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Friday, October 31, 2014

विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिए तप करने का निश्चय

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षट्पञ्चाश सर्गः

विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग और वसिष्ठ द्वारा ब्रह्म दंड से ही उनका शमन एवं विश्वामित्र का ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिए तप करने का निश्चय

ऐसा कहने पर वसिष्ठ के, विश्वामित्र हुए अति क्रोधित
अरे खड़ा रह ! कहा मुनि को, लिया हाथ में आग्नेयास्त्र

ब्रह्मदंड ले कहा मुनि ने, ‘खड़ा हूँ’ कर प्रयोग शक्ति का
गाधिपुत्र, हे अधम क्षत्रिय, है घमंड तुझे निज ज्ञान का

मिल जायेगा आज धूल में, अस्त्र-शस्त्र का सारा ज्ञान
क्षात्र बल न टिक पायेगा, दिव्य ब्रह्म बल अति महान

शांत हुआ तब आग्नेयास्त्र, जैसे जल से अग्नि बुझती
कुपित हुए तब विश्वामित्र ने, वारुण आदि छोड़ी शक्ति

रौद्र, एंद्र, पाशुपत व, एषीक आदि छोड़े अस्त्र
मानव, मोहन, गांधर्व, जृम्भण, मादन, शोषण अस्त्र

स्वाप्न, संतापन, विलापन, विदारण, सुदुर्ज्य व्रजास्त्र
ब्रह्मपाश, कालपाश भी, वारुणपाश, पिनाकास्त्र
सूखी-गीली अशनि, द्न्दास्त्र, पैशास्त्र, क्रौन्चास्त्र

धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायवास्त्र, मन्थनास्त्र
हयशिरा, द्वैय शक्ति, कालास्त्र, मूसल, कंकाल, त्रिशूलास्त्र

  इतने अस्त्रों का प्रहार यह, अद्भुत घटना थी स्वयं में
किन्तु किया नाश मुनि ने, सबको अपने ब्रह्म दंड से

शांत हुए जब अस्त्र सभी, ब्रहमास्त्र का किया प्रयोग
तीनों लोक थर्रा उठे तब, दहल उठे गन्धर्व व नाग

ब्रह्म दंड से शांत किया तब, उस अस्त्र को मुनि वसिष्ठ ने
तीनों लोक पड़े मोह में, रौद्र रूप जब धरा मुनि ने

धूम युक्त लपटें निकलीं थीं, रोम कूपों से तब वसिष्ठ के
प्रज्वलित होता था दंड वह, यमदंड सम कालाग्नि के

स्तुति कर बोले मुनिगण, है अमोघ आपका बल
शीघ्र समेटें निज शक्ति को, विश्वामित्र हुए निर्बल

व्यथा दूर हुई जग की जिससे, शांत हुए तब मुनि वसिष्ठ
लम्बी साँस खींचकर बोले, विश्वामित्र तब हुए कुपित

है धिक्कार क्षत्रिय बल को, ब्रह्म तेज ही असली बल
ब्रह्म दंड ने नष्ट कर दिए, क्षण भर में ही सारे अस्त्र

मन इन्द्रियों को निर्मल करके, करूंगा तप का मैं अनुष्ठान
प्राप्ति हेतु ब्राहमणत्व की, जो क्षत्रियत्व से है महान


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Monday, September 22, 2014

विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचपञ्चाशः सर्गः


अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना 

देवों, यक्षों, गन्धर्वों के, दानव और राक्षसों के भी
प्रकट हों मेरे हृदय में, अस्त्र महर्षियों के भी स्वामी

यही मनोरथ है मेरा प्रभु, यही मुझे वरदान मिले
‘ऐसा ही हो’ महादेव कह, दे वरदान चले गये

हुआ घमंड अति राजा को, पाकर अस्त्र महादेव से
सागर ज्यों बढ़ता पूनम को, स्वयं को बढ़ा-चढ़ा मानें

मरा हुआ ही माना मुनि को, गये आश्रम पर उनके
भांति-भांति के अस्त्रों का तब, वे प्रयोग करने लगे

दग्ध हुआ तपोवन सारा, भाग चले सैकड़ों मुनिगण
पशु-पक्षी और शिष्यगण भी, भाग गये भयाकुल होकर

सूना हुआ आश्रम सारा, पल में छाया सन्नाटा
कहने लगे मुनि वसिष्ठ तब, अभी नष्ट मैं इनको करता

रोषपूर्वक बोले राजा से, नष्ट किया तूने आश्रम
चिरकाल से जिसे था पोसा, हरा-भरा था जो उपवन

है विवेकशून्य तू पापी, और दुराचारी भी है
नहीं रहेगा सकुशल तू, कितना अत्याचारी है

कहकर ऐसा हुए क्रुद्ध वे, धूम रहित कालाग्नि सम  
डंडा लिया सामना करने, अति भयंकर यमदंड सम


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ.




Tuesday, November 26, 2013

श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञ स्थान के विषय में मुनि से प्रश्न

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

अष्टाविंशः सर्गः



विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहार विधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रों का उपदेश करना, श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञ स्थान के विषय में मुनि से प्रश्न 

रघुकुल नन्दन राम ने कहा, अभी आप जाएँ निज धाम
किन्तु जरूरत पड़े जिस समय, मनोस्थित हो जाएँ आप

तत्पश्चात परिक्रमा करके, अस्त्रों ने किया प्रस्थान
श्रीराम ने पूछा मुनि से, पाया जब अस्त्रों का ज्ञान

सम्मुख जो पर्वत दिखता है, सघन वृक्ष से ढका हुआ
मन में है उत्कंठा जागी, पशुओं से जो भरा हुआ

पक्षी गीत वहाँ गाते हैं, मनहर है यह सुंदर वन
मानो कठिन ताटका वन से, दूर निकल आए अब हम

कौन यहाँ रहता है प्रभुवर, यज्ञ हो रहा कहाँ आपका
कहाँ मुझे रक्षा करनी है, उस आश्रम का देश कौन सा

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अट्ठाईसवां सर्ग पूरा हुआ.



