Wednesday, May 7, 2014

गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति का प्रसंग

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

सप्तत्रिंशः सर्गः

गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति का प्रसंग

महादेव जब रत थे तप में, देव गये ब्रह्मा के पास
हो सेनापति कौन देवों का, लेकर अंतर में यह आस

अग्नि सहित इंद्र आदि ने, ब्रह्मा को प्रणाम किया
देवों को सुख देने वाले, राम ! सुनो आगे की कथा

पूर्वकाल में जिन शंकर ने, सेनापति प्रदान किया था
उमा सहित तप में रत हैं वे, आप हैं विधि-वधान के ज्ञाता

जो कर्त्तव्य लोकहित में हो, उसे पूर्ण करेंगे आप
परम आश्रय आप हमारे, देवों की सुनेंगे बात

मधुर वचन बोले तब ब्रह्मा, पितामह हैं जो त्रिलोक के
दी सांत्वना देवों को तब, शाप दिया है तुम्हें उमा ने

सत्य सिद्ध होगा वह शाप, तुम सन्तान नहीं पा सकते
ये उमा की बड़ी बहन हैं, आकाश गंगा इन्हें कहते

शंकर के उस तेज को अग्नि, इनके गर्भ में करें स्थापित
एक पुत्र तब होगा उत्पन्न, सेनापति बनेगा निश्चित

गिरिराज की ज्येष्ठ पुत्री हैं, पुत्र समान ही होगा वह
कोई संशय नहीं हैं इसमें,  प्रिय लगेगा उमा को यह

कृतकृत्य हुए सब देव, ब्रह्मा जी का वचन सुना जब
किया प्रणाम सभी देवों ने, और भक्ति से उनका पूजन

विविध धातुओं से अलंकृत, उत्तम पर्वत है कैलाश
वहीं गये सब देव, अग्नि को, दिया परम उत्तम यह काज

देव हुताशन ! देव कार्य यह, सिद्ध करें आप इसको
गंगा जी में करें स्थापित, रूद्र के उस महातेज को

हामी भरकर तब देवों से, अग्निदेव बोले गंगा से
देवी, धारण करें गर्भ यह, देवों का हित है इसमें

दिव्य रूप धरा गंगा ने, अग्निदेव की बात सुनी जब
रूद्र तेज को वहाँ बिखेरा, देख रूप-वैभव यह लखकर

सब ओर से गंगा जी को, अभिषिक्त किया रूद्र तेज से
सारे स्रोत पूर्ण हुए तब, गंगा जी के, उस तेज से

हूँ असमर्थ इसे धरने को, तब गंगा ने कहा अग्नि से
इसकी आंच से जलती हूँ मैं, व्यथित हुई चेतना इससे

हविष्य को जो भोग लगाते, अग्निदेव ने कहा तब उनसे
स्थापित करें इस गर्भ को, हिमालय के पार्श्व भाग में




Tuesday, April 29, 2014

उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना

 श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षट्त्रिंशः सर्गः

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना तथा उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना 

तब उनके ऐसा कहने पर, बोले थे शिव से यह देव
पृथ्वीदेवी करेंगी धारण, क्षुब्ध हुआ जो गिरेगा तेज

देवों का जब सुना कथन यह, महादेव ने छोड़ा तेज
वन, पर्वत संग सारी धरती, हुई व्याप्त हो गयी सतेज

‘वायु के सहयोग से इसको’, अग्निदेव से बोले देव
धारण कर लो भीतर अपने, शिव का है यह महातेज

अग्नि से जब व्याप्त हुआ, परिणत हुआ श्वेत पर्वत में
सरकंडों का दिव्य वन भी, प्रकट हुआ उस प्रदेश में

सूर्य और अग्नि सम हुआ, तब कार्तिकेय का प्रादुर्भाव
ऋषियों सहित सभी देवों में, बढ़ी प्रसन्नता, भक्तिभाव

पूजन किया उमा-शिव का, पर भरी क्रोध में गिरिजानन्दिनी
रोषपूर्वक शाप दिया तब, देवताओं व पृथ्वी को भी

पुत्र-प्राप्ति की इच्छा थी, रोक दिया देवों तुमने
होंगी पुत्रहीन पत्नियाँ, रहो अयोग्य पुत्र पाने में

पृथ्वी को भी शाप दिया तब, बहुतों की भार्या होगी
नहीं रहेगा एक सा रूप, भूमे ! तेरी खोटी बुद्धि

मेरे क्रोध से कलुषित होकर, तू भी वह सुख न पायेगी
पुत्र जनित जो सुख है सुंदर, अनुभव न उसका जानेगी

देवों को जब देखा पीड़ित, उमादेवी के शाप से शिव ने
पश्चिम दिशा की ओर बढ़ गये, हिमालय के उत्तर भाग में

हुए तपस्या में रत दोनों, उस पर्वत के एक शिखर पर
यह विस्तृत वृतांत कहा, अब सुनो कथा गंगा की रघुवर

