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Wednesday, August 5, 2026

अकम्पन का रावण को राम की महिमा बताना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


 संग हैं छोटे भाई लक्ष्मण, जो उनके समान बलवान 

 मुख मण्डल उनका अति शोभन, पूर्णिमा के चंद्रमा समान


रक्तिम आँखें, स्वर है गंभीर, ज्यों हो वायु अग्नि के साथ

श्रीराम अति प्रबल वीर हैं, संयुक्त हुए भाई के साथ


जनस्थान उजाड़ा उन्होंने, कोई नहीं है उनके साथ

न ही मुनि, न कोई देवता, पूर्णतया निश्चित यह बात  


श्रीराम के छोड़े हुए बाण, सोने की पाँख वाले थे 

पाँच मुख वाले सर्प बने वे, राक्षसों को खा जाते थे 


भय से कातर हुए राक्षस, जिस-जिस ओर भी भागा करते  

वहाँ-वहाँ श्रीराम को सदा, सम्मुख अपने खड़ा देखते 


इस तरह अकेले ही उन्होंने, जनस्थान का विनाश किया 

अकम्पन की बात यह सुनकर, रावण ने तुरंत वचन कहा 


लक्ष्मण सहित राम को मारने, जनस्थान अभी जाता हूँ 

सुनकर यह अकम्पन बोला, राम का पुरुषार्थ सुनाता हूँ 


यदि क्रोधित हों जायें राम, उन्हें नहीं नियंत्रित कर सकते

बाणों से भरे हुए नद के, वेग को वे पलट हैं सकते 


तारा, ग्रह, नक्षत्रों सहित, नभमण्डल को कष्ट दे सकते 

सागर में डूबती पृथ्वी को, वे निज बल से उठा सकते 


 महासागर की मर्यादा का भी, वे ह्रास कर सकते हैं 

बाणों से समुद्र का वेग, नष्ट वायु वेग कर सकते हैं


महायशस्वी वीर पुरुषोत्तम, लोकों का करके संहार 

नये सिरे से सृष्टि कर सकते, यदि करें वे इसका विचार 


जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर, निज अधिकार नहीं पा सकते 

उसी प्रकार आप व राक्षस, श्रीराम को जीत नहीं सकते


Tuesday, July 28, 2026

अकम्पन का रावण को जनस्थान के विनाश का समाचार देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:


रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


उसके बाद जनस्थान से, अकम्पन नामका एक राक्षस

शीघ्रता से लंका जा पहुँचा, बोला यह रावण से मिलकर  


 जनस्थान के सभी राक्षस, मारे गये हैं खर के साथ 

किसी तरह यहाँ पहुँचा मैं, राजन् ! बचा के अपनी जान 


सुनते ही दशमुख रावण की, आँखें हुईं रक्तिम क्रोध से

 भरा रोष में अति राक्षस,  मानो कर डालेगा भस्म उसे


कौन चाहता मृत्यु अपनी, जनस्थान पर कर के आक्रमण 

कौन है ऐसा दु:साहसी,  निकट आ गया है जिसका मरण 


जो भी हैं मेरे अपराधी, आश्रय कहीं न पा सकते हैं 

इंद्र, यम, कुबेर या विष्णु भी, नहीं चैन से रह सकते हैं 


हूँ मैं काल काल का भी, ज्वाला को भी जला सकता हूँ

मौत को भी मृत्यु के मुख में, चाहने पर सुला सकता हूँ 


मैं यदि क्रोध में भर जाऊँ तो, वायुदेव की गति रोक दूँ 

दिनकर और अग्नि को भी मैं, निज प्रताप से वहीं ठोक दूँ 


रावण को क्रोधित हुआ देखा, भयभीत हो गया अकम्पन 

हाथ जोड़ की अभय याचना, निकला न मुख से कोई वचन 


राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने, दिया उसे अभयदान तब 

प्राण शेष रहेंगे उसके, संशय रहित हो बोला वह तब 


 दशरथ के पुत्र श्रीराम, पंचवटी में आकर रहते हैं 

सिंह समान गठन तन की, कंधे मोटे, भुजाएँ गोल हैं 


तन का रंग साँवला उनका, यशस्वी और तेजस्वी हैं 

उनके बल और पराक्रम की, कहीं कोई तुलना नहीं है 


धनुर्धरों में बहुत श्रेष्ठ हैं, अद्भुत है उनकी युद्ध कला 

जनस्थान में रहने वाले, खर-दूषण का वध कर डाला 


अकम्पन की बातें सुनकर यह, रावण ने दीर्घ श्वासें ली 

क्या देवों के संग आये हैं, अकम्पन ! बताओ तो सही 


अकम्पन ने एक बार फिर, राम के बल का किया बखान 

दिव्यास्त्रों के प्रयोग में भी, श्रीराम हैं पूर्णत: संपन्न