Showing posts with label सूर्य. Show all posts
Showing posts with label सूर्य. Show all posts

Friday, November 11, 2011

आत्मस्वरूप क्या है (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

आत्मस्वरूप क्या है (शेष भाग)

घट, जल व प्रतिबिम्ब को जैसे, ज्ञानी भिन्न सूर्य से माने
देह, बुद्धि व चिदाभास को, तज साक्षी आत्मा जाने

है अखंड बोध स्वरूप, नित्य, विभु, सूक्ष्म, आत्मा
मन आदि का वही प्रकाशक, भीतर-बाहर सर्वगत आत्मा

जो स्वयं से अभिन्न जानता, निर्मल और अमर हो जाता
पाप रहित हो निज में टिकता, सत् असत् से पार हो जाता

शोक रहित आनंद घन वह, प्राप्त अभय को हो जाता है
जग बंधन से छूटना चाहे, आत्मतत्व को ही पाता है

ब्रह्म आत्मा के अभेद का, ज्ञान जीव को मुक्ति देता
जन्म-मरण से बच कर वह, ज्ञानस्वरूप ब्रह्म में टिकता

 
      

Wednesday, August 3, 2011

एकादशोऽध्यायः विश्वरूपदर्शनयोग (शेष भाग)


एकादशोऽध्यायः
विश्वरूपदर्शनयोग (शेष भाग) 

मुखों से अग्निलपटें निकलें, हे केशव ! अनंत यशस्वी  
 सूर्य चन्द्र दो नेत्र तुम्हारे, हो असंख्य भुजा धारी

जल रहा सम्पूर्ण जगत यह, है प्रचंड तेज तुम्हारा
भय से कम्पित हैं लोक सभी, कैसा व्यापक रूप तुम्हारा

देव शरण में हुए आपकी, कुछ प्रवेश करते हैं मुख में
कर जोड़े कर रहे प्रार्थना, सिद्ध महर्षि मग्न स्तुति में

रूद्र, वसु, आदित्य, साध्य गण, यक्ष, असुर गन्धर्व, पितरगण
सिद्ध्देव, अश्विनीकुमार भी, तुम्हें देखते होकर विस्मित

है विकराल रूप आपका, मुखों, उदरों, दाढों वाला
व्याकुल हैं सब लोक देख यह, मैं भी हूँ व्याकुल मन वाला

गगन तक विस्तार तुम्हारा, सर्वव्यापी हे विष्णु ! तुम हो
नेत्र विशाल चमकते अनुपम, हूँ अधीर, व्याकुल लख तुमको

हे देवेश, जगन्निवास, प्रलयाग्नि सम रूप छिपाओ
मोहग्रस्त हुआ मैं जाता, भीषण इन दाढों को हटाओ

भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजागण, पुत्रों सहित धृतराष्ट्र के
इक-इक करके चले जा रहे, मुख में इस विकराल आपके

कुछ योद्धा हमारे भी तो, कर रहे प्रवेश उसी में
चूर्ण हुए जाते हैं सब वे, विकट आपके इन दातों में

जैसे नदियाँ मिले सागर में, योद्धा सब जाते हैं मुखों में
हर दिशा से बढ़ते आते, पतिंगों से जलते लपटों में

प्रज्ज्वलित है सारा ब्रह्मांड यह, है प्रखर तेज तुम्हारा
झुलसाती किरणें फैलाते, अद्भुत भीषण ताप तुम्हारा

हे देवेश ! कृपा कर कहिये, कौन आप हैं उग्र रूप धर
नमन ग्रहण कर हो प्रसन्न तुम, नहीं जानता तुम्हें ईश्वर !

केशव बोले, मैं ही काल हूँ, मैं विनाश हेतु आया हूँ
केवल पांडव शेष रहेंगे, अन्यों का अंत लाया हूँ

युद्ध हेतु तत्पर हो जाओ, यश के भागी बनो हे अर्जुन
मेरे द्वारा मारे जा चुके, निमित्त मात्र बनो तुम अर्जुन 

Saturday, June 11, 2011

भगवद्गीता का भावानुवाद


चतुर्थ अध्याय
(ज्ञानकर्मसन्यासयोग)

कल्प आदि में दिया सूर्य को, यह अविनाशी ज्ञान, योग का
सूर्य से पहुँचा पुत्र मनु तक, मनु से इक्ष्वाकु तक पहुँचा

परंपरा से चला योग यह, कुछ पीढ़ी तक रहा जागृत
लुप्त हो गया फिर पृथ्वी से, आज पुनः कर रहा अनावृत

तू है मेरा भक्त व सखा, अति प्रिय, मुझे है प्यारा
वही पुरातन योग कह रहा, अति उत्तम रहस्य यह न्यारा

अर्जुन ने झट प्रश्न किया, केशव ! तुम तो अब जन्मे हो
जन्म सूर्य का अति पुराना, कैसे कहूँ, तुम सत्य हो

तेरे व मेरे तो अब तक, जन्म हो चुके हैं अनंत
मै जानता, तू न जाने, इसीलिए तू है संतप्त

मै अजन्मा, अविनाशी हूँ, ईश्वर हूँ इस जग का
ले आश्रय योगमाया का, वेश धरा करता नर का

जब-जब धर्म की होती हानि, बढ़ता जाता है अधर्म
तब-तब मैं प्रकट होता हूँ, बन मानव निभाता धर्म

सज्जनों की बढ़ती हो जग में, दुर्जन न फल-फूलने पाएँ
युग-युग में आता हूँ जिससे, धर्म पताका  लहराए

मेरे जन्म-मरण दिव्य हैं, जो इस तत्व को जान सके
वह जीते जी मुक्त हो गया, वह नर ही मुझको पा सके

राग, भय व क्रोध मिटाकर, भक्त हुए मेरे कितने
प्रेमपूर्वक भजकर मुझको, ज्ञानी जन पा सके मुझे

जो मुझको जैसे भजता है, मै भी उसको वैसे चाहूँ
सभी अनुसरण करते मेरा, मैं ही उनको नाच नचाऊँ

जो कर्मों के फल में उत्सुक, वे देवों का पूजन करते
देव शीघ्र ही फल दे देते, जो न भक्ति, ज्ञान चाहते

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, ये चार वर्ण मैंने ही बनाये
इतने पर भी जान अकर्ता, सृष्टिक्रम मैंने ही चलाए

कर्मों का फल नहीं चाहता, कर्मों से होता नहीं लिप्त
जो तत्व से जाने मुझको, वह भी रहता सदा अलिप्त