Monday, June 13, 2011

भगवदगीता का भावानुवाद


चतुर्थ अध्याय (शेष भाग)
ज्ञानकर्मसन्यासयोग

कर्म किसे कहते हैं अर्जुन, और अकर्म का क्या स्वरूप है
जानने योग्य है विकर्म भी, कर्म, अकर्म का विषय गहन है

कर्म में जो अकर्म देखता, और अकर्म में देखे कर्म
वही मुक्त हुआ बन्धन से, बुद्धिमान जानता यह धर्म

बिना कामना, संकल्प के, शास्त्र सम्मत कर्म जो करता
ज्ञानाग्नि में भस्म हुये सब, कर्मी वह ज्ञानी कहलाता

न आसक्ति कर्मों में ही, न ही उनके फलों में रखता
जगत का न लेकर आश्रय, परमात्मा में तृप्त जो रहता

सब कुछ करते हुए भी वह नर, कुछ भी नहीं यहाँ करता
इन्द्रियजीत वह तज आशा को, कभी न बंधन में फंसता

जो संतुष्ट है सहज प्राप्त में, ईर्ष्या से जो दूर हो गया
द्वन्द्वातीत कर्मयोगी वह, सब करके भी मुक्त हो गया

निर्मम, निरासक्त ,विदेही, सदा चित्त जिसका है प्रभु में
खो जाते कर्म सब उसके, यज्ञ हेतु प्रेम है जिसमें  

जिस यज्ञ में हवि ब्रह्म है, ब्रह्म स्वरूप है कर्ता भी
ब्रह्मरूप अग्नि यज्ञ की, ब्रह्म ही है उसका फल भी

कुछ देवों का पूजन करते, कुछ आत्मा को पूजते  
परम आत्मा से अभेद हो, भीतर यज्ञ किया करते

संयम की अग्नि में जलाते, कुछ इन्द्रियों के विषयों को
और अन्य इन्द्रियों में ही, करते अर्पित सब विषयों को

कुछ आत्मा में अर्पित करते, प्राणों की समस्त क्रिया को
शांत हुए वे बुद्धिमान जन, सदा मुक्त रखते हैं मन को

यज्ञ करें कुछ जन द्रव्य से, योग करें कुछ तप करते
कोई अहिंसा व्रत लेते हैं, कुछ स्वाध्याय किया करते

प्राणायाम साधते योगी, प्राणों का हवन करते
ये सब साधक यज्ञ जानते, पापों को भस्म करते

Saturday, June 11, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


चतुर्थ अध्याय
(ज्ञानकर्मसन्यासयोग)

कल्प आदि में दिया सूर्य को, यह अविनाशी ज्ञान, योग का
सूर्य से पहुँचा पुत्र मनु तक, मनु से इक्ष्वाकु तक पहुँचा

परंपरा से चला योग यह, कुछ पीढ़ी तक रहा जागृत
लुप्त हो गया फिर पृथ्वी से, आज पुनः कर रहा अनावृत

तू है मेरा भक्त व सखा, अति प्रिय, मुझे है प्यारा
वही पुरातन योग कह रहा, अति उत्तम रहस्य यह न्यारा

अर्जुन ने झट प्रश्न किया, केशव ! तुम तो अब जन्मे हो
जन्म सूर्य का अति पुराना, कैसे कहूँ, तुम सत्य हो

तेरे व मेरे तो अब तक, जन्म हो चुके हैं अनंत
मै जानता, तू न जाने, इसीलिए तू है संतप्त

मै अजन्मा, अविनाशी हूँ, ईश्वर हूँ इस जग का
ले आश्रय योगमाया का, वेश धरा करता नर का

जब-जब धर्म की होती हानि, बढ़ता जाता है अधर्म
तब-तब मैं प्रकट होता हूँ, बन मानव निभाता धर्म

सज्जनों की बढ़ती हो जग में, दुर्जन न फल-फूलने पाएँ
युग-युग में आता हूँ जिससे, धर्म पताका  लहराए

मेरे जन्म-मरण दिव्य हैं, जो इस तत्व को जान सके
वह जीते जी मुक्त हो गया, वह नर ही मुझको पा सके

