Monday, March 3, 2014

ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रयसि्ंत्रशः सर्गः

राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमा शीलता की प्रंशसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह 

वही ब्रह्मदत्त राजा होकर, काम्पिल्या नगरी में रहते
थे सम्पन्न लक्ष्मी से वैसे, जैसे इंद्र स्वर्ग में बसते

तब नरेश कुशनाभ ने उनको, कीं समर्पित वे कन्यायें  
ब्रह्मदत्त ने किया विवाह, क्रमशः उनसे वे हर्षाये

स्पर्श हुआ उनके हाथों का, कुब्जदोष से हुईं रहित वे
उत्तम शोभा से सम्पन्न भी, स्वस्थ अति प्रफ्फुलित वे

वातरोग के रूप में आये, अब वायुदेव ने छोड़ दिया
कुशनाभ थे जान यह हर्षित, आदर सहित विदा किया

गन्धर्वी सोमदा ने भी, स्वागत किया यथोचित उनका
एक-एक कर हृदय से लगाया, अभिनन्दन किया सबका

  
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैतीसवां सर्ग पूरा हुआ.



Friday, February 21, 2014

राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमा शीलता की प्रंशसा

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रयसि्ंत्रशः सर्गः

राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमा शीलता की प्रंशसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह

सुन राजा कुशनाभ का वचन, कन्याओं ने कहा प्रणाम कर
धर्म पर दृष्टि नहीं थी उनकी, संचारी सर्वत्र वायु देव

उनसे हमने यही कहा था, देव ! हो कल्याण आपका
पिता हमारे विद्यमान हैं, उनसे कह करें वरण हमारा

किन्तु न मानी बात उन्होंने, मन पाप से बंधा हुआ था
धर्मयुक्त थी बात हमारी, फिर भी हमको दी है पीड़ा

राजा ने जब बात सुनी यह, उतम कन्याओं को बोले
उत्तम कार्य किया है तुमने, क्षमा महापुरुष ही करते

स्त्री हो या पुरुष सभी का, आभूषण है क्षमा का गुण
कुल की मर्यादा का पालन, कामभाव से मुक्त रही तुम

देवों के लिए भी दुष्कर, तुम सब में है वही सहिष्णुता
क्षमा दान है, सत्य भी है वह, यज्ञ, यश और धर्म क्षमा

तब देवतुल्य कुशनाभ ने, दी आज्ञा भीतर जाने की

किया विचार मंत्रियों के संग, चर्चा की उनके विवाह की 

Tuesday, February 18, 2014

कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

द्वात्रिंशः सर्गः
ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोण भद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की  सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना 

वायुदेव किया करते हैं, कर्म महान कई अनायास ही
कथन सुना जब उनका, हँसकर, सौ कन्याएं तब बोलीं

प्राणवायु के रूप में प्रतिपल, सुरश्रेष्ठ हे ! आप विचरते  
अनुपम अति प्रभाव आपका, हम सब भली भांति जानते

ऐसी दशा में क्यों करते, यह अनुचित प्रस्ताव आप यह
होता इससे अपमान हमारा, देख नहीं पाते क्यों यह

कुशनाभ की कन्याएं हम, शाप आपको दे सकती  
नहीं करेंगी किन्तु ऐसा, निज तप को बचा रखतीं

ऐसा समय कभी न आये, अवहेलना पिता की करके
कामवश या कभी अधर्म से, स्वयं ही वर अपना ढूँढें

हम पर है प्रभुत्व पिता का, वे ही हैं देवता हमारे
वही पति हमारा होगा, जिसके हाथ हमें सौपेंगे

कुपित हुए तब वायुदेवता, प्रविष्ट हुए उनके भीतर
सब अंगों को टेढ़ा करने, कुबड़ी हुईं देह मुड़ने पर

अति लज्जित व उद्ग्विन हुईं वे, आँखों से आश्रू बहते  
राजमहल में किया प्रवेश जब, राजा देख उन्हें घबराए

किसने की अवहेलना धर्म की ?, किसने तुम्हें बनाया ऐसा ?
 क्यों चुप हो तुम, तड़प रही हो, दीर्घ श्वास ले बैठे राजा  


