एक असीम गीत भीतर है
निर्मल जैसे शुभ्र हिमालय
स्वयं अनंत है व्यक्त न होता
यही उहापोह मन को डसता !
एक असीम गीत भीतर है
गूंज रहा जो प्रकट न होता
यही उहापोह मन को खलता !
खिल न पाता हृदय कुसुम तो
कलिका बनकर भीतर घुटता
यही उहापोह मन में बसता !
सुरभि निखालिस कैद है जिसकी
ज्योति अलौकिक कोई ढकता
यही उहापोह लिये तरसता !
सबके उर की यही कहानी
कह न पाए कितना कहता
देख उहापोह मन है हँसता !
अनिता निहालानी
२० मई २०११