Friday, August 7, 2015

महाराज दशरथ का कैकेयी को समझाना और उससे वैसा वर न मांगने के लिए अनुरोध करना

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
प्रथमः सर्गः

द्वाद्शः सर्गः


महाराज दशरथ की चिंता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न मांगने के लिए अनुरोध करना 

बार-बार विलाप करते थे, खो जाता था चेत भी उनका
शोकमग्न थे, दुःख से पीड़ित, कैकेयी का उर न पिघला

भीषण रूप धरा उसने फिर, वचन कठोर कहे उसने
देकर पीछे क्यों पछताते, दो वरदान दिए आपने

निज धार्मिकता का दावा फिर, राजाओं में कैसे करेंगे
वरदानों की चर्चा होगी, तब उनसे क्या आप कहेंगे

यही कहेंगे, कैकेयी ने, संकट में रक्षा की मेरी
उस को ही वर देकर मैंने, प्रतिज्ञा झूठी कर दी

अपने वचन से यदि फिरे, कुल पर ही कलंक लगेगा
देवताओं को वचन दिया था, सागर भी न लांघे सीमा

बाज, कबूतर के झगड़े में, मांस दिया शैव्य राजा ने
नेत्रों का निज दान दिया, ब्राह्मण को राजा अलर्क ने

धर्म को देकर तिलांजलि, राज्याभिषेक राम का करके
कौशल्या के साथ सदा ही, मौज उड़ाना आप चाहते

धर्म हो अथवा अधर्म यह, सत्य या असत्य भी हो
जिसके लिए प्रतिज्ञा की है, कैसे उसमें परिवर्तन हो

यदि राम को राज्य मिला तो, विष पीकर प्राण त्यागूँगी
राजमाता यदि कौशल्या हों, मर जाना अच्छा समझूंगी

अपनी और भरत दोनों की, कहती हूँ मैं शपथ उठा ये
राम को वनवास के सिवा, नहीं होगा संतोष किसी से

इतना कहकर चुप हो गयी वह, राजा रोये, की विनती
कैकेयी ने किसी बात का, किन्तु जवाब दिया न कोई

कुछ न बोले एक मुहूर्त, व्याकुल हुईं इन्द्रियां सारी
तकते रहे एक दृष्टि से, सुनकर वचन अमंगलकारी

वज्र समान कठोर वाणी से, राजा को भारी दुःख था
कटे वृक्ष की भांति गिर गये, ज्यों शपथ का ध्यान आया

लुप्त हुई चेतना उनकी, रोगी से जान पड़ते थे
तेज हरा हो जिस सर्प का, वैसे ही निश्चेष्ट हुए थे

दीन और आतुर वाणी में, फिर रानी से वचन कहे
अनर्थ, अर्थ जान पड़े तुझको, किसने तुझे उपदेश दिए

आवेशित है किसी भूत से, या पिचाश ने ग्रस्त किया है
लज्जा भी तुझे नहीं आ रही, शील भी तेरा नष्ट हुआ है

नहीं जानता था मैं इसको, किसी बात का भय तुझको है
कैसा ओछा और असत्य है, ऐसा वर तू माँग रही है

विरत हो जा इस विचार से, जगत या मेरा भला चाहती
त्याग दे दूषित यह संकल्प, यदि चाहे भरत का हित भी





Tuesday, August 4, 2015

महाराज दशरथ की चिंता, विलाप, कैकेयी को फटकारना,

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

द्वाद्श सर्ग

महाराज दशरथ की चिंता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न मांगने के लिए अनुरोध करना

रानी का कठोर वचन सुन, चिंतित हुए बहुत राजा
एक मुहूर्त तक बैठकर, मन ही मन संताप किया

क्या यह स्वप्न देखता हूँ मैं, अथवा मोह हुआ मन में
आधि-व्याधि से चित्त मलिन है, या आवेशित किया भूत ने

भ्रम का कारण नहीं पता था, दुःख से मूर्छित हुए थे वे
होश जगा तो याद आया सब, पुनः भर गये पीड़ा से वे

