Showing posts with label man. Show all posts
Showing posts with label man. Show all posts

Thursday, May 19, 2011

एक असीम गीत भीतर है


एक असीम गीत भीतर है


निर्मल जैसे शुभ्र हिमालय
स्वयं अनंत है व्यक्त न होता
यही उहापोह मन को डसता !

एक असीम गीत भीतर है
गूंज रहा जो प्रकट न होता
यही उहापोह मन को खलता !

खिल न पाता हृदय कुसुम तो
कलिका बनकर भीतर घुटता
 यही उहापोह मन में बसता !

सुरभि निखालिस कैद है जिसकी
ज्योति अलौकिक कोई ढकता 
यही उहापोह लिये तरसता !

सबके उर की यही कहानी
कह न पाए कितना कहता
 देख उहापोह मन है हँसता !

अनिता निहालानी
२० मई २०११






Monday, February 14, 2011

मन की दुनिया अजब निराली

मन की दुनिया अजब निराली

भीतर कितने भेद छिपाए
बाहर रूप बदल कर आये,
द्वन्द्वों का शिकार हुआ जो
मन हाँ पागल मन कहलाये !

मन मतवाला हुआ डोलता
 स्वयं ही स्वयं के राज खोलता,
कभी प्रीत के गीत सुनाये
वाणी व्रज सी कभी बोलता !

जाने कहाँ कहाँ की बातें
रचता खुद घातें-प्रतिघातें,
स्वयं आहत हो मरहम धरता
स्वयं से करता नई मुलाकातें !

मन की दुनिया अजब निराली
अनजानी भी देखीभाली
मन के पार न जाने देती
भूलभुलैया उलझन वाली !

अनिता निहालानी
१४ फरवरी २०११  

Saturday, February 5, 2011

पावन गोपियों के प्रेम सम


पावन गोपियों के प्रेम सम

मन खाली है
क्या बोले !
मन खाली है
क्यों बोले !

हम जो न माटी थे न आकाश
उलझे रहे पंचभूतों के जाल में
शिकार हुए द्वन्द्वों के,
औरों को किया !

हम जो हैं शुद्ध, बुद्ध, निर्मल
सुखातीत, दुखातीत
धवल हिम शखिर से अमल
पावन गोपियों के प्रेम सम !

अनिता निहलानी
५ फरवरी २०११