यही सिलसिला है
किसी शाम हँस कर, कहा गुलमोहर ने
ली अम्बर से लाली, औ खुशबू जमीं से
हवा ने संवारा, खिलाया किरण ने
दी बदली ने ठंडक, खुशी जिंदगी ने
ये खुशबू ये रंगत, हैं जग के लिये
धरती, पवन और गगन के लिये
ये तोहफे जो कुदरत ने, सौंपे मुझे
हैं उसकी अमानत, चमन के लिये
कुछ अपना नहीं, सब जहाँ से मिला है
लौटना यहीं है यही सिलसिला है !
अनिता निहालानी
२१ मई २०११