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बत्तीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Wednesday, February 12, 2014

ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

द्वात्रिंशः सर्गः
ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोण भद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की  सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना

कहा मुनि ने, हे श्री राम, महातपस्वी इक राजा थे
ब्रह्मा के पुत्र साक्षात, पूर्वकाल में कुश नाम के

हर संकल्प पूर्ण होता था, उनका बिना किसी बाधा के
सत्पुरुषों का करते आदर, धर्म के ज्ञाता व महान थे

उतम कुल वाली पत्नी से, जो थी विदर्भ की राजकुमारी
चार पुत्र पाए राजा ने,  थे सभी महान बड़े उत्साही

कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्त-रजस, व वसु नाम उन चारों के थे
राजा कुश प्रजा रक्षक थे, पुत्र सभी सत्यवादी थे

पिता ने आज्ञा दी पुत्रों को, पालन प्रजा का करें सभी
पृथक नगर बनवाये सबने, प्रथम पुत्र का था ‘कौशाम्बी’

कुशनाभ का नगर ‘महोदय’, ‘धर्मारण्य’ असूर्त-रजस का
‘वसुमती’ के नाम से प्रचलित, नगरव्रज था राजा वसु का

पांच श्रेष्ठ पर्वत भी सुशोभित, वसुमती के थे चारों ओर
सुंदर सोन नदी आयी है, दक्षिण-पश्चिम से यहाँ बहकर

‘सुमागधी’ नाम से सोन, मगध देश में जानी जाती
पांच पर्वतों के मध्य यह, माला की भांति है लगती

सुंदर उपजाऊ खेत हैं, दोनों तट पर सोन नदी के
पूर्वोत्तर की ओर यह बहती, शोभित हरी—भरी खेती से

घृताची अप्सरा के द्वारा, राजर्षि कुशनाभ ने
सौ कन्याएं भी पाई थीं, सब की सब सुंदर थीं वे

एक दिन सुसज्जित होकर, नृत्य-गीत में डूबी थीं वे
उत्तम गुणों से थीं सम्पन्न, देख उन्हें कहा वायु देव ने

सुन्दरियों, मैं तुम्हें चाहता, बनो सभी मेरी भार्याएँ
त्याग करो मनुष्य भाव का, दीर्घ आयु पाओगी इससे

युवावस्था नहीं है स्थिर, मानव देह में क्षीण जो होती
मुझसे जुड़ अमर हो जाओ, अक्षय यौवन प्राप्त करोगी



Thursday, January 30, 2014

संध्या के समय शोणभद्र तट पर विश्राम

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

एकत्रिंश सर्गः

श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियों सहित विश्वामित्र का मिथिला को प्रस्थान तथा मार्ग में संध्या के समय शोणभद्र तट पर विश्राम

है सम्मानित धनुष महल में, पूजनीय देव की भांति
पूजा होती नियमित उसकी, देकर धूप, अगुरु सुगन्धि

कहकर ऐसा विश्वामित्र ने, आज्ञा ले ली वन-देवों से
राम-लक्ष्मण व ऋषियों संग, तत्क्ष्ण किया प्रस्थान वहाँ से

उत्तर दिशा की ओर चले वे, पीछे पीछे थे महर्षि
सिद्धाश्रम के जो भी निवासी, चले संग मृग व पक्षी

लौटाया पशु, पंछियों को, कुछ दूर तक आगे जाकर
सूर्य अस्त होने को आया, पहुंचे शोणभद्र के तट पर

अग्निहोत्र किया स्नान कर, वहीं पड़ाव डाल सब बैठे
उस देश का परिचय पूछा, कौतुहल वश श्रीराम ने

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इकतीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Saturday, January 11, 2014

श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियों सहित विश्वामित्र का मिथिला को प्रस्थान तथा मार्ग में संध्या के समय शोणभद्र तट पर विश्राम

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

एकत्रिंश सर्गः

श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियों सहित विश्वामित्र का मिथिला को प्रस्थान तथा मार्ग में संध्या के समय शोणभद्र तट पर विश्राम

