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Tuesday, January 6, 2015

विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षि पद की प्राप्ति

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रिषष्टितमः सर्गः

विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षि पद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षि पद की प्राप्ति के लिए उनकी घोर तपस्या

एक सहस्त्र वर्ष बीते जब, व्रत समाप्ति का किया स्नान
तप का फल देने हेतु तब, आये देव सब उस स्थान

ब्रह्माजी ने कहे वचन ये, मधुर अति थी वाणी उनकी
हो कल्याण तुम्हारा मुनिवर, अब शुभकर्मों से हुए ऋषि

स्वर्ग गये ब्रह्मा जी कहकर, तप में पुनः लगे थे मुनिवर
बहुत समय जब बीत गया था, आयी मेनका तब पुष्कर

अति सुन्दरी थी अप्सरा, रूप और लावण्य अद्भुत
जल में शोभित होती ऐसे, बादल में ज्यों चमके विद्युत

हुए काम आधीन मुनि तब, बोले ऐसा उसे देखकर
स्वागत है तेरा अप्सरा, इस आश्रम में तू निवास कर

हो रहा हूँ काम से मोहित, कर कृपा, भला हो तेरा
ऐसा कहने पर उनके वह, रहने लगी वहीं अप्सरा

तप का विघ्न हुआ उपस्थित, दस वर्ष ऐसे ही बीते
लज्जित हुए मुनि चिंतित भी, गहन शोक में तब डूबे

मुनि के मन में एक विचार, रोषपूर्वक हुआ था उत्पन्न
देवताओं की है करतूत, मेरे तप का किया अपहरण

दस वर्ष पल में बीते हैं, कामजनित मोह ने बांधा
देवों का प्रयास ही आया, तप के पथ में बनकर बाधा

लम्बी साँस खींचकर मुनिवर, पश्चाताप से हुए दुःखित
थर-थर भय से हुई अप्सरा, हाथ जोड़ आयी कंपित

कुशिका नंदन विश्वामित्र ने, मधुर वचन कह विदा किया
स्वयं गये उत्तर पर्वत पर, दुर्जय तप आरम्भ किया

निश्चयात्मक बुद्धि का तब, लिया आश्रय कौशिकी तट पर
कामदेव पर विजय हेतु तब, तप किया हजार वर्ष तक

देवों को तब भय हो आया, ऋषियों संग चर्चा की मिल
महर्षि की पदवी पा लें, उत्तम बात यही इनके हित

स्वागत है महर्षे तुम्हारा, ब्रह्माजी फिर जाकर बोले
ऋषियों में श्रेष्ठता देता, हूँ संतुष्ट तुम्हारे तप से

ब्रह्मर्षि का पद चाहता, कर प्रणाम तब कहा मुनि ने,
जितेन्द्रिय स्वयं को समझूंगा, शुभकर्मों का फल ये दें

ब्रह्मा जी ने कहे वचन तब, जितेन्द्रिय अभी नहीं हुए
प्रयत्न करो इसके हेतु तुम, स्वर्गलोक वह चले गये

पुनः तपस्या की आरम्भ, दोनों हाथ उठाये ऊपर
बिना किसी आधार के खड़े, रहते केवल वायु पीकर

पंचाग्नि का सेवन करते, वर्षाकाल, खुले में रहते
एक हजार वर्ष किया तप, शीत काल, जल में रहते
तब भारी संताप हुआ था, देवों और इंद्र के मन में
रम्भा से इक बात कही तब, मरुद्गणों सहित इंद्र ने

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Monday, November 17, 2014

राजा त्रिशंकु का अपना यज्ञ करने के लिए पहले वसिष्ठजी से प्रार्थना करना और उनके इंकार कर देने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

सप्तःपञ्चाशः सर्ग

विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का अपना यज्ञ करने के लिए पहले वसिष्ठजी से प्रार्थना करना और उनके इंकार कर देने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना

विश्वामित्र जब हुए पराजित, मन में हुए संतप्त अति
बैर बांधकर महातपस्वी, साँस खींचते थे लम्बी

करने लगे तब घोर तपस्या, गये राजा दक्षिण दिशा में
साथ गयीं थी रानी उनकी, मन-इन्द्रियां की थीं वश में

फल-मूल आहार था उनका, उत्तम तप में रत रहते थे
सत्य, धर्म में जो तत्पर थे, चार पुत्र वहीं पाए थे

पूरे हुए हजार वर्ष जब, ब्रह्माजी के पाए दर्शन
तप से राजर्षि हुए तुम, बोले उनसे मधुर वचन