राग, भय व क्रोध मिटाकर, भक्त हुए मेरे कितने
प्रेमपूर्वक भजकर मुझको, ज्ञानी जन पा सके मुझे

जो मुझको जैसे भजता है, मै भी उसको वैसे चाहूँ
सभी अनुसरण करते मेरा, मैं ही उनको नाच नचाऊँ

जो कर्मों के फल में उत्सुक, वे देवों का पूजन करते
देव शीघ्र ही फल दे देते, जो न भक्ति, ज्ञान चाहते

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, ये चार वर्ण मैंने ही बनाये
इतने पर भी जान अकर्ता, सृष्टिक्रम मैंने ही चलाए

कर्मों का फल नहीं चाहता, कर्मों से होता नहीं लिप्त
जो तत्व से जाने मुझको, वह भी रहता सदा अलिप्त 

Friday, June 10, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद



तृतीय अध्याय (अंतिम भाग )
( कर्म योग )
किन्तु न मानें मेरे मत को, जो जन दोष निकाला करते
मोहित हुए अज्ञानीजन वे, दुःख को प्राप्त हुआ करते

प्रकृति के अनुसार वर्तते, परवश हुए स्वभाव के अपने
ज्ञानवान भी नहीं बचे हैं, प्रकृति किसी का हठ न माने

इन्द्रियों में ही छिपे हुए हैं, राग-द्वेष ये दोनों शत्रु
जो न हो उनके वश में, वह कल्याण का पाता हेतु  

निज धर्म में मृत्यु श्रेयस्कर, पर धर्म है भयकारी
चाहे कितना ही श्रेष्ठ हो, परधर्म न हितकारी

अर्जुन बोले हे केशव, यह पाप कौन करवाता है
न चाहते हुए भी मानव, क्यों इसमें फँस जाता है

काम, क्रोध ये दो शत्रु हैं, रजोगुण से जो उत्पन्न
नहीं तृप्ति होती है इनकी, कितना ही कोई करे जतन

जैसे ढकी धूल से अग्नि, दर्पण मैल से आच्छादित
गर्भ ढका है ज्यों जेर से, ज्ञान ढका काम से बाधित

जैसे अग्नि तृप्त न होती, डालें ईंधन पर ईंधन
ऐसे ही यह बढ़ता जाता, ढके हुए ज्ञान निशदिन

इन्द्रियों, मन बुद्धि में रहता, इनके ही द्वारा सेवित
मोहित करता जीवात्मा को, ज्ञान हो रहा इससे बाधित

वश में कर इन्द्रियों को तू, हे पार्थ ! मुक्त हो जा
ज्ञान-विज्ञान का नाश करें जो, डालें तुझे पाश मोह का

देह से परे सूक्ष्म इन्द्रियां, मन बलवान है इनसे
मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि, आत्मा श्रेष्ठ है सबसे

इसी आत्मा को पाकर तू, मन, बुद्धि वश में कर ले
मन के पीछे चलें इन्द्रियां, तू पराजित काम कर ले   

Tuesday, June 7, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


तृतीय अध्याय (शेष भाग)
(कर्म योग) 
नरश्रेष्ठ जो आत्मा रामी, तृप्त सदा आत्मा में है
कर्तव्य न शेष रहा कुछ, जो संतुष्ट आत्मा में है

 कर्म करे या त्याग कर्म दे, उसका कोई स्वार्थ नहीं
हुआ मुक्त वह संबंधों से, उसका कोई परार्थ नहीं

तज आसक्ति कर्म किये जा, परम आत्मा को पायेगा
पायी जनक ने सिद्धि जिससे, लोकसंग्रह जब अपनाएगा

श्रेष्ठ पुरुष जैसा वरतेंगे, जन उसको आदर्श बनाते
वह प्रमाण खड़ा करता है, जन साधारण अपनाते

केशव बोले सारे जग में, मुझे न कोई कर्त्तव्य है
कुछ भी नहीं अप्राप्त मुझे, फिर भी नहीं अकर्त्तव्य है

यदि कर्म त्याग दूँ मैं भी, हानि होगी बड़ी अपार
नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ प्रजाएँ, होगा नष्ट सृष्टि संसार

जैसे अज्ञानी जन करते, आसक्ति वश कर्मों को
ज्ञानी जन तज आसक्ति, नहीं त्यागते कर्मों को