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छत्तीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Thursday, April 10, 2014

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षट्त्रिंशः सर्गः

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना तथा उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना

मुनि की बात समाप्त हुई जब, किया प्रेम से अभिनन्दन
धर्मयुक्त कथा उत्तम यह, बोले दोनों राम, लक्ष्मण

 हे विस्तृत वृतांत के ज्ञाता, अब विस्तार से हमें सुनाएँ
गिरिराज हिमवान की पुत्री, गंगा की महिमा बतलाएं

दिव्यलोक था माँ गंगा का, मानव लोक में कैसे आयीं
तीन मार्ग में हुईं प्रवाहित, ‘त्रिपथगा’ कैसे कहलायीं

हे धर्मज्ञ ! तीन धाराएँ, तीन लोक में क्या करतीं
रामचन्द्र ने जब पूछा यह, मुनि ने तब यह कथा कही

उमा गयीं नव वधू रूप में, नीलकंठ भगवान निकट जब  
क्रीडा-विहार किया आरम्भ, बीत गये सौ दिव्य वर्ष तब

महादेव को देवी के गर्भ से, पुत्र न कोई प्राप्त हुआ पर
प्रयत्न किया रुक जाये क्रीडा, ब्रह्मा आदि देवों ने तब

इतना काल बीत जाने पर, रूद्र तेज से जो जन्मेगा
होगा वह निश्चित ही वीर, कौन तेज को सहन करेगा

यह विचार सब देव गये तब, शिव को कर प्रणाम बोले
कृपा करें आप देवों पर, लोक के हित में तत्पर रहते

क्रीडा से हो निवृत आप, करें तपस्या संग उमा के
सहन नहीं कर पाएंगे ये, तेज आपका लोक यहाँ के

निज तेज को सबके हित में, स्वयं में ही धारण अब कर लें
लोकों की होगी रक्षा तब, न इनका विनाश कर डालें  

स्वीकार किया उनका अनुरोध, देवों की यह बात सुनी जब
उमासहित तेज धारूंगा, पृथ्वी आदि हों शांत अब

किन्तु यदि हो जाये स्खलित, हो क्षुब्ध मेरा यह तेज
कौन उसे धारेगा, कहें, देवों से पूछते महादेव





Wednesday, April 2, 2014

विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचत्रिंशः सर्गः

शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर पहुंचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा राम जी के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना 

देवकार्य की सिद्धि हेतु, गंगा को माँगा देवों ने
आगे चलकर हुईं अवतीर्ण, त्रिपथगा नदी रूप में

त्रिभुवन के हित की इच्छा से, गिरिराज हिमवान ने
लोकपावनी निज पुत्री को, धर्मपूर्वक दिया उन्हें

हुए कृतार्थ उन्हें पाकर वे, गंगा जी को लिए गये
गिरिराज की दूजी कन्या,  हुईं तल्लीन तपस्या में

उग्र तप में हुईं संलग्न, विश्व वंदिता उमा उत्तम
ब्याही गयीं भगवान रूद्र से, अति समर्थ जो हैं अनुपम

रघुनन्दन ! इस प्रकार ये, कन्याएं हैं हिमालय की
सारा जग झुकता चरणों में, उमा व गंगा दोनों के ही

तुम इसका भी राज सुनो, त्रिपथगामिनी कैसे हुईं वे
पहले गईं आकाश मार्ग फिर, स्वर्ग से हो धरा पर ये

देव नदी के रूप में गंगा, देव लोक में हुईं आरूढ़
जल रूप में हुईं प्रवाहित, गयीं रसातल कर पाप दूर

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंतीसवां सर्ग पूरा हुआ.



Thursday, March 20, 2014

राम जी के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचत्रिंशः सर्गः

शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदि का गंगाजी के तट पर पहुंचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा राम जी के पूछने पर विश्वामित्रजी का उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा सुनाना

संग महर्षियों के मुनिवर ने, नदी के तट पर किया शयन
बीती रात प्रभात हुआ, तब, रामचन्द्र से कहा कथन

उठो राम ! अब हुआ सवेरा, करो तैयारी अब चलने की
नित्यनियम पूर्ण किये तब, राम हुए तैयार शीघ्र ही

शुभजल से परिपूर्ण हुआ यह, शोण भद्र का तट सुशोभित
किस मार्ग से पार करेंगे, यह अथाह हो रहा प्रतीत

जिस मार्ग से सदा महर्षि, शोण भद्र को करते पार
पहले से निर्णय कर रखा, उस पथ से हम जाएँ पार

बुद्धिमान मुनि से सुनकर, सभी चले वन शोभा लखते
दीर्घ मार्ग तय किया उन्होंने, पावन गंगा तट पर पहुंचे

हंसों और सारसों से थी, सेवित पुण्य सलिला भागीरथी
विधिवत किया स्नान सभी ने, पितरों का किया तर्पण भी