ऐसा कह लोकों के स्वामी, ब्रह्मलोक गये देवों संग
 मुख लज्जा से झुका था उनका, विश्वामित्र व्यथित हुए सुन

इतना भारी तप कर डाला, फिर भी देव राजर्षि ही मानें
पुनः तपस्या में लग गये वे,  मुनि सोचकर अपने मन में

इक्ष्वाकु कुल की कीर्ति बढ़ाएं, उस समय त्रिशंकु थे राजा
देह सहित स्वर्ग जा पहुँचूँ, मन में यह विचार किया

कहा मुनि वसिष्ठ ने सुनकर, ‘सम्भव नहीं है ऐसा होना’
कोरा उत्तर पाकर मुनि से, गये नरेश तब दक्षिण दिशा

दीर्घकाल से जहाँ तपस्या, करते थे मुनि के पुत्र सब
त्रिशंकु ने जाकर देखा, सौ वसिष्ठ कुमारों का तप

क्रमशः उन्हें प्रणाम किया, लज्जा से मुख नत कर बोले
शरणागत वत्सल आप हैं, आया हूँ मैं आज शरण में

यज्ञ करने का इच्छुक हूँ, मुनि वसिष्ठ ने मना किया  
आज्ञा दें आप उसकी अब, करें पूर्ण मेरी यह इच्छा

देह सहित में देवलोक में, जाने की कामना रखता
गुरूपुत्रों के सिवा इस जग में, दूजी कोई गति न देखता

इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की, परमगति वसिष्ठ मुनि हैं
उनके बाद पुत्र उनके, आप ही मेरे परम देव हैं

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ.




Monday, June 23, 2014

भगवान शंकर का गंगा जी को अपने सिर पर धारण करके बिंदु सरोवर में छोड़ना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रिचत्वारिंशः सर्गः

भगीरथ की तपस्या से संतुष्ट हुए भगवान शंकर का गंगा जी को अपने सिर पर धारण करके बिंदु सरोवर में छोड़ना और उनका सात धाराओं में विभक्त हो भगीरथ के साथ जाकर उनके पितरों का उद्धार करना

श्रीराम ! जब गये ब्रह्माजी, तप में लीन हुए भगीरथ
अग्रभाग को अंगुष्ठ के, रखे हुए धरा पर केवल  

एक वर्ष तक शंकर जी की, की उपासना पूरे मन से
उमापति लोकवंदित जो, पशुपति तब प्रकट हुए

नरश्रेष्ठ, प्रसन्न हूँ तुम पर, प्रिय तुम्हारा मैं करूंगा
गिरिराज कुमारी गंगा जी को, निज मस्तक पर धारूंगा

शंकर जी की पाकर स्वीकृति, ज्येष्ठ पुत्री हिमवान की
वेग सहित अति विशाल बन, शंकर के मस्तक पर आयीं

उस पल यह विचार किया था, परम दुर्धर गंगा जी ने
पाताल में घुस जाऊंगी, प्रखर प्रवाह के संग उनको ले

जाना जब इस अहंकार को, कुपित हुए त्रिनेत्रधारी तब
गंगा को अदृश्य बनाया, निज जटाओं में उलझा कर

पावन मस्तक से रूद्र के, जो हिमालय सम विशाल था
नहीं जा सकीं धरा पर गंगा, जटा समूह गुफाओं सम था

नहीं पा सकीं मार्ग वहाँ से, वर्षों तक थीं वहीं भटकती
पुनः भगीरथ लगे तप में, कृपा मिली फिर शंकर जी की

बिंदु सरोवर में जा छोड़ा, महादेव ने गंगा जी को
बनी सात धाराएँ उनकी, ले जाती थीं शीतल जल को  

हा्लादिनी, पावनी, नलिनी, पूर्व दिशा की ओर गयीं
सुचक्षु, सीता, महानदी सिन्धु, पश्चिम को थीं प्राप्त हुईं

सप्तम धारा थी जो उनमें, गयी भगीरथ के पीछे
दिव्य रथ पर थे आरूढ़ वे, अनुसरण उनका करने

गंगा जी की वह जल राशि, कलकल नाद के साथ बही
मत्स्य, कच्छप, शिंशुमार के, झुंड गिरे, अति शोभा हुई

देव, ऋषि, गन्धर्व, सिद्ध गण, यक्ष विमानों पर आये
अश्वों, गजराजों पर चढ़कर, गंगा जी को सभी निहारें