पंचतत्व महादानी हैं
बड़े प्यार से हर शै थामे
इक नीला सा मंडप अनंत,
आसमान की चादर ओढ़े
घूम रहे नक्षत्र निर्द्वन्द्व !
गति भरे अनिल कण-कण में
शहर बादलों के बस जाते,
महासागरों से ले अमृत
बूंद-बूंद उनमें भर जाते !
रवि धरे है जाने कब से
लपटों का इक महा बवंडर,
सृष्टि का यह चक्र चलाए
अग्नि का इक घोर समन्दर !
श्यामल धरती अंकुआती है
पोषण करती संतानों का,
युगों- युगों से धन-धान्य दे
उन्नत करती बलवानों को !
देते रहने में सुख मानें
पंचतत्व महादानी हैं
तृप्त सदा स्वयं में रहते
पंचभूत महाज्ञानी हैं !
अनिता निहालानी
१ अप्रैल २०११