Showing posts with label दिति. Show all posts
Showing posts with label दिति. Show all posts

Monday, July 21, 2014

दिति का अपने पुत्रों को मरुद्गण बनाकर देवलोक में रखने के लिए इंद्र से अनुरोध

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

सप्तचत्वारिंशः सर्गः

दिति का अपने पुत्रों को मरुद्गण बनाकर देवलोक में रखने के लिए इंद्र से अनुरोध, इंद्र द्वारा उसकी स्वीकृति, दिति के तपोवन में ही इक्ष्वाकु-पुत्र विशाल द्वारा विशाला नगरी का निर्माण तथा वहाँ के तत्कालीन राजा सुमति द्वारा विश्वामित्र मुनि का सत्कार

गर्भ के टुकड़े हुए देखकर, दिति को हुआ था दुःख भारी
दुर्द्धर्ष सहस्राक्ष इंद्र से, विनय पूर्वक वह ये बोलीं

देवेश ! मैं थी अपराधी, इससे ही यह दुःख पाया है
नहीं तुम्हारा दोष है इसमें, तुमने क्रूर जो कर्म किया है

कैसे अब यह प्रिय हो जाये, मेरे और तुम्हारे भी हित
वैसा ही उपाय मैं चाहूँ, खंड बनें ये मरुद्गण सात

दिव्य रूपधारी ये पुत्र, मारुत नाम से हों प्रसिद्द
सात वातस्कंध में विचरें, मुक्त गगन में सात मरुद्गण

ब्रह्म लोक में पहला विचरे, इंद्र लोक में दूजा गण
वायु नाम से अन्तरिक्ष में, महायशस्वी तीसरा गण

हो कल्याण तुम्हारा इंद्र, शेष चार दिशाओं में हों
तुमने मा रुदः नाम दिया है, मारुत नाम ही उनका हो

दिति का जब यह वचन सुना, इंद्र हाथ जोड़कर बोले
होगा वही जो माँगा तुमने, कोई संशय नहीं है इसमें

ऐसा निश्चय करके दोनों, स्वर्गलोक को चले गये
यही देश है राम जहाँ पर, सेवा दिति की, की इंद्र ने

पूर्वकाल में इक्ष्वाकु के, पुत्र विशाल नामके थे
अम्बुलषा के गर्भ से जन्मे, विशाला पुरी बसायी जिसने

हेमचन्द्र थे उनके पुत्र, प्रपौत्र थे वीर सुचन्द्र
सुचन्द्र के पुत्र धूमाश्व, धूमाश्व के थे सृंजय

सहदेव सृंजय के बेटे, कुशाश्व थे सहदेव के
सोमदत्त कुशाश्व के पुत्र, काकुत्स्थ थे सोमदत्त के

काकुत्स्थ के महातेजस्वी, सुमति नाम के पुत्र हुए हैं
परम कांतिवान वीर वे, इस समय यहाँ बसते हैं

सभी नरेश हुए धार्मिक, महा प्रसाद से इक्ष्वाकु के
आज रात हम यहीं रुकेंगे, कल चलकर मिथिला पहुंचेंगे

विश्वामित्र को आया जान, आये वहाँ पर सुमति राजा
बन्धु बांधवों, संग पुरोहित, हाथ जोड़कर की थी पूजा

धन्य हुआ मैं, आये आप, बड़ा आपका अनुग्रह मुझपर
दर्शन दिए आपने हमको, मुझसे नहीं है कोई बढ़कर


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.