जैसे बाघिन को देखकर, मृग को व्यथा प्राप्त है होती
कैकेयी को देख हृदय में, व्याकुलता, पीड़ा भर गयी

शैया रहित खाली भूमि पर, लम्बी साँस खींचते राजा
महाविषैला सर्प मंडल में, ज्यों मन्त्रों से अवरुद्ध हुआ

रोष में भर, धिक्कार है ! कहकर, पुनः मूर्छित हुए नरेश
दुःख से लुप्त हुई चेतना, बहुत देर में आया चेत

क्रोधपूर्वक बोले रानी से, दुःख व तेज से दग्ध किया
दयाहीन, तू दुराचारिणी !, कुलनाशिनी डाइन भी कहा

सगी माँ जो तुझे मानते, श्रीराम ने क्या बिगाड़ा
सब स्नेह करते हैं जिससे, क्यों अनिष्ट करती है उनका

निज विनाश हेतु ही शायद, तुझको अपने घर में लाया
राजकन्या के रूप में नागिन, ऐसा मैं था नहीं जानता

परित्याग कर सकता हूँ मैं, अन्य रानियों व राज्य का
किस अपराध से राम को त्यागूँ, जीव जगत उसे चाहे सारा

ज्येष्ठ पुत्र राम को देख, परम प्रेम उमड़ता उर में
नष्ट चेतना हो जाती जब, नजर नहीं आते हैं वे

सूर्य बिना जगत सम्भव है, पानी बिन खेती हो सकती
किन्तु राम बिन इस तन में, जीवन ज्योति नहीं रह सकती

नहीं लाभ यह वर माँग कर, त्याग दे इस दुराग्रह को
मस्तक रखता हूँ पैरों पर, त्याग दे इस क्रूर बात को

प्रथम वर स्वीकार्य मुझे है, राज्याभिषेक हो भरत का
तू पहले स्वयं ही कहती थी, राम है तेरा पुत्र बड़ा

ऊपर-ऊपर से ही कहती, या फिर सेवा का था लोभ
दुखी है सुन अभिषेक राम का, मुझे दिलाती है तू रोष

आवेशित हुई सूने घर में, परवश ही ऐसा कहती है
कैसा भारी अन्याय यह, बुद्धि विकृत तेरी हुई है

आज से पहले कभी भी तूने, ऐसा आचरण नहीं किया
नहीं भरोसा होता मुझको, तू कर सकती है क्या ऐसा

तेरे लिए तुल्य हैं दोनों, बहुत बार कहा यह तूने
राम हेतु वनवास फिर भला, भाया है तुझे कैसे

अति कठोर है हृदय तेरा, जो तेरी सेवा करते हैं
उन्हीं राम को देश निकाला, जो सुकुमार धर्मवान हैं

भरत को सेवा करते तेरी, नहीं कभी देखा मैंने

राम से बढ़कर दूजा कौन, तत्पर आज्ञा पालन में 

Monday, August 3, 2015

कैकेयी का भरत के लिए अभिषेक और राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास माँगना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकादश सर्गः

कैकेयी का राजा को प्रतिज्ञा बद्ध करके उन्हें पहले के दिए हुए दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिए अभिषेक और राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास माँगना

कामदेव के बाणों से हत, दशरथ उसके वशीभूत थे
कैकेयी ने कठोरता से, उनसे वचन कहे थे ये

न तो निन्दित हुई, किसी ने, न ही अपकार किया
चाहूँ मैं पूर्ति जिसकी, एक मनोरथ है मेरा

यदि पूर्ण करना चाहें तो, पहले शपथ आप ले लें
इससे पहले मौन रहूंगी, तभी कहूंगी उसे आपसे

थे अधीन काम के दशरथ, सुन उसकी बात मुस्काए
सिर रखा उसका गोदी में, केशों को पकड़ हाथ से

सौभाग्य पर गर्व तुम्हें है, क्या तुम इससे अनभिज्ञ हो
सिवा राम के कौन है ऐसा, जो तुमसे अधिक प्रिय हो

