Wednesday, September 14, 2011

अष्टदशोऽअध्यायः मोक्षसंन्यासयोग



अष्टदशोऽअध्यायः

मोक्षसंन्यासयोग

 हे ! वासुदेव ! हे महाबाहो ! मुझे त्याग का अर्थ बताएं
सन्यास का क्या उद्द्शेय है, पृथकता से इसे समझाएं !

सकाम कर्म का त्याग ही, पंडित सन्यास से परिभाषित करते
सर्वकर्म के फल त्याग को, बुद्धिमान जन त्याग हैं कहते

कोई कहते कर्म मात्र ही, दोषपूर्ण है त्यागने योग्य
यज्ञ, तप, दान न त्यागें, कहें अन्य ये करने योग्य

गुणों के आधार पर अर्जुन, तीन तरह का त्याग भी होता
सात्विक, राजस व तामस को, पृथक-पृथक मैं तुझे बताता

मोह के वश में नियत कर्म का, जो कोई भी त्याग करे
ऐसा त्याग तामसिक होगा, जन का कोई न कल्याण करे

कष्टप्रद हैं कर्म सभी, कोई ऐसा जान यदि तजता है
रजोगुण से हुआ है प्रेरित, त्याग का फल नहीं मिलता है

कर्त्तव्य जान कर करता, फलासक्ति तज देता
वही त्याग सात्विक होगा, कल्याण को पा लेता

जो अकुशल से द्वेष करे न, कुशल कर्म में नहीं आसक्त
सतोगुणी वह बुद्धिमान जन, त्यागी है वह होगा मुक्त

जिसने फल की आशा की है, इष्ट, अनिष्ट वह फल पायेगा
मिलता मिश्रित फल भी उसको, पर सन्यासी मुक्त रहेगा  

किसी कर्म की सिद्धि अर्जुन, पांच हेतुओं पर निर्भर
कर्म का अधिष्ठान प्रथम है, कर्ता को तू दूजा मान

विभिन्न इन्द्रियां करण कहीं हैं, तीजा यह हेतु कहलाता
शेष क्रिया व दैव को जान, दैव कर्म संस्कार कहलाता

मन, वाणी, या देह से मानव जो भी कर्म किया करता
ये पाँचों ही कारण होते, यह निश्चय मैं तुझसे कहता


शुद्ध नहीं है जिसकी बुद्धि, केवल स्वयं को कर्ता माने
वह मलिन बुद्धि वाला जन, इस यथार्थ को न जाने

जिसकी बुद्धि हुई अलिप्त है, कर्मों व पदार्थों से भी
वह न किसी कर्म से बंधता, मारे न मारता हुआ भी

ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय की त्रिपुटी, कर्म प्रेरणा कहलाती
कर्ता, करण तथा क्रिया, तीनों की कर्म संग्रह जानी जाती


Monday, September 12, 2011

सप्तदशोऽअध्यायः (अंतिम भाग) श्रद्धात्रयविभागयोग


सप्तदशोऽअध्यायः (अंतिम भाग)
श्रद्धात्रयविभागयोग

देव, ब्राह्मणों, गुरुजनों का, सादर पूजन ज्ञानीजन का
शुद्धि, सरलता और अहिंसा, ब्रह्मचर्य, तप ये सब तन का

प्रिय, हितकारी, सत्यवचन जो, पठन वेद शास्त्रों का
नाम जप व सुमिरन आदि, वाणी का तप कहलाता

आह्लाद व शांत भाव, प्रभु स्मरण, मन का निग्रह
अंतःकरण की भाव शुद्धि, मन सम्बन्धी तप है यह

तन, मन, वाक् के तप सात्विक, यदि किये निष्काम भाव से
जो योगी श्रद्धा से करते, रहते हैं वे परम भाव में

आदर की यदि चाह हो मन में, दम्भ या स्वार्थ हित किया 
हो अनिश्चित, क्षणिक फलवाला, ऐसा तप राजस कहलाता

