Showing posts with label मारीच. Show all posts
Showing posts with label मारीच. Show all posts

Monday, August 10, 2026

रावण का मारीच के कहने से लंका को लौट आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


इसका बदला लेने हेतु, उनकी स्त्री को हरना चाहता 

मेरा सहयोग करो इसमें, सुनकर यह मारीच तब बोला 


निशाचर शिरोमणे !  कहो यह, किसने तुमको यह सलाह दी

कौन तुम्हारा भला न चाहे, किसे तुम्हारी परवाह नहीं  


नाम बताओ मुझको उसका, राक्षस जगत का जो शत्रु है 

विषधर सर्प के मुख से वह, दाँत उखड़वाना चाहता है 

 

 ऐसी खोटी सलाह दी किसने, कुमार्ग पर ले आया है 

सुखपूर्वक सोते समय, मस्तक पर आघात लगाया है 


 जिनकी गंध से भागें गजराज, श्रीराम वह गजराज हैं

विशुद्ध कुल में जन्म है उनका, वही उनका शुण्ड दंड है 


मद उनका प्रताप जान लो, सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत 

उनकी ओर देखना कठिन है, जूझने की क्या करें बात 


मनुष्य रूप में राम सिंह हैं, समरभूमि में संधि व बाल 

राक्षस मानो मृग हैं उनके, बाण अंग, तलवार है दाढ़ 


नहीं जगा सकते हो तुम उस, सोते हुए सिंह राम को 

महासागर समान हैं राम, उचित नहीं है उसमें कूदो 


धनुष ही उस सागर का ग्राह, भुजाओं का वेग है कीचड़ 

बाण तरंगें, युद्ध जलराशि, मुख उसका जैसे बड़वानल 


लंकेश्वर प्रसन्न हो जाओ, सकुशल तुम लंका को लौटो 

रमण करो निज स्त्रियों संग, राम को सीता संग रहने दो 


मारीच के यह  कहने पर, दशमुख रावण लंका लौटा

शत्रुता की बात भुलाकर, वह अपने महल में चला गया  

  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में एकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Friday, August 7, 2026

रावण का मारीच के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


देव-असुर दोनों मिलकर भी, उन्हें कभी हरा नहीं सकते  

बहुत ध्यान देकर अब सुनिए, जिस उपाय से वे मर सकते


सीता हैं श्रीराम की पत्नी, जग की सर्वोत्तम सुंदरी

युवा, सुडौल अंग हैं उनके, आभूषणों से सजी रहतीं 


स्त्रियों में रत्न हैं सीता, कोई भी नहीं बराबर उनके 

देव, गंधर्व, नाग कन्या, अप्सरा भी समान नहीं उनके 


 सीता का करें आप अपहरण, किसी तरह राम को छलकर

जीवित नहीं रहेंगे श्रीराम, सीता से बिछुड़ जाने पर 


बात पसंद आयी रावण को, उसने यह अकम्पन से कहा

 प्रातः ही सारथि संग जाकर, सीता को लाऊँगा यहाँ 


ऐसा कहकर गधों से जुते, तेजस्वी रथ पर सवार हो 

रावण ने प्रस्थान किया था, कर प्रकाशित सब दिशाओं को 


नक्षत्रों के मार्ग पर चलता, चन्द्र समान सुशोभित होता 

 ढका हुआ बादलों के मध्य, रावण का रथ जहाँ विचरता 


एक आश्रम में जाकर वह, ताड़का पुत्र मारीच से मिला 

भक्ष्य भोज्य अर्पित कर उसने, रावण का शुभ सत्कार किया 


आसन व जल आदि देकर, करके पूजन उसका हाल लिया 

कुशल तो है राज्य में तुम्हारे, मन में लगा है कुछ खटका 


बड़ी उतावली से आये हो, लगता है, सब ठीक नहीं  

मारीच के प्रश्नों को सुनकर, रावण ने यह बात कही 


अनायास ही श्रीराम ने, मार गिराये दोनों खर-दूषण 

सीमा की रक्षा जो करते, जनस्थान के मारे राक्षस

 

Wednesday, December 18, 2013

श्री राम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रिंश सर्गः
श्री राम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार

तत्पश्चात देशकालज्ञ, राम, लक्ष्मण दोनों बोले
कब करते आक्रमण निशाचर, कहीं चूक न हो हमसे

हैं तैयार युद्ध हेतु वे, हर्षित हुए जान मुनि अन्य
विश्वामित्र अब मौन रहेंगे, दीक्षा लेकर हुये हैं धन्य

सावधान हो दोनों वीर, छह रात्रि तक करें सुरक्षा
नींद और विश्राम थे त्यागे, अंततः आया दिन छठा

श्रीराम ने कहा लखन से, सावधान हो, रहो समाहित
कह ही रहे थे अभी राम, जब वेदी सहसा हुई प्रज्वलित

राक्षसों का उत्पात था, वेदी का जलना था सूचक
बड़ा भयंकर शब्द हुआ फिर, वेद मंत्र गूंजते थे जब

मेघ घेर लेते ज्यों नभ को, दो राक्षस माया धारी
दौड़े चले आ रहे थे, लिए साथ में अनुचर भारी

धाराएँ रक्त की बहाते, आकाश में स्थित थे वे
रामचन्द्र जी सहसा दौड़े, देख उन्हें लक्ष्मण से बोले

आ पहुंचे दुराचारी वे, मानवास्त्र से दूर भगाऊँ
जैसे वायु वेग से बादल, नहीं चाहता इन्हें मैं मारूं

कहकर ऐसा श्री राम ने, मानवास्त्र का किया संधान
बड़े रोष में भरकर फिर, मारीच को मारा बाण