अग्निहोत्र कर भोजन पाया, अमृत सम था जो हविष्य
मुनि को घेर सभी बैठे तब, श्रीराम ने किया प्रश्न यह

भगवन ! मैं सुनना यह चाहूँ, बहने वाली तीन मार्ग से
तीन लोक में हो प्रवाहित, सिन्धु से मिली गंगा कैसे

प्रेरित होकर इस प्रश्न से, कही कथा गंगा की मुनि ने
कैसे हुई उत्पत्ति इसकी, कैसे पायी वृद्धि इसने  

हिमवान् एक पर्वत है, पर्वत राज व रत्नाकर भी
हिमवान की दो कन्याएं, अति सुंदर, अनुपमा भी

मेरू पर्वत की सुपुत्री, मेना प्रिय पत्नी है उसकी
मनोहारिणी, सुंदर मेना, उन कन्याओं की जननी

पहली कन्या गंगा जी हैं, ज्येष्ठ पुत्री हिमवान की
दूजी कन्या उमा कहाती, मेना के गर्भ से उपजी   




Friday, March 14, 2014

विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करते हुए सबको सोने की आज्ञा देकर शयन करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

चतुस्त्रिंशः सर्गः

गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा, विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करते हुए सबको सोने की आज्ञा देकर शयन करना 

बीत गयी है अर्ध रात्रि, अब सो जाओ कुछ देर को
कल यात्रा में विघ्न पड़े न, राम !, तुम्हारा कल्याण हो

निष्कम्प जान पड़ते हैं, वृक्षों का पत्ता न हिले
अंधकार से पूर्ण दिशाएं, पशु-पक्षी भी छिपे सो रहे

धीरे-धीरे संध्या बीती, तारों से भर गया आकाश
ज्योतिर्मय सहस्त्र नेत्र ज्यों, भर जाते अनुपम प्रकाश

शीतरश्मि चन्द्रमा मनों को, आह्लाद कर रहे प्रदान
यक्ष, राक्षसों के समुदाय, रात्रि में करते हैं विचरण

 हुए शांत कह ऐसा मुनिवर, मुनियों ने दिया साधुवाद
कुशपुत्रों का वंश सदा ही, रहता आया धर्म परायण

कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ, तेजस्वी ब्रह्मा के समान
सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी, सर्वश्रेष्ठ उनमें हैं आप  

इस प्रकार होकर आनन्दित, मुनियों द्वारा हुए प्रशंसित
अस्त हुए सूर्य की भांति, कौशिक मुनि हुए थे निद्रित

लक्ष्मण सहित राम को भी, विस्मय हुआ कथा यह सुनकर
की सराहना विश्वामित्र की, लेने लगे नींद वे सुखकर


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौतीसवां सर्ग पूरा हुआ.



Wednesday, March 12, 2014

गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा,

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

चतुस्त्रिंशः सर्गः

गाधि की उत्पत्ति, कौशिकी की प्रशंसा, विश्वामित्रजी का कथा बंद करके आधी रात का वर्णन करते हुए सबको सोने की आज्ञा देकर शयन करना

रघुनन्दन से कहा मुनि ने, ब्रह्मदत्त जब चले गये
पुत्रेष्टि यज्ञ किया तब, पुत्रहीन राजा कुशनाभ ने

यज्ञ काल में राजा कुश ने, कुशनाभ को दिया आश्वासन
पुत्र पाओगे ‘गाधि’ नामक, परम धर्मात्मा तुम निज समान

अक्षय कीर्ति मिलेगी उससे, ऐसा कहकर राजर्षि कुश
प्रविष्ट हुए अनंत आकाश में, चले गये वे ब्रह्मलोक

वे परम धर्मात्मा ‘गाधि’, सुनो राम हे ! पिता थे मेरे
‘कौशिकी’ भी कहलाता, हुआ हूँ उत्पन्न कुश के कुल में

राघव ! मेरी ज्येष्ठ बहन भी, उत्तम व्रत का पालन करती
ऋचीक मुनि को ब्याही गयी थी, नाम था जिसका सत्यवती

 अनुसरण जब किया पति का, देह सहित वह स्वर्ग गयी
परम उदार महानदी बन, कौशिकी रूप में भू पर बहती

मेरी बहन जगत के हित में, ले आश्रय हिम आलय का
नदी रूप में हुई प्रवाहित, अति रमणीय वह पुण्य सलिला

उसके तट पर रहता हूँ मैं, बहन से मुझको स्नेह अति
सत्य धर्म में है प्रतिष्ठित, सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी  

सिद्धि हेतु आया सिद्धाश्रम, तज कर मैं सान्निध्य बहन का
सिद्धि प्राप्त हुई अब मुझको, है प्रताप तुम्हारे तेज का

शोणभद्र तटवर्ती देश का, तुमने जो परिचय पूछा था
अपनी, निज कुल उत्पत्ति का, विवरण तुमसे सभी कहा