्व, समचित्त हो जा

सुख-दुःख, लाभ-हानि को तजकर, कर युद्ध तू होकर निर्भय
पाप का भागी न होगा तू, चला बाण पाकर अभय

कर कामना रहित युद्ध तू, एक निष्ठ हो, रत हो जा
कर्मों के बंधन न होंगें, मुझसे यह आश्वासन पा

कर्मयोग है अद्भुत जिसमें, होता कुछ भी नाश नहीं
कर्म नहीं बंधते जिससे, जन्म-मरण की फांस नहीं

कर्मफलों हित जो नित रत हैं, स्थितप्रज्ञ न हो पाते
इधर-उधर ही डोला करते, अविवेकी ही कहलाते

भोग, स्वर्ग ही प्राप्य हैं जिनके, नाना कर्म किया करते
सुख के पीछे दौड़ा करते, एक निश्चय न कर पाते

अनासक्त हो जा तू अर्जुन, हर्ष-शोक द्वंद्वों से मुक्त
योग-क्षेम की तज आकांक्षा, नित्य रह योग में युक्त

पूर्ण जलाशय पाकर कोई, ताल तलैया नहीं खोजता
एक ब्रह्म को जाना जिसने, फल की वांछा न करता

कर्मों में अधिकार है तेरा, फल तो तेरे हाथ नहीं
एक निष्ठ हो कर्म किये जा, इसमें कोई प्रमाद नहीं

सम बुद्धि ही बुद्धियोग है, यही कर्मयोग कहलाये
पाप-पुण्य से परे रहेगा, तू योग में टिक जाये

मोह दलदल से उबर गया, तो वैराग्य फलित होगा
परम तत्व में स्थिर होकर, नित्य परमसुख पायेगा

अर्जुन सुन केशव की वाणी, स्थिर बुद्धि होना चाहे
लक्षण पूछे ऐसे जन के भय, क्रोध जिसे न सताए

स्थितप्रज्ञ का वर्णन तब, लगे कृष्ण, पार्थ से कहने
आत्मा में संतुष्ट हुआ जो, त्याग दी कामना जिसने

सुख की चाह नहीं करता, वह दुःख से न घबराता है
मन है अपने वश में जिसका, शांति वही नर पाता है

निस्वार्थ हो जग में विचरे, तज ममता और अहंकार
बुद्धियोग पा लेता वह फिर, छू न पाता उसे विकार

क्रमशः
  





Monday, May 30, 2011

भगवदगीता का भावानुवाद


द्वितीय अध्याय
(सांख्य योग )
कृष्ण कह उठे तब अर्जुन से, मोह ग्रस्त तू क्यों होता है ?
ऐसा विकट काल आया है, हे पार्थ ! तू क्यों रोता है ?

है मोह सदा ही दुखदायी, अपकीर्ति बढ़ाने वाला 
तज कायरता और मूढ़ता, है मोह गिराने वाला

किन्तु मोह अर्जुन का भारी, सीख अनसुनी कर दी
कहा न शस्त्र उठाऊंगा मैं, भीख मांग कर लूँगा जी

मैं निहत्था ही खड़ा रहूँगा, वार झेलने सब उनके
राज्य सुख के लोभ में आकर, हरने चला प्राण जिनके

 भ्रमित हो गया है मन मेरा, धर्म-अधर्म नहीं सूझता
हे केशव ! राह दिखाओ, बुद्धि को कुछ नहीं बूझता

कृष्ण देख हालत अर्जुन की, मन ही मन कुछ मुस्काए
शोक अविद्या के कारण है, आत्म ज्ञान ही हर पाए

 शांत भाव ले उर में बोले, सदा से हैं हम सदा रहेंगे
ये राजा, ये सारी सेना, बार बार यहाँ जन्मेंगे

न जीवित ही न मृत प्राणी, शोक का कारण बन सकते
जिन्हें आत्मा का ज्ञान है, वे न कभी चिंतित होते

जीवन-मृत्यू भ्रम हैं दोनों, मरता नहीं है कभी आत्मा
देह बदलता है जीव पर, सदा शाश्वत है आत्मा

जैसे कोई वस्त्र बदलता, देही देह बदल लेता है
जीर्ण-शीर्ण तन तज के प्राणी, नूतन तन धर लेता है

असत की सत्ता ही न मानो, सत का तो अभाव नहीं
व्याप रही जो सत आत्मा, असत तन में नाश नहीं

है अजन्मा, अविनाशी यह. नित्य शाश्वत सदा आत्मा
नाश देह का, पर रहता है, सदा अमर यह मुक्त आत्मा

शस्त्र काट न सकें रूह को, जला नहीं सकती अग्नि
पवन सुखा न पाए इसको, जल से भीग नहीं सकती 

मन-इन्द्रियां, सुख-दुःख पाते, सहना सीख समान भाव से  
कितने ही हों, हैं अनित्य ये, अविनाशी तू आत्मभाव से

जनम से पहले कहाँ छिपा था, बाद मृत्यु के कहाँ रहेगा
मध्य काल में ही गोचर जो, कौन उसे फिर सत्य कहेगा

मृत्यु हुई तो स्वर्ग मिलेगा, विजय हुई राज्य सुख पाए
कायर बन यदि युद्ध से भागा, अपकीर्ति ही हाथ में आये

क्रमशः