मौन धारे झर गया भीतर समन्दर
रिक्तता को भर गया चुपचाप इक स्वर
मौन धारे झर गया भीतर समन्दर !
दृग झुके कर जुड़ गए
पग थमे फिर मुड गए
अल्पता को हर गया अन्जान इक स्वर
मौन धारे झर गया भीतर समन्दर !
स्वर नहीं वह आरती का
न गीत वन्दन भारती का
तप्तता को हर गया वरदान सा स्वर
मौन धारे झर गया भीतर समन्दर !
ताल सुर से बद्ध न था
शास्त्र से सम्बद्ध न था
दग्धता ले दे गया अनुराग इक स्वर
मौन धारे झर गया भीतर समन्दर !
थी सुरीली कूक कोकिल कंठ में
जो जगाती हुक उर आकंठ में
शून्यता को भर गया मधुराग सा स्वर
मौन धारे झर गया भीतर समन्दर !
अनिता निहालानी
२१ अप्रैल २०११