Showing posts with label श्लोक. Show all posts
Showing posts with label श्लोक. Show all posts

Saturday, May 26, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् द्वितीय सर्ग


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्

द्वितीय सर्ग
रामायण काव्य का उपक्रम- तमसा के तट पर क्रौंचवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना 


यही सोचते हुए मुनि ने, ब्रह्मा जी को श्लोक सुनाया
शायद उचित नहीं था शाप, शोक से उनका मन घबराया

ब्रह्मा हँसे समझ कर पीड़ा, श्लोक ही है यह वाक्य छन्दबद्ध
नहीं करो अन्यथा विचार तुम, मुझसे ही प्रेरित यह शब्द

वर्णन करो राम चरित्र का, धर्मात्मा व वीर पुरुष जो
नारद जी से जो भी सुना है, श्लोक बद्ध वह कथा कहो

गुप्त या प्रकट वृतांत जो, राम, लक्ष्मण, व सीता के
सहज ज्ञात होंगे वे तुमको, कुछ भी मिथ्या नहीं लिखोगे

जब तक इस पावन धरती पर, सत्ता है नदियों, पर्वत की
तब तक रामायण भी रहेगी, तब तक महिमा है उसकी भी

जब तक प्रचलित राम कथा, तब तक तुम भी हो सृष्टि में
ऊपर, नीचे, ब्रह्म लोक में, जहाँ तुम्हारी आये मन में

जब अंतर्धान हुए ब्रह्मा जी, शिष्यों सहित मुनि थे विस्मित
बार-बार गाते थे श्लोक वे, शिष्य हुए बड़े प्रसन्न चित्

कहने लगे शिष्य उनके तब, गुरुदेव ने दुःख प्रकटा था
शोक बना वह श्लोक रूप, चार चरण से युक्त वाक्य था 

Monday, May 21, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


द्वितीय सर्ग
रामायण काव्य का उपक्रम- तमसा के तट पर क्रौंचवध से संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकि के शोक का श्लोक रूप में प्रकट होना तथा ब्रह्माजी का उन्हें रामचरित्रमय काव्य के निर्माण का आदेश देना 


हे निषाद ! तू रहे अशांत, नित्य-निरंतर ही पीड़ित हो
बिना किसी अपराध के मारा, क्रौंच युग्म से इक पक्षी को

ऐसा कह विचार किया जब, तब मन में चिंता उठ आयी
खग के शोक से पीड़ित मुझमें, यह कैसी वृत्ति छायी

परम ज्ञानी व बुद्धिमान थे, मुनि एक निश्चय पर पहुँचे
निकट गए अपने शिष्य के, उससे वचन यही बोले

शोक से पीड़ित मुख से निकला, चार चरण में बद्ध वाक्य है
सम अक्षर प्रत्येक चरण में, वीणा पर यह गेय भी है

श्लोक रूप होगा वचन यह, पूछा ऋषि ने भरद्वाज से
मुनिवर तब संतुष्ट हुए, हंसकर किया समर्थन उसने

विधिपूर्वक किया स्नान तब, लौटे निज आश्रम की ओर
पीछे आया शिष्य भी उनका, जल से भरा कलश लेकर

लौट आश्रम बातें करते, विविध विषय पर तब मुनिवर
किन्तु लगा था ध्यान सदा, उसी श्लोक की भाषा पर

तभी पधारे ब्रह्मा जी भी, सृष्टिकर्ता अखिल विश्व के
देख उन्हें स्वागत करने को, वाल्मीकि तब खड़े हो गए

पाध्य, अर्ध्य, आसन, स्तुति से, पूजन किया ब्रह्माजी का
पूछा कुशल समाचार भी, नत चरणों में प्रणाम किया

आसन पर विराजे ब्रह्मा, उन्हें भी सादर वहीं बिठाया
तब भी वाल्मीकि के मन में, वही श्लोक रहा छाया

बैर भाव में जिसकी बुद्धि, सोचा उस निषाद के बारे
मनहर कलरव करता था जो, प्राण हर लिये उस पक्षी के