मूढ़ भाव से हठ पूर्वक, मन, वाणी, तन को पीड़ा दे
ऐसा तप तामस ही है, यदि अन्य का अनिष्ट चाह के

देश, काल, पात्रता लख के, कर्त्तव्य वश दान दिया है
प्रत्युपकार की नहीं है आशा, ऐसा दान सात्विक है

क्लेशपूर्वक, फलेच्छा से जो भी दान दिया जाता है
मान. बड़ाई की आशा हो, दान वह राजस कहलाता है

ॐ तत् सत् तीन तरह का, नाम ब्रह्म का है यह सुंदर
सृष्टि आदि काल में जिससे, रचे यज्ञ, वेद व ब्राह्मण

वेद मंत्रों को उच्चारें, शास्त्र विधि से यज्ञ जो करते
ॐ का ही उच्चारण करके, दान व तप आरम्भ वे करते

तत् अर्थात वही यह सब है, फल इच्छा वे न करते
मात्र लोक संग्रह हेतु, यज्ञ आदि किया करते

सत् से परम ‘सत्य’ कहाता, वही श्रेष्ठ है यह बताता
उत्तम कर्म भी सत् कहाते, प्रभु हित कर्म सत् कहाता

श्रद्धा बिन जो यज्ञ किया हो, दान, तप या कोई कर्म हो
वह असत् ही कहलायेगा, है विफल लोक या परलोक हो

 


     

Saturday, September 10, 2011

सप्तदशोऽअध्यायः श्रद्धात्रयविभागयोग



सप्तदशोऽअध्यायः
श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धायुक्त जो पूजन करता, न जाने पर शास्त्र विधि
निष्ठा उसकी होगी कैसी, सात्विक, राजस या तामसी

जो केवल स्वभाव से उत्पन्न, शास्त्रीय संस्कार रहित है
किसी के भीतर ऐसी श्रद्धा, तीनों तरह की हो सकती है

श्रद्धामय है पुरुष सदा यह, जैसी श्रद्धा उसे वैसा मान
उसके अंतःकरण से उपजी, श्रद्धा उसकी प्रकृति जान

सात्विक जन तो देव पूजते, यक्ष, राक्षस को राजस जन
जो तामस प्रकृति के नर हैं, वे पूजें प्रेत और भूतगण

दम्भ, अहम् से युक्त हुए जो, शास्त्रविधि से रहित तप करें
आसक्त व कामी जन जो, निज बल का अभिमान करें

जो शरीर को देते कष्ट, अंशरूप आत्मा को सताते
है आसुरी प्रकृति उनकी, कुछ अज्ञानी घोर तप करते

निज प्रकृति के अनुसार ही, भोजन भी सबको भाता है
यज्ञ, तप व दान भी अर्जुन, तीन तरह का ही होता है

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढाने वाला
रसयुक्त, स्निग्ध, सुस्वादु, सात्विक जन को भाने वाला

कटु, तीक्ष्ण, लवण युक्त हो, अति गर्म, रुक्ष, दाहकारक जो
दुःख, चिंता रोगों को लाता, राजस को भोजन भाता वो

अधपका और रस रहित हो, बासी, जूठा, दुर्गन्धित जो 
है अपावन ऐसा भोजन, तामस जन करे ग्रहण वो 

शास्त्र विधि से जो सम्मत हो, निष्काम जो यज्ञ है पावन
कर्त्तव्य मान जो किया गया हो, कर्ता उसके सात्विक जन

केवल दम्भ आचरण हेतु, फल की इच्छा से किया  
ऐसा यज्ञ राजसिक होता, सिद्ध न उससे हेतु होता

शास्त्र विधि का ध्यान नहीं हो, अन्नदान से रहित यज्ञ हो
बिना दक्षिणा व मंत्रों के, बिन श्रद्धा, तामस है यज्ञ वो 

Thursday, September 8, 2011

षोडशोऽध्यायः (अंतिम भाग) देवासुरसम्पदविभागयोग


षोडशोऽध्यायः (अंतिम भाग)
देवासुरसम्पदविभागयोग


आज किया, कल यह करना है, आज मिला, यह कल पाना है
इसे हराया, उसे हरा लूँ, सिद्धि युक्त, बलवान सुखी हूँ