आराधनीय प्राणों द्वारा भी, अजेय राम की शपथ मुझे
पूर्ण तुम्हारी होगी इच्छा, एक बार बस कहो ! उसे

भद्रे ! केकयराजकुमारी !, वचनों की पूर्ति को आतुर
इच्छा व्यक्त करो तुम अपनी, ह्रदय हुआ जाता व्याकुल

शंका क्यों करती हो मुझपर, नहीं जानती अपने बल को
सत्कर्मों की शपथ खा कहता, प्रिय तुम्हारा सिद्ध शीघ्र हो

स्वार्थ सिद्धि में लगा हुआ था, रानी कैकेयी का मन
भरत के हित पक्षपात था, वश में पा राजा को हर्षित

सोचा उसने सही समय है, अपना हित साधने का अब
राजा से ऐसा बोली वह, कहना जिसका अति दुष्कर

उसका अभिप्राय था भयंकर, निकट आए हुए यम सा
राजन ! ली है शपथ आपने, सुनें उसे तैंतीस देवता

चन्द्र, सूर्य, आकाश, ग्रह, दिशा, जगत, भू, दिवस-रात्रि
गृह देव, गन्धर्व, निशाचर, राक्षस आदि सब बनें साक्षी

महातेजस्वी, सत्य प्रतिज्ञ, धर्म के ज्ञाता, सत्यवादी
महाराज मुझे वचन दे रहे, जिनकी जग में है ख्याति

काम मोहित हो थे उद्यत, वर देने को जो राजा
अपनी मुट्ठी में कर उनको, कर प्रशंसा फिर यह कहा

राजन ! याद करें वह बात, देवासुर संग्राम हो रहा
घायल किया था शत्रु ने, केवल प्राण नहीं हरा था

सारी रात जागकर मैंने, जीवन की रक्षा की थी
दो वरदान दिए आपने, आज उन्हीं को मैं मांगती

एक धरोहर के रूप में, रख छोड़े थे पास आपके
प्राण त्याग दूंगी मैं अपने, यदि उन्हें आप न दें

जैसे मृग जाल में फंसता, बहेलिये की वाणी मात्र से  
कैकेयी के वशीभूत हो, राजा बंधे प्रतिज्ञा में थे

राम के राज्याभिषेक की, जो तैयारी की आपने
पहले वर से यही मांगती, भरत का हो अभिषेक उसी से

तापस के वेश में राम, वन में रहें चौदह वर्षों तक
निष्कंटक युवराज पद यह, पा जायेगा पुत्र भरत

यही कामना है अब मेरी, ऐसा ही प्रबंध करें
राम को वन जाते देखूं, आप सत्यप्रतिज्ञ बनें

सत्य के द्वारा निज शील, कुल, जन्म की रक्षा हो
सत्य परम कल्याण का साधन, लोक या परलोक भी हो

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ.



Saturday, August 1, 2015

राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुखी होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

दशमः सर्गः

राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुखी होना और उसको अनेक प्रकार से सांत्वना देना

पापिनी कुब्जा ने रानी को, उलटी बातें जब समझा दीं
विष में बुझे बाण से बिद्ध, किन्नरी सी भूमि पर लोटी

निश्चय करके यह उत्तम है, कह डाला अपना मन्तव्य
मोहित और दुखी कैकेयी, लम्बी सासें ले सोचे यह

अति प्रसन्न हुई मंथरा, रानी का यह निश्चय जान
भौहों को टेढ़ा कर अबला, सोयी धरा पर दीन समान  

फेंक दिए सारे आभूषण, शोभा बने वे भूमि की
जैसे छिटके सुंदर तारे, बनते हैं शोभा नभ की

मलिन वस्त्र, एक वेणी धर, कोपभवन में थी दुखिया सी
बलहीन अथवा अचेत हुई, किन्नरी सम जान पड़ती थी

राजा देकर उधर आज्ञा, अभिषेक की रामचन्द्र के
यथासमय हों सब उपस्थित, कह, गये तब रनिवास में  

