Tuesday, October 27, 2026

रावण का पुनः मारीच के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

पंचत्रिंश: सर्ग: 


रावण का समुद्रतटवर्ती प्रांत की

शोभा देखते हुए पुनः मारीच के पास जाना 


नभ मार्ग से यात्रा करते, श्वेत विमान भी उसने देखे

दिव्य पुष्पों से सजे हुए थे, पुण्यात्मा पुरुषों से भरे 


गीत, वाद्य की ध्वनि सुनी,गन्धर्वों, अप्सराओं को देखा

फैली अनुपम सुगंधि जिसकी, चंदन का वन प्रांतर देखा


 श्रेष्ठ अगरु के वन थे कहीं, सुगंधित फल वाले वृक्षों के 

 कहीं गोल मिर्च की झाड़ी, कहीं तमाल के फूल खिले थे


सूख रहे थे कहीं किनारे, मोती ढेर के ढेर क़ीमती 

कहीं शिखर सोने-चाँदी के, मूँगों की राशियाँ रखी थीं


स्वच्छ नीर से भरे हुए कई, जल प्रपात कहीं बहते थे 

धन-धान्य से संपन्न कितने, नगर दृष्टिगोचर होते थे 


सिंधुराज के तट पर उसने तब, ऐसा एक स्थान देखा 

समतल, स्निग्ध, स्वर्ग सरिस मनोहर, शीतल मलयज बहता था 


बरगद का एक वृक्ष खड़ा था, अति सघन थी छाया उसकी 

मुनिजन वहाँ वास करते थे, शाखाएँ दूर तक फैली थीं 


यही वृक्ष जिसकी शाख पर, गरुड़ बैठे गज, कछुआ लेकर 

बहुसंख्यक पत्तों से भरी, टूट गई शाखा उन्हें लेकर 


उस शाखा के नीचे बहुत से, वैखानस, माष, बालखिल्य 

मरीचिप, ब्रह्मपुत्र, धूम्रप आदि, रहते आये थे महर्षि 


उन पर दया दिखाने हेतु, टूटी हुई शाखा को पकड़ा 

गज, कछुए को लिए गरुड़ वह, सौ योजन आकाश में उड़ा 


भक्षण किया नभ में उनका, फेंकी हुई उस डाली द्वारा 

गिरी निषादों के देश पर, उन सबका संहार कर डाला 


मुनियों की रक्षा हुई थी, इससे गरुड़ को अति हर्ष हुआ

दुगना हुआ पराक्रम उसका, अमृत लाने का निश्चय किया 


इंद्रलोक में जाकर उसने, लोहे की जाली को तोड़ा 

विनष्ट कर दिया श्रेष्ठ भवन को, अमृत का वह घट उठा लिया 


गरुड़ द्वारा तोड़ी डाली का,  बरगद पर तब भी चिह्न था

सुभद्रवट नाम था जिसका, रावण ने उस वृक्ष को देखा 


नदियों के स्वामी सागर के, दूजे तट पर वह जा पहुँचा

जहाँ रमणीय अरण्य के भीतर, एक आश्रम बना हुआ था  


वहाँ रहता था मारीच राक्षस, नियमित चर्या अपनाकर 

तन पर काला मृगचर्म था, घनी जटाएँ थी उसके सिर पर


रावण जाकर मिला उसी से, उसने आदर  सत्कार किया 

अलौकिक कमनीय पदार्थ दिये, आने का प्रयोजन पूछा 


राजन ! लंका में कुशल तो है ? किस काम से पुन: आये हो 

 रावण ने कहा सब विवरण, जब मारीच का प्रश्न सुना तो



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


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