Showing posts with label पक्षी. Show all posts
Showing posts with label पक्षी. Show all posts

Tuesday, November 26, 2013

श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञ स्थान के विषय में मुनि से प्रश्न

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

अष्टाविंशः सर्गः



विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहार विधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रों का उपदेश करना, श्रीराम का एक आश्रम एवं यज्ञ स्थान के विषय में मुनि से प्रश्न 

रघुकुल नन्दन राम ने कहा, अभी आप जाएँ निज धाम
किन्तु जरूरत पड़े जिस समय, मनोस्थित हो जाएँ आप

तत्पश्चात परिक्रमा करके, अस्त्रों ने किया प्रस्थान
श्रीराम ने पूछा मुनि से, पाया जब अस्त्रों का ज्ञान

सम्मुख जो पर्वत दिखता है, सघन वृक्ष से ढका हुआ
मन में है उत्कंठा जागी, पशुओं से जो भरा हुआ

पक्षी गीत वहाँ गाते हैं, मनहर है यह सुंदर वन
मानो कठिन ताटका वन से, दूर निकल आए अब हम

कौन यहाँ रहता है प्रभुवर, यज्ञ हो रहा कहाँ आपका
कहाँ मुझे रक्षा करनी है, उस आश्रम का देश कौन सा

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अट्ठाईसवां सर्ग पूरा हुआ.



Monday, May 21, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


द्वितीय सर्ग
रामायण काव्य का उपक्रम- तमसा के तट पर क्रौंचवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना 


हे निषाद ! तू रहे अशांत, नित्य-निरंतर ही पीड़ित हो
बिना किसी अपराध के मारा, क्रौंच युग्म से इक पक्षी को

ऐसा कह विचार किया जब, तब मन में चिंता उठ आयी
खग के शोक से पीड़ित मुझमें, यह कैसी वृत्ति छायी

परम ज्ञानी व बुद्धिमान थे, मुनि एक निश्चय पर पहुँचे
निकट गए अपने शिष्य के, उससे वचन यही बोले

शोक से पीड़ित मुख से निकला, चार चरण में बद्ध वाक्य है
सम अक्षर प्रत्येक चरण में, वीणा पर यह गेय भी है

श्लोक रूप होगा वचन यह, पूछा ऋषि ने भरद्वाज से
मुनिवर तब संतुष्ट हुए, हंसकर किया समर्थन उसने

विधिपूर्वक किया स्नान तब, लौटे निज आश्रम की ओर
पीछे आया शिष्य भी उनका, जल से भरा कलश लेकर

लौट आश्रम बातें करते, विविध विषय पर तब मुनिवर
किन्तु लगा था ध्यान सदा, उसी श्लोक की भाषा पर

तभी पधारे ब्रह्मा जी भी, सृष्टिकर्ता अखिल विश्व के
देख उन्हें स्वागत करने को, वाल्मीकि तब खड़े हो गए

पाध्य, अर्ध्य, आसन, स्तुति से, पूजन किया ब्रह्माजी का
पूछा कुशल समाचार भी, नत चरणों में प्रणाम किया

आसन पर विराजे ब्रह्मा, उन्हें भी सादर वहीं बिठाया
तब भी वाल्मीकि के मन में, वही श्लोक रहा छाया

बैर भाव में जिसकी बुद्धि, सोचा उस निषाद के बारे
मनहर कलरव करता था जो, प्राण हर लिये उस पक्षी के