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Wednesday, January 11, 2012

जीवन्मुक्त के लक्षण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

जीवन्मुक्त के लक्षण

ब्रह्माकार वृत्ति है जिसकी, बुद्धि विषय से अनासक्त है
जो मिल जाये सहज ग्रहण कर, बालवत् जो रहे मुक्त है

जग एक स्वप्न समान हुआ, जिस ज्ञानी को, वह धन्य है
शेष नहीं कामना जिसकी, पुण्य अनंत जगे हैं उसके

परब्रह्म में चित्त लीन कर, आनंद मग्न सदा जो रहता
कर्म सहज ही होते उससे, कर्ता भाव नहीं है रहता

ब्रह्म आत्मा के ऐक्य को, जिसने भीतर प्राप्त किया है
प्रज्ञावान उस ज्ञानी को ही, स्थित प्रज्ञ कहा गया है

यथावत् व्यवहार भी करता, किन्तु स्वप्नवत् जगत को माने
जो कामना रहित हुआ है, जीवन मुक्त उसी को माने

जगत वासना शांत हुई है, कलावान पर कलाहीन सा  
निर्विकार स्वरूप में रहता, चित्त युक्त है जड़ अलिप्त सा

जब तक है प्रारब्ध शेष, देह छाया सा सँग ही रहता
मैं मेरे का भाव न बचता, ज्ञानी जीवन मुक्त हो रहता

न अतीत का शोक है उसको, न भविष्य की चिंता रखता
वर्तमान में जो मिलते, सुख-दुःख को सम भाव से सहता

आत्मस्वरूप से युक्त सदा जो, ऐसे जग में समदर्शी है
इष्ट अनिष्ट में भी सम रहता, ऐसा वह अद्भुत ज्ञानी है

ब्रह्मानंद रसास्वाद में, चित्त शांत हुआ है जिसका
बाह्य आंतरिक ज्ञान न रहता, चित्त समाधिस्थ हुआ है उसका  


Tuesday, November 8, 2011

आनंद मय कोष


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

आनंद मय कोष

आनंद स्वरूप आत्मा के, प्रतिबिम्ब से जो चुम्बित होता
तमोगुण से प्रकट हुआ, आनंद मय कोष कहाता

प्रिय, मोद, प्रमोद से युक्त, अभीष्ट प्राप्ति पर हो प्रकट
पुण्य कर्म उदय होने पर, सुख स्वरूप होता निकट

नींद में भी आनंद ही मिलता, भासित भीतर ही होता
जागृत व स्वप्न में भी, यत्किंचित आभासित होता

आनन्दमय नहीं परात्मा, यह भी है प्रकृति विकार
शुभकर्मों से उत्पन्न होता, स्थूल शरीर इसका आधार

पंचकोशों का कर निषेध, जो बचता है वही आत्मा
तीन अवस्थाओं का साक्षी, निर्विकार, निर्मल परात्मा

स्वयं प्रकाश, पृथक कोशों से, श्रुति जिसका गायन करती
सत् रूप वह शुद्ध स्वरूप, उसे न छू पाती प्रकृति

आत्मस्वरूप क्या है

पंच कोष मिथ्या हैं यदि तो, शून्य शेष रह जाता है
हे सदगुरु ! कृपा कर कहिये, आत्मा कौन कहाता है

हे साधक ! तू कुशल बड़ा है, तूने निर्णय उचित लिया है
ज्यों अहंकार आदि विकार हैं, अभाव भी उनका होता है

जो अनुभव करता है इनको, स्वयं न अनुभव में आता
अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उसको, ज्ञानी सत आत्मा मानता

जो भी जिसका करता अनुभव, साक्षित्व आत्मा ही करता
कोई नहीं साक्षी उसका, जिसका कोई न अनुभव होता

स्वयं को स्वयं से अनुभव करता, स्वयं का साक्षी है आत्मा
इससे परे न दूजा कोई, और न कोई अंतर आत्मा

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, अहं रूप से स्फुरित होता
मन, बुद्धि, चित्त आदि को, साक्षी भाव से सदा देखता

घट जल में ज्यों प्रतिबिम्ब सूर्य का, मूढ़ उसे ही सूर्य माने
अज्ञानी भी चिदाभास को, भ्रम से अपना आप ही जाने