Tuesday, November 5, 2013

विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहार विधि बताना



श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

अष्टाविंशः सर्गः

विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहार विधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रों का उपदेश करना, श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञ स्थान के विषय में मुनि से प्रश्न

ग्रहण किया जब अस्त्रों को, मुख राम का खिला ख़ुशी से
देवों से भी दुर्जय हूँ अब, चलते-चलते कहा मुनि से

कृपा आपकी मुझ पर है यह, ककुत्स्थ कुल तिलक राम बोले
महातपस्वी, धैर्यवान हे !, कहें विधि संहार की इनसे

उत्तम व्रतधारी मुनिवर ने, दिया उपदेश ‘संहार विधि’ का
अस्त्र विद्या के योग्य पात्र तुम, रघुवर ! हो कल्याण तुम्हारा

ग्रहण करो और अस्त्रों को, प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं
इच्छाधारी, परम तेजस्वी, आगे इनके नाम कहे हैं

सत्यवान, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रान्गमुख, प्रतिहारतर
लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, द्शशीर्ष, दशाक्ष, शतवक्त्र

अवांग मुख, पद्मनाभ, महानाभ स्वनाभ, शकुन
हैं अद्भुत अस्त्र सभी ये, सर्पनाथ, पन्थान, वरुण

दुन्दुनाभ, ज्योतिष, निरस्य, विमल, दैत्य्नाश्क योगन्धर
शुचिबाहु, निष्कलि, विरुच, धृतिमाली, सौमनस, रुचिर

सर्चिमाली, पिव्य, विधूत, विनिन्द्र, मकर, परवीर, रति
धन, धान्य, कामरूप, मोह, आवरण, जुम्भ्क, कामरूचि

श्री राम ने पुलकित मन से, ग्रहण किया सभी अस्त्रों को
दिव्य तेज से उद्भासित थे, मूर्तिमान, सुखकारी थे जो

कुछ थे अंगारों से प्रज्ज्वलित, कितने ही धूम सम काले
सूर्य, चन्द्रमा के समान कुछ, सब सम्मुख थे श्री राम के

अंजलि बांधे मधुर स्वरों में, श्रीराम से वे ये बोले
पुरुष सिंह हम दास आपके, दे आज्ञा हम क्या सेवा दें




Thursday, September 26, 2013

विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्यास्त्र-दान


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

सप्तविंशः सर्गः
विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्यास्त्र-दान

ताटका वन में रात्रि बिताकर, मधुर स्वर में मुनि बोले
महायशस्वी राजपुत्र हे !, हूँ संतुष्ट अति मैं तुमसे

चाहे कोई भी हो शत्रु, असुर, नाग, गन्धर्व, देव सा
विजय सदा पाओगे इनसे, अस्त्र तुम्हें जो मैं देता

 हो कल्याण तुम्हारा रघुवर, दिव्य, महान अस्त्र लेकर
दंड, धर्म, काल, व विष्णु, तथा भयंकर एन्द्र का चक्र

नरश्रेष्ठ हे ! वज्र इंद्र का, लो शिव का श्रेष्ठ त्रिशूल भी
ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नामक, एषीकास्त्र व ब्रह्मास्त्र भी

इनके सिवा गदाएँ भी दो, शिखरी और मोदकी सुंदर
काल पाश व पाश वरुण लो, राम तुम्हें मैं करता अर्पण

सुखी, गीली, दोनों अशनि, नारायण, पिनाक अस्त्र भी
अग्नि, वायव्यास्त्र भी ले लो, क्रौंच अस्त्र व हयशिरा भी

किंकणी और कपाल अस्त्र संग, मूसल व कंकाल अस्त्र  
ऐसी दो शक्तियाँ भी लो, राक्षस जिनसे हो सकते हत

विद्याधरों का नन्दन नामक, गन्धर्वों का सम्मोहन भी
प्रसवापन, प्रशमन, अस्त्र संग, उनका ही सौम्य अस्त्र भी

महायशस्वी पुरुष सिंह हे, वर्षन, शोषण सन्तापन भी
कामदेव का प्रिय मादन लो, गन्धर्वों का मानवास्त्र भी

मोहनास्त्र भी ग्रहण करो तुम, मौसल, दुर्जय तामस, सौमन
सूर्यदेव का तेज प्रभ जो, शत्रु तेज को लेता है हर

सोम देव का शिशिर अस्त्र, त्वष्टा का दारुण अस्त्र
महा भयंकर भग देव का, मनु का भी शीतेषु अस्त्र  

बल से सम्पन्न सभी अस्त्र हैं, इच्छा धारी परम उदार
करो ग्रहण शीघ्र इनको तुम, महाबली हे राज कुमार

ऐसा कहकर मुनि बैठ गये, मुख करके पूर्व दिशा को
अति हर्षित मुनिवर ने फिर, उन अस्त्रों को दिया राम को

जैसे ही आरम्भ किया जप, दिव्यास्त्र सब हुए उपस्थित
हाथ जोडकर कहा राम से, हम सब हैं आपके किंकर

जो सेवा लेना चाहेंगे, देने को तैयार हैं हम सब
अति प्रसन्न हुए राम अब, स्पर्श किया उन सबका तब

ग्रहण किया राम ने उनको, स्थान दिया मन में अपने   
 किया प्रणाम मुनि को झुक कर, हुई आरम्भ यात्रा आगे

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्ताईसवां सर्ग पूरा हुआ.