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Tuesday, December 13, 2011

समाधि निरूपण (शेषभाग)



श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि



समाधि निरूपण

अहर्निश अभ्यास सतत् हो, मन ब्रह्म में लीन निरंतर
निर्विकल्प समाधि द्वारा, आनंद का अनुभव हो भीतर

इसी समाधि के अनुभव से, नष्ट हुई कामना ग्रंथि
कर्मों का भी लोप हुआ फिर, स्वतः हुई स्वरूप की सिद्धि

मनन श्रेष्ठ सौ गुना श्रवण से, लाख गुना श्रवण से ध्यान
अनंत गुना श्रेष्ठ समाधि, जिससे चित्त को होता ज्ञान

निर्विकल्प समाधि द्वारा, ब्रह्मज्ञान का होता अनुभव
मन की एक अवस्था चंचल, अन्य अवस्था भी है संभव

शांत हुए मन से अचल हो, चित्त ब्रह्म में हो स्थिर
ब्रह्म आत्मा के ऐक्य से, ध्वंस करो अज्ञान जो भीतर

मौन, अपरिग्रह और अलोभ, अकाम व एकांत निवास
योग का पहला द्वार यही है, इससे ही होता आभास

चित्त वृत्तियों के निषेध से, नाश कामना का होता
नहीं वासना शेष रहे तब, ब्रह्मानंद का अनुभव होता

वाणी का मन में लय होवे, मन का बुद्धि में हो लय
बुद्धि का साक्षी आत्मा में, आत्मा पूर्णब्रह्म में लय

देह, प्राण, इंद्रिय, मन के, या बुद्धि के सँग हो वृत्ति
उसी भाव का बोध रहेगा, जिसके साथ जुड़ेगी वृत्ति

इन उपाधियों से छूटा मन, जब खाली हो जाता है
तत्क्षण ब्रह्म झलकता उसमें, आनंद अनुभव आ जाता है 

Monday, December 12, 2011

समाधि निरूपण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि



समाधि निरूपण
निर्विकल्प समाधि द्वारा, आत्म स्वरूप का ज्ञान जो करता
अविद्या रूप हृदय ग्रंथि का, नाश तभी हुआ करता

परम आत्मा अद्वितीय है, ‘मैं’ ‘तू’ यह कल्पना उसमें
विघ्न रूप बनकर आती है, सविकल्प समाधि में

इन्द्रिय निग्रह योगी करता, विषयों से उपरति साधता
शांत चित्त से, क्षमा युक्त हो, समाधि का अभ्यास है करता

अविद्या से उत्पन्न हुए जो, ध्वंस करे हर एक विकल्प
आनंद पूर्वक ब्रह्म भाव में, रहे निष्क्रिय, निर्विकल्प

मन और इन्द्रियों को जो, लीन आत्मा में करता
जग बंधन से वही मुक्त है, न वह जो बस चर्चा करता

उपाधि के संयोग से ही, भेद आत्मा में होता
लय होने पर उपाधि का, केवल स्वयं ही रह जाता

एकाग्र चित्त हुआ साधक, सत्स्वरूप ब्रह्म में टिकता
ब्रह्म रूप ही हो जाता, ज्यों कीट भ्रमर होता

ध्यान मात्र करने से भ्रमर का, कीट भ्रमर हो जाता है
परमतत्व का चिंतन करते, परम भाव साधक पाता है

अति सूक्ष्म परमात्व तत्व है, स्थूल दृष्टि से कोई न जाने
अति सूक्ष्म बुद्धिमान ही, सूक्ष्म वृत्ति से उसको जाने

जैसे जलकर स्वर्ण शुद्ध हो, सभी मैल को तज देता है,
ध्यान अग्नि में मन जलने पर, तीनों गुण के पार हुआ है