ज्ञानी स्वयं भी कर्म करे, औरों से भी करवाए
दृढ़ कर दे श्रद्धा उनकी, कर्म न उनसे छुडवाए

प्रकृति के गुण कर्म कर रहे, किन्तु अहंकारी न माने
मैं करता हूँ, मैंने किया है, ऐसा अज्ञानी माने

गुण विभाग और कर्म विभाग का, तत्व जानता जो ज्ञानी
कर्म हो रहे गुणों के द्वारा, स्वयं अलिप्त रहे ज्ञानी

किन्तु गुणों से जो मोहित हैं, उनको न विचलित करते
जो आसक्त अभी कर्मों से, उनको वे करने देते

मुझमें चित्त लगा तू अर्जुन, मैं अन्तर्यामी, ईश, नियंता
तज ममता और आसक्ति, तज संताप युद्ध में लग जा

जो अन्यों में दोष न देखे, श्रद्धापूर्ण हृदय वाला
कर्मों के बंधन से छूटे, इस मत पर चलने वाला
 क्रमशः

Monday, June 6, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद






तृतीय अध्याय
(कर्म योग )

अर्जुन बोले पुनः कृष्ण से, कर्मयोग से श्रेष्ठ ज्ञान है
घोर कर्म युद्ध का जिसमें, लगना भी तो अज्ञान है

श्रेष्ठतम ही कहिये मुझसे, जिससे हो मेरा कल्याण
मिले हुए वचनों को सुनकर, हो मोहित मैं हूँ हैरान

दो ही मार्ग प्रमुख हैं जग में, केशव ने समझाया
ज्ञान योग व कर्म योग, दोनों को ही बतलाया

कर्मों का आरम्भ न हो तो, निष्कर्मता प्राप्त न होगी
न कर्मों के त्याग से केवल, ज्ञान की ज्योति जलेगी

क्षण भर को भी कर्म के बिना, कोई न रह पाता
प्रकृतिस्थ गुणों के द्वारा, बाध्य उसे किया जाता

हठपूर्वक बैठ गया जो, ऊपर से ही है त्यागी
मन से चिंतन हो विषयों का, कहलाता वह दम्भी

मन से जिसने त्याग दिया हो, आसक्ति जिसकी छूटी
वह भी जग में कर्म करेगा, वही श्रेष्ठ कर्मयोगी

कर्म है उत्तम, कर्म बिना, तन का भी निर्वाह न होगा
यज्ञ के हेतु कर्म किये जा, तज आसक्ति, नहीं बंधेगा

कल्प के आदि में ब्रह्मा ने, यज्ञ सहित रची प्रजाएँ
यज्ञ कर्म से भोग मिलें, इससे ही जन वृद्धि पाएँ

देव समर्पित कर्म यदि हों, देवों का आशीष मिले
एक दूसरे को उन्नत कर, मानव का समुदाय खिले

बिन माँगे ही भोग मिलें, इच्छाएँ सब होंगी पूर्ण
किन्तु कहाएगा वह चोर, जो न करे देव अर्पण

शेष यज्ञ से बचा जो खाते, श्रेष्ठ वही कहलाते हैं
मुक्त हुए वे सब पापों से, किन्तु शेष पाप खाते हैं

अन्न से उपजा करते प्राणी, अन्न उपजता है वृष्टि से
यज्ञ किये से होती वृष्टि, यज्ञ पूर्ण होता कर्मों से

कर्म वेद से उत्पन्न होते, वेद परम ईश से उपजे
अतः अक्षर वह परम आत्मा, सदा प्रतिष्ठित है यज्ञ में

जो इस क्रम को नहीं मानता, कर्तव्य से विमुख हो गया

केवल भोगों में जो रत है, जीवन उसका व्यर्थ ही गया 

Friday, June 3, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद




 द्वितीय अध्याय (अंतिम भाग)
( सांख्य योग)
सदा विरागी, समता धारे, विषयों से जो दूर रहे
आसक्ति भी नष्ट हो गयी, जिसके उर में शांति बहे  

जो केवल रोके ऊपर से, भीतर संयम न धारे
ऐसे आसक्त बुद्धिमान भी, गए इन्द्रियों से हारे