सौ योजन दूर जा गिरा, था आघात बड़ा गहरा
शीतेषु मानवास्त्र से, हो अचेत सा चला जा रहा

प्राण नहीं लेता है उसके, लक्ष्मण से कहा राम ने
मार गिराता अब अन्यों को, विघ्न डालते जो यज्ञ में

आग्नेयास्त्र का कर प्रयोग, सुबाहु को मार गिराया
वायवास्त्र से अन्यों का वध, कर मुनियों को हर्षाया

पूर्वकाल में देवराज ज्यों, महर्षियों से हुए थे वन्दित
ऋषियों द्वारा उसी प्रकार, श्रीराम भी हुए सम्मानित

यज्ञ समाप्त हुआ जब मुनि का, विघ्न हीन दिशाएँ देखीं
कहा राम से, हुआ कृतार्थ मैं, आज्ञा तुमने मानी गुरु की



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसवां सर्ग पूरा हुआ.

Friday, August 23, 2013

विश्वामित्रजी का ताटका वध के लिए प्रेरित करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


पंचविंशः सर्गः

श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उनसे ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका वध के लिए प्रेरित करना

अपरिमित प्रभावशाली जो, विश्वामित्र का कथन सुना जब
पुरुष सिंह श्रीरामचन्द्र ने, अति शुभ यह वचन कहा तब

मुनिश्रेष्ठ, जब अबला है वह, उसका बल थोड़ा ही होगा
एक हजार हाथियों का बल, कैसे उसमें सम्भव होगा

अमित तेजस्वी रघुनाथ के, कहे हुए इस वचन को सुनकर
 राम, लक्ष्मण को हर्षित कर, कहे मुनि ने वचन मधुर

सत्य कहा, वह अबला ही थी, वर पाकर वह सबल हुई है
किस कारण वर पाया उसने, सुनो कथा जो मैंने कही है

पूर्वकाल की बात है यह, था एक महान यक्ष सुकेतु
बड़ा पराक्रमी, सदाचारी भी, की तपस्या पुत्र के हेतु

ब्रह्माजी प्रसन्न हुए पर, कन्या रत्न का दान किया
एक हजार हाथियों का बल, उन्होंने ही प्रदान किया

बढ़ने लगी यक्ष बालिका, रूपवती यौवन पाया
जम्भू पुत्र सुन्द से तब, पिता ने उसका ब्याह रचाया

कुछ काल के बाद उसे, दुर्जय पुत्र मारीच हुआ
दे शाप अगस्त्य मुनि ने, राक्षस उसको बना दिया

 मुनि द्वारा पति सुन्द भी, मारा गया था शापित होकर
मुनिवर को मारने हेतु, पुत्र सहित थी ताटका तत्पर

कुपित हुई दौड़ी गरजती, मुनि को खा जाने के हेतु
मारीच को शाप दिया तब, देव योनि से निष्कासन हेतु

फिर अत्यंत अमर्ष में भरकर, शाप दिया ताटका को भी
तू है वैसे महा यक्षिणी, नरभक्षण कर बन राक्षसी

इस प्रकार शाप मिलने से, क्रोधित हो उठी ताटका
 सुंदर वन को दिया उजाड़, जहाँ मुनिवर का निवास था

वध कर डालो इस राक्षसी का, गौओं व ब्राह्मणों के हित
कोई नहीं समर्थ है इसमें, करो रघुकुल को आनन्दित

नहीं दिखाओ करुणा इस पर, राजपुत्र का धर्म यही है
चारों वर्णों का यदि हित हो, स्त्री वध भी तब उचित है

प्रजापालक नरेश प्रजाहित, दोषयुक्त कर्म भी करते
क्रूरकर्म में भी यदि उनको, होना हो रत नहीं वे रुकते

राज्य भार हो जिनके ऊपर, उनका तो यह धर्म सनातन  
महापापिनी है ताटका, वध उचित है धर्मविहीन

पूर्वकाल में हुई मंथरा, थी विरोचन की जो पुत्री
इंद्र ने वध किया उसका, थी पृथ्वी नाश की इच्छा उसकी

शुक्राचार्य की माता थी जो, भृगु की पतिव्रता पत्नी थी
विष्णु ने वध किया था उसका, जग इंद्र शून्य करना चाहती थी

इसी तरह अन्यों ने भी, किया दुष्ट स्त्रियों का वध
दया या नफरत को त्याग कर, कर डालो ताटका का वध

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पच्चीसवां सर्ग पूरा हुआ.





Thursday, April 19, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
नारद जी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेप से श्रीरामचरित्र सुनाना 


खबर सुनी कुटुंब वध की, अति क्रोध से हुआ मूर्छित
रावण नामक असुर मिला, मारीच से सहायता हित

समझाया मारीच ने उसको, राम बली हैं, विरोध न करो
किन्तु काल की प्रेरणा ही थी, टाल गया उसके वचनों को

मायावी मारीच के द्वारा, राम, लखन को दूर हटाया
स्वयं सीता का हरण किया, जटायु को मार गिराया

आहत देख जटायु को, सुन कर सीता हरण की बात
व्याकुल होकर करें विलाप, हुए शोक से पीड़ित राम

उसी शोक में डूबे रहकर, किया खग का अंतिम संस्कार
गए खोजने सीता को जब, कबंध असुर का किया संहार

मृत्यु से पहले कबंध ने, शबरी का पता बतलाया
दशरथ सुत रामने स्वयं को, सन्यासिनी के आश्रम पर पाया

शबरी ने किया पूजन उनका, थे शत्रुहन्ता, तेजस्वी राम
धर्म परायणा शबरी से मिल, पम्पासर में मिले हनुमान