Showing posts with label मोह. Show all posts
Showing posts with label मोह. Show all posts

Wednesday, December 21, 2011

ध्यान विधि


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

ध्यान विधि  

मन को ब्रह्म में स्थित करें जब, तन स्थिर, इन्द्रियाँ संयमित
तन्मय होकर अखंड वृत्ति में, आत्म ब्रह्म एकता हो घटित

अनात्म चिंतन ही दुःख का कारण, मोहरूप देहाध्यास
मुक्ति का कारण आत्मा, आत्मचिंतन का हो अभ्यास

विज्ञानमय कोष में स्थित, स्वयंप्रकाश साक्षी आत्मा
अनित्य पदार्थों से पृथक हुआ जो, वही लक्ष्य हो सदा ध्यान का

चिंतन सदा आत्मभाव का, करे अखंड वृत्ति से ध्यान 
परमात्मा में स्थित होकर, आनंद रस का कर ले पान

Friday, December 2, 2011

प्रमाद


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

प्रमाद 

यदि शेष कर्म बंधन है, सावधान रह करो साधना
आनंद घन दिव्य रूप का, कर चिंतन हो ब्रह्म भावना

कभी प्रमाद न होने पाए, अति ही भारी यह दोष है
ऋषियों ने भी यही कहा है, अनर्थ रूप प्रमाद मृत्यु है

निज स्वरूप की खोज सदा हो, कभी विवेकी प्रमादी न हो
मोह इसी कारण जगता है, मोह से अहंकार न हो

अहंकार से बंधन होता, बंधन बड़ा क्लेशकारी है
आत्मविस्मृति विषयों में लगाती, बुद्धि दोष विक्षिप्त कारी 

 जल से यदि हटाया क्षण भर, ज्यों शैवाल पुनः ढक लेती
आत्मविचार विहीन पुरुष को, माया भी है पुनः घेरती

असावधानी से छूटी गेंद, सीढियों पर लुढ़कती जाती
वृत्ति लक्ष्य से जब छूटी तो, नीचे को ही गिरती जाती

विषयों का जब चिंतन होता, कामना पुनः जाग्रत होती
आत्मस्वरूप से च्युत हो जाता, विषयों में प्रवृत्ति होती

विवेकी जन प्रमाद न करे, आत्मसिद्धि को यदि पाना है
सजग हुआ हो चित्त समाहित, ब्रह्म भाव में यदि जाना है