विषयों का चिंतन जो करता, अंतर में कामना जगती
पूर्ण कामना हो न यदि, क्रोधाग्नि जलाने लगती

क्रोध मूढ़ता से भर देता, स्मृति भुला देती मूढ़ता
विस्मृति से नाश बुद्धि का, जिससे महा पतन होता

जिसका अंतर वश में अपने, जो राग-द्वेष से रहे मुक्त
अन्तःकरण प्रफ्फुलित उसका, हो जाते सारे दुःख नष्ट

जो न जीत सका है मन को, स्थिर बुद्धि नहीं है जिसकी
वह भावनाहीन अशांत है, सुख की नहीं प्रतीति उसकी

जैसे नाव हरी जाती है, वायु के झोंके के बल से
बुद्धि भी हर ली जाती है, मन-इन्द्रियों के छल से

जब सब प्राणी सो जाते हैं, रहे जागता वह तपस्वी
जग जब इतर सुखों में रत हो, सोया रहता वह मनस्वी

, नदियाँ जल भर-भर लातीं पर, सागर जैसे सदा अविचलित
सारे भोग समाते मन में, स्थितप्रज्ञ रहे अकम्पित

यही ब्रह्म को प्राप्त हुए की, स्थिति ब्राह्मी कही जाती
ब्रह्मानंद को प्राप्त हुआ वह, गति उसकी उन्नत होती 

Thursday, June 2, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


द्वितीय अध्याय (शेष भाग)

(सांख्य योग )


देह आत्मा का विवरण, जो सांख्य शास्त्र अनुसार कहा
अब सुन कर्म योग की चर्चा, बंधन से जो दे छुड़ा

निश्चल कर बुद्धि को अपनी, एक लक्ष्य पर इसे लगा
सत्व, रज, तम तीनों को तज दे, निर्द्वन्द्व, समचित्त हो जा

सुख-दुःख, लाभ-हानि को तजकर, कर युद्ध तू होकर निर्भय
पाप का भागी न होगा तू, चला बाण पाकर अभय

कर कामना रहित युद्ध तू, एक निष्ठ हो, रत हो जा
कर्मों के बंधन न होंगें, मुझसे यह आश्वासन पा

कर्मयोग है अद्भुत जिसमें, होता कुछ भी नाश नहीं
कर्म नहीं बंधते जिससे, जन्म-मरण की फांस नहीं

कर्मफलों हित जो नित रत हैं, स्थितप्रज्ञ न हो पाते
इधर-उधर ही डोला करते, अविवेकी ही कहलाते

भोग, स्वर्ग ही प्राप्य हैं जिनके, नाना कर्म किया करते
सुख के पीछे दौड़ा करते, एक निश्चय न कर पाते

अनासक्त हो जा तू अर्जुन, हर्ष-शोक द्वंद्वों से मुक्त
योग-क्षेम की तज आकांक्षा, नित्य रह योग में युक्त

पूर्ण जलाशय पाकर कोई, ताल तलैया नहीं खोजता
एक ब्रह्म को जाना जिसने, फल की वांछा न करता

कर्मों में अधिकार है तेरा, फल तो तेरे हाथ नहीं
एक निष्ठ हो कर्म किये जा, इसमें कोई प्रमाद नहीं

सम बुद्धि ही बुद्धियोग है, यही कर्मयोग कहलाये
पाप-पुण्य से परे रहेगा, तू योग में टिक जाये

मोह दलदल से उबर गया, तो वैराग्य फलित होगा
परम तत्व में स्थिर होकर, नित्य परमसुख पायेगा

अर्जुन सुन केशव की वाणी, स्थिर बुद्धि होना चाहे
लक्षण पूछे ऐसे जन के भय, क्रोध जिसे न सताए

स्थितप्रज्ञ का वर्णन तब, लगे कृष्ण, पार्थ से कहने
आत्मा में संतुष्ट हुआ जो, त्याग दी कामना जिसने

सुख की चाह नहीं करता, वह दुःख से न घबराता है
मन है अपने वश में जिसका, शांति वही नर पाता है

निस्वार्थ हो जग में विचरे, तज ममता और अहंकार
बुद्धियोग पा लेता वह फिर, छू न पाता उसे विकार

क्रमशः