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Monday, January 2, 2012

प्रपञ्च का बाध


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


प्रपञ्च का बाध

आत्मा में जो भी आरोपित, हर कल्पना का करे निरास
स्वयं अद्वितीय, अक्रिय पूर्ण, परब्रह्म सा करे विलास

मन जब स्थिर हुआ स्वयं में, निर्विकल्प ब्रह्म ही रहता
दृश्य, विकल्प खो जाता सब, कहने मात्र को ही रह जाता

एक ही तत्व ब्रह्म है केवल, जग मिथ्या कल्पना मात्र
निर्विकार है निराकर जो, भेद नहीं होता तब ज्ञात

द्रष्टा, दृश्य, दर्शन से शून्य, निर्विकार बस एक तत्व है
भेद नहीं जब उसमें संभव, कैसे जग का पृथक अस्तित्त्व है

प्रलयकाल का सागर हो ज्यों, कुछ भी शेष नहीं रहता
उसी एक में सब खो जाता, जगत ब्रह्म में लीन हो जाता

ज्यों प्रकाश में लीन हुआ तम, भ्रम लीन होता ज्ञान में
वह अद्वितीय, निर्विशेष तत्व, भेद सभी खो जाते उसमें

एकात्मक अद्वितीय तत्व है, भेद भला क्योंकर होता
सुख-स्वरूप सुषुप्ति में ज्यों, कोई भेद नहीं रहता

परमतत्व का बोध हुआ तो, विश्व कहीं खो जाता है
रज्जु सर्प में ज्यों खो जाती, जल मरीचिका में खो जाता

श्रुति का भी तो यही कथन है, द्वैत है केवल मिथ्या माया
एक ही अद्वैत तत्व है, भ्रम से ही जग जिसमें पाया

Monday, December 12, 2011

समाधि निरूपण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि



समाधि निरूपण
निर्विकल्प समाधि द्वारा, आत्म स्वरूप का ज्ञान जो करता
अविद्या रूप हृदय ग्रंथि का, नाश तभी हुआ करता

परम आत्मा अद्वितीय है, ‘मैं’ ‘तू’ यह कल्पना उसमें
विघ्न रूप बनकर आती है, सविकल्प समाधि में

इन्द्रिय निग्रह योगी करता, विषयों से उपरति साधता
शांत चित्त से, क्षमा युक्त हो, समाधि का अभ्यास है करता

अविद्या से उत्पन्न हुए जो, ध्वंस करे हर एक विकल्प
आनंद पूर्वक ब्रह्म भाव में, रहे निष्क्रिय, निर्विकल्प

मन और इन्द्रियों को जो, लीन आत्मा में करता
जग बंधन से वही मुक्त है, न वह जो बस चर्चा करता

उपाधि के संयोग से ही, भेद आत्मा में होता
लय होने पर उपाधि का, केवल स्वयं ही रह जाता

एकाग्र चित्त हुआ साधक, सत्स्वरूप ब्रह्म में टिकता
ब्रह्म रूप ही हो जाता, ज्यों कीट भ्रमर होता

ध्यान मात्र करने से भ्रमर का, कीट भ्रमर हो जाता है
परमतत्व का चिंतन करते, परम भाव साधक पाता है

अति सूक्ष्म परमात्व तत्व है, स्थूल दृष्टि से कोई न जाने
अति सूक्ष्म बुद्धिमान ही, सूक्ष्म वृत्ति से उसको जाने

जैसे जलकर स्वर्ण शुद्ध हो, सभी मैल को तज देता है,
ध्यान अग्नि में मन जलने पर, तीनों गुण के पार हुआ है