कृतकृत्य हुए राम-लक्ष्मण, यज्ञ शाला में किया शयन
दोनों वीर प्रसन्न अति थे, उर उल्लास से था परिपूर्ण

प्रातः काल में दोनों भाई, नित्य-नियम पूरा करके
साथ-साथ जा निकट मुनि के, कर प्रणाम ये वचन कहे

आज्ञा दें अब जो करना है, सेवा में हम हैं आपकी
उन दोनों के कहने पर ये, बोले तब मुनिवर तेजस्वी

 मिथिला के राजा जनक का, परम धर्ममय यज्ञ हो रहा
 मेरे साथ तुम्हें चलना है, एक धनुष अद्भुत है वहाँ

फलरूप में किसी यज्ञ के, माँगा था मिथिला नरेश ने
हो प्रसन्न प्रदान किया था, शंकर सहित देवताओं ने  

पूर्वकाल में कभी पधारे, धनुष दिया था देवों ने वह
अति भयंकर, प्रकाश मान, अति प्रबल, और भारी वह

मानव की तो बात क्या करें, देव, असुर या हों राक्षस
प्रत्यंचा उस महा धनुष की, हैं असमर्थ चढ़ाने में सब

कितने राजा, राजकुमार भी, पता लगाने आगे आये
शक्ति का न पार पा सके, प्रत्यंचा चढ़ा न पाए

वहाँ चलोगे पुरुष सिंह तुम, देख सकोगे धनुध यज्ञ वह
मध्यभाग अति सुंदर है, जिससे पकड़ा जाता है वह


Wednesday, December 18, 2013

श्री राम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रिंश सर्गः
श्री राम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार

तत्पश्चात देशकालज्ञ, राम, लक्ष्मण दोनों बोले
कब करते आक्रमण निशाचर, कहीं चूक न हो हमसे

हैं तैयार युद्ध हेतु वे, हर्षित हुए जान मुनि अन्य
विश्वामित्र अब मौन रहेंगे, दीक्षा लेकर हुये हैं धन्य

सावधान हो दोनों वीर, छह रात्रि तक करें सुरक्षा
नींद और विश्राम थे त्यागे, अंततः आया दिन छठा

श्रीराम ने कहा लखन से, सावधान हो, रहो समाहित
कह ही रहे थे अभी राम, जब वेदी सहसा हुई प्रज्वलित

राक्षसों का उत्पात था, वेदी का जलना था सूचक
बड़ा भयंकर शब्द हुआ फिर, वेद मंत्र गूंजते थे जब

मेघ घेर लेते ज्यों नभ को, दो राक्षस माया धारी
दौड़े चले आ रहे थे, लिए साथ में अनुचर भारी

धाराएँ रक्त की बहाते, आकाश में स्थित थे वे
रामचन्द्र जी सहसा दौड़े, देख उन्हें लक्ष्मण से बोले

आ पहुंचे दुराचारी वे, मानवास्त्र से दूर भगाऊँ
जैसे वायु वेग से बादल, नहीं चाहता इन्हें मैं मारूं

कहकर ऐसा श्री राम ने, मानवास्त्र का किया संधान
बड़े रोष में भरकर फिर, मारीच को मारा बाण

सौ योजन दूर जा गिरा, था आघात बड़ा गहरा
शीतेषु मानवास्त्र से, हो अचेत सा चला जा रहा

प्राण नहीं लेता है उसके, लक्ष्मण से कहा राम ने
मार गिराता अब अन्यों को, विघ्न डालते जो यज्ञ में

आग्नेयास्त्र का कर प्रयोग, सुबाहु को मार गिराया
वायवास्त्र से अन्यों का वध, कर मुनियों को हर्षाया

पूर्वकाल में देवराज ज्यों, महर्षियों से हुए थे वन्दित
ऋषियों द्वारा उसी प्रकार, श्रीराम भी हुए सम्मानित

यज्ञ समाप्त हुआ जब मुनि का, विघ्न हीन दिशाएँ देखीं
कहा राम से, हुआ कृतार्थ मैं, आज्ञा तुमने मानी गुरु की



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसवां सर्ग पूरा हुआ.