मैं धनी, परिवार बड़ा है, मेरे जैसा कौन यहाँ है
यज्ञ करूँगा, दान भी दूँगा, बड़े मजे से यहाँ रहूँगा

ऐसे वे अज्ञान से मोहित, भ्रमित हुए, आसक्त हुए जन
ऐसी आसुर प्रकृति लिए वे, नरकों में जाते हैं अपावन

सुख को ही वे श्रेष्ठ मानते, धन व मान के मद में चूर
नाम मात्र के यज्ञ वे करते, शास्त्र विधि से रहते दूर

स्वयं के व अन्यों के भीतर, मुझ अन्तर्यामी के द्वेषी
क्रूर क्रम करते हैं जो नर, पाते हैं वे आसुरी योनि

मुझे प्राप्त न होकर वे नर, बार-बार नरकों में जाते
आसुरी प्रकृति को पुनः पाकर, नीच गति को प्राप्त वे होते

काम, क्रोध व लोभ ये तीनों, नाश आत्मा का करते हैं
यही नर्क के द्वार हैं अर्जुन, ज्ञानी इनको तज देते हैं

मुक्त हुआ जो इन द्वारों से, परम गति वह पा जाता है
स्वयं का ही कल्याण वह करता, मुझे प्राप्त फिर हो जाता है

जो मनमानी करता जग में, शास्त्र विधि को मान न देता,
सिद्धि उससे दूर ही रहती, न सुख न उच्च गति को पाता

अकर्त्तव्य व कर्त्तव्य का, ज्ञान शास्त्र से मिल सकता है
आदर कर शास्त्र का ही तू,  इससे आगे बढ़ सकता है 


 

Tuesday, September 6, 2011

षोडशोऽध्यायः देवासुरसम्पदविभागयोग


षोडशोऽध्यायः
देवासुरसम्पदविभागयोग

कृष्ण ने वर्णन किया पार्थ से, दैवी व आसुरी सम्पदा का
दैवी नर को मुक्त कराती, आसुरी से व्यक्ति है बंधता

निर्भयता, आत्मशुद्धि, अनुशीलन अध्यात्म ज्ञान का
दान, तपस्या और सरलता, सत्य, अहिंसा, लोभ विहीनता

रूचि यज्ञ में, वेदाध्यन, त्याग, तपस्या, शांति प्रियता
अक्रोध, पर दोष अदृष्टि, करुणा, लज्जा और भद्रता

तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, संकल्पवान व अनइर्ष्यालु
सम्मान की न हो इच्छा, दैवी गुण वाला है दयालु

दम्भ, क्रोध तथा अभिमान, दर्प, कठोरता व अज्ञान
आसुरी सम्पदा ले जो उपजा, उसके ही ये लक्षण जान

हे अर्जुन, तू न हो व्याकुल, दैवी सम्पदा लेकर जन्मा
मोक्ष दिलाये दैवी प्रकृति, बंधन कारी आसुरी सम्पदा

दो ही तरह की सृष्टि जग में, एक आसुरी दूजी दैवी
दैवी पहले कही है मैंने, अब तू सुन क्या है आसुरी

क्या करना, क्या नहीं है करना, आसुरी जन यह नहीं जानते
हैं अपावन, अनाचरण कर, सत्य का भी न पालन करते

वे जगत को मिथ्या कहते, जिसका कोई नहीं आधार
कोई ईश्वर नहीं चलाता, काम से होता सब व्यापर

ऐसे मिथ्या ज्ञान को धरते, मंद बुद्धि, वे अनात्मवादी
भ्रष्ट आचरण ही है जिनका, जो मिथ्या सिद्धांत वादी

मृत्यु तलक चिंता में रहते, विषय भोग में तत्पर रहते
सुख यही बस एक मात्र है, ऐसा ही जो सबसे कहते