समाचार स्वयं जाकर देंगे, सभी रानियों को यह विशेष
वे कैसे जानेंगी, सोच यह, अंतः पुर में किया प्रवेश

सर्वप्रथम प्रवेश किया, कैकेयी का जो श्रेष्ठ भवन
मानों श्वेत बादलों वाले, नभ में रवि करे पदार्पण

तोते, मोर, क्रौंच व हंस, कलरव करते थे चहुँ ओर
चम्पा और अशोक खिले, घोष वाद्यों का भी मधुर

लताभवन, चित्र मन्दिर थे, सोने, चाँदी की वेदियाँ
स्वर्ग समान भोज्य पदार्थ थे, थीं कुब्जा व बौनी दासियाँ

राजा ने उत्तम शैया पर, कैकेयी को नहीं देखा
भर विषाद तब प्रतिहारी से, सूने घर का कारण पूछा

रानी कहीं नहीं जाती थी, राजा की आगमन बेला में
प्रतिहारी थी अति भयभीत, हाथ जोड़कर कहे शब्द ये

कोपभवन की ओर गयी हैं, कुपित हुई रानी कैकेयी
राजा सुन यह हुए उदास, इन्द्रियां भी व्याकुल हो उठीं

कोपभवन में भूमि पर थी, जो उसके योग्य नहीं था
राजा ने दुःख के कारण, संतप्त हो उसको देखा

वृद्ध थे राजा तरुणी पत्नी, प्राणों से बढ़ उसे मानते
पाप नहीं था उनके मन में, पर पाप रानी के मन में

कटी हुई लता की भांति, पृथ्वी पर वह पड़ी हुई थी
मानो कोई देवांगना, स्वर्ग से भूतल पर गिरी थी

ल्क्ष्यभ्रष्ट माया हो जैसे, बंधी हुई या कोई हिरनी
देवलोक से च्युत अप्सरा, स्वर्ग भ्रष्ट हो या किन्नरी

बाण बिद्ध हथिनी का जैसे, गजराज स्पर्श है करता
उसी तरह कामी राजा ने, कैकेयी का स्पर्श किया

भय समाया था मन में यह, जाने क्या कहने वाली है
हाथ फेर अंगों पर, पूछा, किसने यह हालत की है

देवी, क्रोध तुम्हारा मुझ पर, इस पर तो विश्वास न होता
किसने निंदा की है तुम्हारी, किसने या तिरस्कार किया

क्या कारण जो लोट रही हो, भूमि पर मुझे दुःख देने
मेरे चित्त को मथने वाली, हित तुम्हारा मेरे मन में

मेरे रहते तुम क्यों ऐसे, भूमि पर शयन करती हो
चित्त तुम्हारा हरा पिशाच ने, रोग से या पीड़ित हुई हो ?

कुशल वैद्य हैं संतुष्ट अति, सुखी तुम्हें वे कर देंगे
अथवा कहो, किसका हित चाहो, सफल मनोरथ सब होंगे

प्रिय रानी, देह न सुखाओ, किस अवध्य का वध चाहती
प्राणदण्ड पाने योग्य को, मुक्त कराना या चाहती

किस दरिद्र को धन दे दूँ, किसको मैं कंगाल बना दूँ
हैं अधीन तुम्हारे हम सब, जो चाहो पूरा कर दूँ

प्राण भी देने पड़ें मुझे तो, वही करूंगा जो तुम चाहो
सत्कर्मों की शपथ उठाता, संदेह को दूर भगा दो

सूर्य चक्र जहाँ तक घूमे, पृथ्वी है अधिकार में मेरे
द्रविड़, सिन्धु, सौवीर मगध, काशी कोसल मत्स्य देशों में

भांति-भांति के द्रव्य माँग लो, धन-धान्य, बकरी भेड़ भी
इतना क्लेश उठाती हो क्यों, उठो !  उठो ! प्यारी कैकेयी

जैसे सूर्य भगाता कुहरा, भय तुम्हारा दूर करूंगा
कैकेयी को मिली सांत्वना, कहने की जगी अब इच्छा


  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ.