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Friday, June 24, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद (षष्ठोऽध्यायः)


आत्मसंयमयोग
षष्ठोऽध्यायः (शेष भाग )

मन के द्वारा तजे कामना, इन्द्रियों का निग्रह करता
क्रम-क्रम से अभ्यास के द्वारा, सिवा परम उसे कुछ न रुचता

जहाँ-जहाँ यह मन जाता है, जिस-जिस विषय से यह बंधता
वहाँ-वहाँ से लौटा लाता, योगी पुनः प्रभु में लगाता

भली प्रकार शांत है जो मन, पाप रहित, क्रिया शून्य है
एक हुआ ब्रह्म के सँग जो, आनन्दित वह योगी धन्य है

पापरहित वह योगी ऐसा, आत्मा को परम में लगाता
सुख का अक्षय कोष पा गया, सदा परम के सँग ही रहता

सर्वव्यापी अनंत चेतना, जिसमें योगी स्थित रहता
निज आत्मा में हर एक को, सबमें निज स्वरूप देखता

मैं व्यापक हूँ सब भूतों में, सब प्राणी मुझमें ही रहते
जो ऐसा जानता योगी, मैं उसको वह मुझको देखे

सबके भीतर आत्मरूप से, तत्व एक ही व्याप रहा है
जग में होकर भी मुझमें है, जो योगी ऐसा जान सका है

आत्मरूप से सबको देखे, सुख-दुःख भी सबमें सम देखे
वही परम श्रेष्ठ योगी है, जो सर्वत्र परम को देखे

हे मधुसूदन !
समभाव का योग है सुंदर, लेकिन मेरा मन चंचल है
कैसे मन को सदा टिकाऊँ, टिकता नहीं यह पल भर है

मन बड़ा बलवान है केशव, इसे रोकना दुस्तर भारी
वायु रोकना जैसे न संभव, मन को कैसे रोकूँ मुरारी

केशव बोले माना अर्जुन, मन का ऐसा ही स्वभाव है
वश में होता है मुश्किल से, मन का ऐसा ही प्रभाव है  

वैराग्य, अभ्यास से लेकिन, वश में इसको कर सकता 
वैरागी को योग प्राप्त है, जो सदा अभ्यास है करता

जिसकी श्रद्धा है योग में, किन्तु न संयम रख पाता है
अंतकाल में भटक गया जो, कैसी वह गति पाता है

क्या वह परम को न पाकर, आश्रय रहित नहीं हो जाता
नष्ट हुए बादल सा वह भी, नष्ट व्यर्थ नहीं हो जाता

हे केशव यह संशय मेरा, आप ही इसका छेदन कर दें
और न कोई कह पायेगा, आप ही भ्रम का भेदन कर दें 

Monday, June 13, 2011

भगवदगीता का भावानुवाद


चतुर्थ अध्याय (शेष भाग)
ज्ञानकर्मसन्यासयोग

कर्म किसे कहते हैं अर्जुन, और अकर्म का क्या स्वरूप है
जानने योग्य है विकर्म भी, कर्म, अकर्म का विषय गहन है

कर्म में जो अकर्म देखता, और अकर्म में देखे कर्म
वही मुक्त हुआ बन्धन से, बुद्धिमान जानता यह धर्म

बिना कामना, संकल्प के, शास्त्र सम्मत कर्म जो करता
ज्ञानाग्नि में भस्म हुये सब, कर्मी वह ज्ञानी कहलाता

न आसक्ति कर्मों में ही, न ही उनके फलों में रखता
जगत का न लेकर आश्रय, परमात्मा में तृप्त जो रहता

सब कुछ करते हुए भी वह नर, कुछ भी नहीं यहाँ करता
इन्द्रियजीत वह तज आशा को, कभी न बंधन में फंसता

जो संतुष्ट है सहज प्राप्त में, ईर्ष्या से जो दूर हो गया
द्वन्द्वातीत कर्मयोगी वह, सब करके भी मुक्त हो गया

निर्मम, निरासक्त ,विदेही, सदा चित्त जिसका है प्रभु में
खो जाते कर्म सब उसके, यज्ञ हेतु प्रेम है जिसमें  

जिस यज्ञ में हवि ब्रह्म है, ब्रह्म स्वरूप है कर्ता भी
ब्रह्मरूप अग्नि यज्ञ की, ब्रह्म ही है उसका फल भी

कुछ देवों का पूजन करते, कुछ आत्मा को पूजते  
परम आत्मा से अभेद हो, भीतर यज्ञ किया करते

संयम की अग्नि में जलाते, कुछ इन्द्रियों के विषयों को
और अन्य इन्द्रियों में ही, करते अर्पित सब विषयों को

कुछ आत्मा में अर्पित करते, प्राणों की समस्त क्रिया को
शांत हुए वे बुद्धिमान जन, सदा मुक्त रखते हैं मन को

यज्ञ करें कुछ जन द्रव्य से, योग करें कुछ तप करते
कोई अहिंसा व्रत लेते हैं, कुछ स्वाध्याय किया करते

प्राणायाम साधते योगी, प्राणों का हवन करते
ये सब साधक यज्ञ जानते, पापों को भस्म करते

Friday, June 3, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद




 द्वितीय अध्याय (अंतिम भाग)
( सांख्य योग)
सदा विरागी, समता धारे, विषयों से जो दूर रहे
आसक्ति भी नष्ट हो गयी, जिसके उर में शांति बहे  

जो केवल रोके ऊपर से, भीतर संयम न धारे
ऐसे आसक्त बुद्धिमान भी, गए इन्द्रियों से हारे

विषयों का चिंतन जो करता, अंतर में कामना जगती
पूर्ण कामना हो न यदि, क्रोधाग्नि जलाने लगती

क्रोध मूढ़ता से भर देता, स्मृति भुला देती मूढ़ता
विस्मृति से नाश बुद्धि का, जिससे महा पतन होता

जिसका अंतर वश में अपने, जो राग-द्वेष से रहे मुक्त
अन्तःकरण प्रफ्फुलित उसका, हो जाते सारे दुःख नष्ट

जो न जीत सका है मन को, स्थिर बुद्धि नहीं है जिसकी
वह भावनाहीन अशांत है, सुख की नहीं प्रतीति उसकी

जैसे नाव हरी जाती है, वायु के झोंके के बल से
बुद्धि भी हर ली जाती है, मन-इन्द्रियों के छल से

जब सब प्राणी सो जाते हैं, रहे जागता वह तपस्वी
जग जब इतर सुखों में रत हो, सोया रहता वह मनस्वी

, नदियाँ जल भर-भर लातीं पर, सागर जैसे सदा अविचलित
सारे भोग समाते मन में, स्थितप्रज्ञ रहे अकम्पित

यही ब्रह्म को प्राप्त हुए की, स्थिति ब्राह्मी कही जाती
ब्रह्मानंद को प्राप्त हुआ वह, गति उसकी उन्नत होती