श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
द्वाद्शः सर्गः
महाराज दशरथ की चिंता,
विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न मांगने के लिए अनुरोध करना
बार-बार विलाप करते थे, खो
जाता था चेत भी उनका
शोकमग्न थे, दुःख से पीड़ित,
कैकेयी का उर न पिघला
भीषण रूप धरा उसने फिर, वचन
कठोर कहे उसने
देकर पीछे क्यों पछताते, दो
वरदान दिए आपने
निज धार्मिकता का दावा फिर,
राजाओं में कैसे करेंगे
वरदानों की चर्चा होगी, तब उनसे
क्या आप कहेंगे
यही कहेंगे, कैकेयी ने,
संकट में रक्षा की मेरी
उस को ही वर देकर मैंने,
प्रतिज्ञा झूठी कर दी
अपने वचन से यदि फिरे, कुल
पर ही कलंक लगेगा
देवताओं को वचन दिया था,
सागर भी न लांघे सीमा
बाज, कबूतर के झगड़े में,
मांस दिया शैव्य राजा ने
नेत्रों का निज दान दिया, ब्राह्मण
को राजा अलर्क ने
धर्म को देकर तिलांजलि, राज्याभिषेक
राम का करके
कौशल्या के साथ सदा ही, मौज
उड़ाना आप चाहते
धर्म हो अथवा अधर्म यह,
सत्य या असत्य भी हो
जिसके लिए प्रतिज्ञा की है,
कैसे उसमें परिवर्तन हो
यदि राम को राज्य मिला तो,
विष पीकर प्राण त्यागूँगी
राजमाता यदि कौशल्या हों,
मर जाना अच्छा समझूंगी
अपनी और भरत दोनों की, कहती
हूँ मैं शपथ उठा ये
राम को वनवास के सिवा, नहीं
होगा संतोष किसी से
इतना कहकर चुप हो गयी वह,
राजा रोये, की विनती
कैकेयी ने किसी बात का, किन्तु
जवाब दिया न कोई
कुछ न बोले एक मुहूर्त, व्याकुल
हुईं इन्द्रियां सारी
तकते रहे एक दृष्टि से,
सुनकर वचन अमंगलकारी
वज्र समान कठोर वाणी से, राजा
को भारी दुःख था
कटे वृक्ष की भांति गिर
गये, ज्यों शपथ का ध्यान आया
लुप्त हुई चेतना उनकी, रोगी
से जान पड़ते थे
तेज हरा हो जिस सर्प का,
वैसे ही निश्चेष्ट हुए थे
दीन और आतुर वाणी में, फिर
रानी से वचन कहे
अनर्थ, अर्थ जान पड़े तुझको,
किसने तुझे उपदेश दिए
आवेशित है किसी भूत से, या
पिचाश ने ग्रस्त किया है
लज्जा भी तुझे नहीं आ रही,
शील भी तेरा नष्ट हुआ है
नहीं जानता था मैं इसको,
किसी बात का भय तुझको है
कैसा ओछा और असत्य है, ऐसा
वर तू माँग रही है
विरत हो जा इस विचार से, जगत
या मेरा भला चाहती
त्याग दे दूषित यह संकल्प, यदि
चाहे भरत का हित भी