आशा की फांसी में बद्ध जो, काम, क्रोध के हुए परायण
विषय भोग के हेतु लगे हैं, अन्याय से करें धन हरण

Monday, September 5, 2011

पञ्चदशोऽध्यायः (अंतिम भाग) पुरुषोत्तमयोग


पञ्चदशोऽध्यायः (अंतिम भाग)
पुरुषोत्तमयोग


अज्ञानी जन नहीं जानते, आत्म ज्ञान से हैं अपरिचित
ज्ञान रूप नेत्रों से देखें , ज्ञानी आत्मा से हैं परिचित

यत्न किये से योगी जानें, जिनका अंतःकरण शुद्ध है
अज्ञानी जन नहीं जानते, यत्न भी उनका हुआ व्यर्थ है

सूर्य चन्द्र का तेज है मुझसे, अग्नि भी मुझसे प्रकाशित
मैं ही धरा की धारण शक्ति, मेरे ही सब जन हैं आश्रित

रसस्वरूप चन्द्रमा मैं हूँ, औषधियों में रस भरता
वैश्वानर अग्नि मैं, मुझसे, ग्रहण किया अन्न भी पचता

अन्तर्यामी रूप से स्थित, मुझसे ही स्मृति और ज्ञान
वेदांत और वेद भी मुझसे, वेदों में मेरा ही गान

देह नश्वर, आत्मा अविनाशी, उत्तम पुरुष परे है इनसे
तीनों लोकों में प्रवेश कर, सबका धारण पोषण जिससे

पुरुषोत्तम मैं कहलाता हूँ, देह-आत्मा दोनों से पर
जो जानता तत्व से मुझको, भजता जान मुझे परमेश्वर

अति रहस्य युक्त ज्ञान यह, कहा है तुझसे मैंने अर्जुन
इसे जानकर ज्ञानी होते, और कृतार्थ हुआ करते जन


षोडशोऽध्यायः देवासुरसम्पदविभागयोग


षोडशोऽध्यायः
देवासुरसम्पदविभागयोग

कृष्ण ने वर्णन किया पार्थ से, दैवी व आसुरी सम्पदा का
दैवी नर को मुक्त कराती, आसुरी से व्यक्ति है बंधता

निर्भयता, आत्मशुद्धि, अनुशीलन अध्यात्म ज्ञान का
दान, तपस्या और सरलता, सत्य, अहिंसा, लोभ विहीनता

रूचि यज्ञ में, वेदाध्यन, त्याग, तपस्या, शांति प्रियता
अक्रोध, पर दोष अदृष्टि, करुणा, लज्जा और भद्रता

तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, संकल्पवान व अनइर्ष्यालु
सम्मान की न हो इच्छा, दैवी गुण वाला है दयालु

दम्भ, क्रोध तथा अभिमान, दर्प, कठोरता व अज्ञान
आसुरी सम्पदा ले जो उपजा, उसके ही ये लक्षण जान

हे अर्जुन, तू न हो व्याकुल, दैवी सम्पदा लेकर जन्मा
मोक्ष दिलाये दैवी प्रकृति, बंधन कारी आसुरी सम्पदा

दो ही तरह की सृष्टि जग में, एक आसुरी दूजी दैवी
दैवी पहले कही है मैंने, अब तू सुन क्या है आसुरी

क्या करना, क्या नहीं है करना, आसुरी जन यह नहीं जानते
हैं अपावन, अनाचरण कर, सत्य का भी न पालन करते

वे जगत को मिथ्या कहते, जिसका कोई नहीं आधार
कोई ईश्वर नहीं चलाता, काम से होता सब व्यापर

ऐसे मिथ्या ज्ञान को धरते, मंद बुद्धि, वे अनात्मवादी
भ्रष्ट आचरण ही है जिनका, जो मिथ्या सिद्धांत वादी

मृत्यु तलक चिंता में रहते, विषय भोग में तत्पर रहते
सुख यही बस एक मात्र है, ऐसा ही जो सबसे कहते