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Monday, September 22, 2014

विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचपञ्चाशः सर्गः


अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना 

देवों, यक्षों, गन्धर्वों के, दानव और राक्षसों के भी
प्रकट हों मेरे हृदय में, अस्त्र महर्षियों के भी स्वामी

यही मनोरथ है मेरा प्रभु, यही मुझे वरदान मिले
‘ऐसा ही हो’ महादेव कह, दे वरदान चले गये

हुआ घमंड अति राजा को, पाकर अस्त्र महादेव से
सागर ज्यों बढ़ता पूनम को, स्वयं को बढ़ा-चढ़ा मानें

मरा हुआ ही माना मुनि को, गये आश्रम पर उनके
भांति-भांति के अस्त्रों का तब, वे प्रयोग करने लगे

दग्ध हुआ तपोवन सारा, भाग चले सैकड़ों मुनिगण
पशु-पक्षी और शिष्यगण भी, भाग गये भयाकुल होकर

सूना हुआ आश्रम सारा, पल में छाया सन्नाटा
कहने लगे मुनि वसिष्ठ तब, अभी नष्ट मैं इनको करता

रोषपूर्वक बोले राजा से, नष्ट किया तूने आश्रम
चिरकाल से जिसे था पोसा, हरा-भरा था जो उपवन

है विवेकशून्य तू पापी, और दुराचारी भी है
नहीं रहेगा सकुशल तू, कितना अत्याचारी है

कहकर ऐसा हुए क्रुद्ध वे, धूम रहित कालाग्नि सम  
डंडा लिया सामना करने, अति भयंकर यमदंड सम


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ.




Tuesday, September 16, 2014

अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचपञ्चाशः सर्गः

अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना

विश्वामित्र के अस्त्रों से जब, घायल होकर हुए वे व्याकुल
और सैनिकों की सृष्टि कर, कहा धेनु को लगा योगबल

फिर हुंकार किया गाय ने, जिससे उपजे थे कम्बोज
सूर्य समान तेजस्वी थे वे, बर्बर हुए थनों से उत्पन्न

योनि देश से यवन हुए थे, शकृदेश से शक आये
रोमकूप से उपजे म्लेच्छ, हारीत और किराट हुए

रघुनन्दन उन सब वीरों ने, तब भारी प्रहार किया
पैदल, हाथी, घोड़े, रथ संग, सेना का संहार किया
  
अति कुपित हो सौ पुत्र तब, टूट पड़े वसिष्ठ मुनि पर
हुंकार मात्र से ही मुनि ने, भस्म किया उन्हें जलाकर

दो ही पल में भस्म हुए वे, नष्ट हुए सेना के संग
लज्जित हुए विश्वामित्र तब, शांत हुआ तब उनका वेग

दंत विहीन सर्प समान, राहु ग्रस्त सूर्य की भांति
हुए तत्काल निस्तेज वे, पंख कटे पक्षी की भांति

नष्ट हुआ था बल सारा, उत्साह भी नष्ट हुआ
खिन्न हुए थे मन ही मन वे, एक पुत्र ही शेष रहा

राजा के पद पर बैठा कर, आज्ञा दी उसको शासन की
गये हिमालय तप करने वे, पूजा करते महादेव की

प्रकट हुए भगवान वृषभ ध्वज, जब बीता था कुछ काल
पूछ तप करने का कारण, थे उत्सुक वर देने तत्काल

कर प्रणाम कहा मुनि ने, यदि आप संतुष्ट हैं मुझसे
अंग, उपांग, व सहित उपनिषद, धनुर्वेद मुझे प्रदान करें  


Thursday, April 10, 2014

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षट्त्रिंशः सर्गः

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना तथा उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना

मुनि की बात समाप्त हुई जब, किया प्रेम से अभिनन्दन
धर्मयुक्त कथा उत्तम यह, बोले दोनों राम, लक्ष्मण

 हे विस्तृत वृतांत के ज्ञाता, अब विस्तार से हमें सुनाएँ
गिरिराज हिमवान की पुत्री, गंगा की महिमा बतलाएं

दिव्यलोक था माँ गंगा का, मानव लोक में कैसे आयीं
तीन मार्ग में हुईं प्रवाहित, ‘त्रिपथगा’ कैसे कहलायीं

हे धर्मज्ञ ! तीन धाराएँ, तीन लोक में क्या करतीं
रामचन्द्र ने जब पूछा यह, मुनि ने तब यह कथा कही

उमा गयीं नव वधू रूप में, नीलकंठ भगवान निकट जब  
क्रीडा-विहार किया आरम्भ, बीत गये सौ दिव्य वर्ष तब

महादेव को देवी के गर्भ से, पुत्र न कोई प्राप्त हुआ पर
प्रयत्न किया रुक जाये क्रीडा, ब्रह्मा आदि देवों ने तब

इतना काल बीत जाने पर, रूद्र तेज से जो जन्मेगा
होगा वह निश्चित ही वीर, कौन तेज को सहन करेगा

यह विचार सब देव गये तब, शिव को कर प्रणाम बोले
कृपा करें आप देवों पर, लोक के हित में तत्पर रहते

क्रीडा से हो निवृत आप, करें तपस्या संग उमा के
सहन नहीं कर पाएंगे ये, तेज आपका लोक यहाँ के

निज तेज को सबके हित में, स्वयं में ही धारण अब कर लें
लोकों की होगी रक्षा तब, न इनका विनाश कर डालें  

स्वीकार किया उनका अनुरोध, देवों की यह बात सुनी जब
उमासहित तेज धारूंगा, पृथ्वी आदि हों शांत अब

किन्तु यदि हो जाये स्खलित, हो क्षुब्ध मेरा यह तेज
कौन उसे धारेगा, कहें, देवों से पूछते महादेव