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Tuesday, December 9, 2014

विश्वामित्र का त्रिशंकु को आश्वासन देकर उनका यज्ञ कराने के लिए ऋषि-मुनियों को आमंत्रित करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

एकोनषष्टितमः सर्गः

विश्वामित्र का त्रिशंकु को आश्वासन देकर उनका यज्ञ कराने के लिए ऋषि-मुनियों को आमंत्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना

शतानंद ने कथा बढ़ायी, विश्वामित्र भर गये दया से
चांडाल को प्राप्त हुआ जो, देख स्वरूप त्रिशंकु के

वत्स ! तुम्हारा स्वागत है, हो धार्मिक यह जानता
डरो नहीं, शरण मैं दूंगा, यज्ञ तुम्हारा सम्पन्न होगा

 बनें सहायक जो यज्ञ में, आमंत्रित होंगे वे ऋषिवर
सदेह स्वर्ग लोक जाओगे, इस नवीन रूप को लेकर

तुम जो मेरी शरण में आये, मानो स्वर्ग हो गया तुम्हारा
ऐसा कहकर विश्वामित्र ने, दी पुत्रों को समुचित आज्ञा

लगे जुटाने यज्ञ सामग्री, शिष्यों को ये बात कही
बुला लाओ ऋषि-मुनियों को, हों जिनमें वसिष्ठ पुत्र भी

जिसने यह संदेश सुना हो, पर आने में न हो उत्सुक
यदि करे अवहेलना कोई, आकर सब विवरण देना तुम

आज्ञा मान गये तब उनकी, शिष्य चार दिशाओं में
आने लगे ब्रह्मवादी मुनि, शिष्य भी लौटकर आये

गुरूदेव सुन संदेश आपका, आये ब्राह्मण सब देशों से
वसिष्ठ पुत्र व ऋषि  महोदय, तत्पर नहीं हैं आने में  

मुनिश्रेष्ठ ! वसिष्ठ पुत्रों ने, क्रोध भरी वाणी में कहा
जो चांडाल स्वयं है राजा, क्षत्रिय है आचार्य यज्ञ का

देवर्षि अथवा ब्राह्मण भी, हविष्य करेंगे कैसे ग्रहण
स्वर्ग नहीं वे जा पाएंगे, चांडाल का खाकर अन्न

नेत्र क्रोध से लाल हुए तब, रोषपूर्वक तब बोले
भस्मीभूत दुरात्मा होंगे, दोषारोपण जो करते

दोष और दुर्भाव रहित भी, उग्र तपस्या में रत हूँ मैं
कालपाश से बंधकर वे, यमलोक में जा पहुंचेंगे

मुर्दों की रखवाली करती, मुष्टिक जाति में वे जन्में
विकृत व विरूप हुए वे, इन लोकों में ही विचरें

महोदय भी होकर निन्दित, जन्म ले निषाद योनि में
महामुनि विश्वामित्र तब, कहकर ऐसा चुप हो गये  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Saturday, November 5, 2011

विज्ञानमय कोष


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

विज्ञानमय कोष

ज्ञान इन्द्रियों के सँग बुद्धि, विज्ञानमय कोष कहाता
कर्तापन के स्वभाव वाला, चेतना का प्रतिबिम्ब दिखाता

मैं हूँ ज्ञाता, क्रियावान भी, देह, इन्द्रियों का अभिमानी
निकट आत्मा के यह रहता, भ्रम से इसने सत्ता मानी

स्वयं प्रकाशित निर्विकार जो, प्राणादि में स्फुरित होता
मन, बुद्धि की उपाधि वश ही, कहलाता है कर्ता, भोक्ता

बुद्धि की उपाधि पाकर, उससे एकीभाव में रहता
सात्विक होते हुए भी खुद को, खुद से वह पृथक देखता

एक रूप है सदा आत्मा, किन्तु उपाधि वश है भ्रमता
ज्यों अविकारी अग्नि स्वयं में, लोहे के समान चमकता

शिष्य पूछता तब सद्गुरु से, कैसे छूटें जन्म-मरण से
जीव भाव अनादि काल से, कैसे टूटे भाव प्रबल ये

सुनो वत्स हो सावधान तुम, भ्रमवश जो की गयी कल्पना
नहीं माननीय हो सकती, टूटेगी ही यह भ्रमणा

जैसे भ्रम नीलता नभ की, निर्विकार में सब विकार हैं
है असंग, निष्क्रिय जो, उसमें दोष सब असार हैं

साक्षी, निर्गुण है अक्रिय, आनंद व ज्ञान स्वरूप
जीवभाव भुद्धि के भ्रम से, नहीं सत्य अवस्तुरूप

जैसे रज्जु सर्प बना है, जब तक, तब तक भ्रम रहता
वैसे ही जब तक प्रमाद है, जीव भाव की है सत्ता

नींद खुले से जैसे जग में, स्वप्न लोक तिरोहित होता
ज्ञानोदय से जीवभाव भी, मूल सहित नष्ट हो जाता

है अनादि पर नित्य नहीं है, जीव भाव सदा न रहता
मिथ्या ज्ञान है कारण जिसका, ज्ञान हुए से नहीं ठहरता

ब्रह्म जीव का एक्य भाव ही, ज्ञान वास्तविक कहलाता
श्रुतियों का भी यही वचन है, जीव भाव निवृत्त हो जाता

आत्म-अनात्म का जगे विवेक तो, ब्रह्म जीव एकता सधती 
अहं दोष मुक्त होने पर, आत्मा भी प्रकाशित होती

सत्-आत्मा के विचार से, असत् की निवृत्ति होती
विज्ञानमय कोष अनित्य, बुद्धि न नित्य हो सकती