Wednesday, July 22, 2015

अयोध्यापुरी में जनपदवासी मनुष्यों की भीड़ का एकत्र होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याककांड

षष्ठः सर्गः

सीता सहित श्रीराम का नियम परायण होना, हर्ष में भरे पुरवासियों द्वारा नगर की सजावट, राजा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा अयोध्यापुरी में जनपदवासी मनुष्यों की भीड़ का एकत्र होना

श्रीराम जी तब सीता संग, करें उपासना नारायण की
नमन किया हविष्य पात्र को, अग्नि में फिर आहूति दी

प्रिय मनोरथ की सिद्धि का, मन में फिर संकल्प लिया
भक्षण किया यज्ञ शेष का, चटाई पर विश्राम किया

तीन पहर जब बीत गये, एक पहर रात्रि शेष थी
सभामंडप को वे सजाएं, सेवकों को आज्ञा दी

सूत, मागध, बंदीजन की, श्रवण सुखद वाणी सुनकर
प्रातः कालिक संध्या की फिर, जप किया ध्यान लगाकर

वस्त्र रेशमी धारण करके, मधुसूदन को किया प्रणाम
स्वस्ति वाचन भी होता था, करते थे जिसे ब्राह्मण

गम्भीर व मधुर घोष तब, फ़ैल गया सारी नगरी में
हुए प्रसन्न अयोध्या वासी, लगे वे पुरी सजाने में

पर्वत सम ऊँचे मन्दिर के, बादल को छूते शिखर थे
ऊंची ध्वजा लगायीं उन संग, वृक्षों, अट्टालिकाओं में

चौराहों, गलियों, सभाओं, भवनों और दुकानों पर भी
फहरायीं उच्च पताकाएं, जनता सुख मनाती थी  

नटों, नर्तकों के समूह थे, गायक सुख वाणी गाते थे
चौराहों पर और घरों में, अभिषेक की चर्चा करते थे

राजमार्ग भी सजे हुए थे, पुष्प बिछे, धूप जले थे
सडकों पर दोनों ओर ही, शाखा युक्त दीप सजे थे

दशरथ की प्रशंसा करते, झुण्ड के झुण्ड लोग जमा थे
श्रीराम के गुण गा गाकर, जनपद वासी आ पहुंचे थे

जनरव बढ़ता ही जाता था, सागर की गर्जना समान
इन्द्रपुरी सा नगर बना था, पर्व के दिन सा बढ़ा महान

  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ.


Monday, July 20, 2015

वसिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देकर आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
पंचमः सर्गः

राजा दशरथ के अनुरोध से वसिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देकर आना और राजा को इस समाचार से अवगत कराना; राजा का अंतःपुर में प्रवेश

पुत्र को जब संदेश दे चुके, मुनि को बुलवाया दशरथ ने
विघ्ननिवारण व्रत दीक्षा, कहा, राम-सीता को वे दें  

वेद वेत्ता मुनि वसिष्ठ, तब आरूढ़ हुए थे रथ पर
श्रीराम से मिलने तत्क्षण, चले श्वेत भवन की ओर

तीन ड्योढ़ियों में उसकी, रथ से ही प्रवेश किया
जहाँ राम आ वेगपूर्वक, हाथ पकड़कर उन्हें उतारा

प्रिय वचन सुने जब उनके, कह ‘वत्स’ उन्हें पुकारा
वधू सहित वे आज रात्रि, करें उपवास, आदेश दिया

 नहुष ने ययाति का ज्यों, प्रेम से अभिषेक किया था
कल प्रातः युवराज के पद पर, अभिषेक तुम्हारा होगा

ऐसा कह उन व्रतधारी ने, कर मंत्रोच्चारण दी दीक्षा
गये महल से उसके पूर्व, पूजन किया राम ने उनका

भरा हुआ था नर-नारी से, महल राम का उस रात्रि
कमल सरोवर सा शोभित था, कलरव करते ज्यों पक्षी

झुण्ड के झुण्ड मनुष्य भरे थे, राजमार्ग पर चारों ओर
हर्षध्वनि प्रकट होती थी, कोलाहल था गर्जन घोर

घर-घर में फहरायीं पताका, गलियों में छिड़काव किया
शीघ्र ही सूर्योदय हो जाये, सब करते थे यही कामना

उत्सव था यह अति महान, आनंद को देने वाला
मुनि बढ़े यह सब देखते, राजा को सब कह सुनाया

दशरथ ने फिर ली विदा, अंतः पुर की ओर बढ़े
इन्द्रसदन के सम था सुंदर, दशरथ उसके भीतर गये

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पाँचवाँ  सर्ग पूरा हुआ.


श्रीराम का कौसल्या के भवन में जाकर माता को यह समाचार बताना

चतुर्थः सर्गः


श्रीराम को राज्य देने का निश्चय करके राजाका सुमन्त्र द्वारा पुनः श्रीराम को बुलवाकर उन्हें आवश्यक बातें बताना, श्रीराम का कौसल्या के भवन में जाकर माता को यह समाचार बताना और माता से आशीर्वाद पाकर लक्ष्मण से प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके अपने महल में जाना

चले गये जब सब पुरवासी, देशकाल नियम के ज्ञाता
महिमाशाली नृप दशरथ ने, कर मन्त्रणा तय कर डाला

कल ही है नक्षत्र पुष्य, कल ही राजतिलक होगा
अंत पुर में जा राजा ने, पुनः राम को बुलवाया

गये सुमन्त्र तत्काल महल में, द्वारपाल ने दी सूचना
पुनः जरूरत क्या आने की, मन में एक संदेह हुआ

राजा ने बुला भेजा है, निर्णय आप को ही करना 
 शीघ्र गये पिता से मिलने, सुना वचन जब सुमन्त्र का

दूर से ही पिता को देखा, चरणों में झुकाया मस्तक
उन्हें उठाकर गले लगाया, दिया बैठने को आसन

श्रीराम ! मैं वृद्ध हुआ हूँ, भोगे भोग, यज्ञ कर डाले
तुम अनुपम, प्रिय सन्तान, स्वाध्याय, दान भी दिए

हर अभीष्ट सुख भी पाया, हुआ उऋण सबके ऋण से
तुम्हें बनाऊं युवराज अब, नहीं शेष कोई कर्त्तव्य

जो भी कहूँ मैं अब तुमसे, उसे तुम्हें अवश्य मानना  
युवराज का पद स्वीकारो, प्रजा बनाना चाहे राजा

बुरे स्वप्न देखता हूँ मैं, दिन में वज्रपात भी होता
बड़ा भयंकर शब्द कर रहीं, उल्काओं का पात हो रहा

ज्योतिषियों का है कहना, जन्म नक्षत्र मेरा आक्रांत
ग्रहों ने उसको घेर लिया है, सूर्य, मंगल, राहू नामक

अशुभ लक्षणों के आने पर, आपत्ति में पड़ता राजा
मृत्यु भी हो सकती है उसकी, ऐसा ही कहा जाता

मोह चित्त में छा जाये, उससे पूर्व ही यह काम हो
चंचल होती मति जीवों की, इस कार्य को शीघ्र करो

पुनर्वसु पर आज चन्द्रमा, कल होंगे पुष्य पर वे
सीता सहित करो उपवास, कुश की ही शैय्या होवे

सावधान रह करें सुरक्षा, सुह्रद तुम्हारे सब ओर से
विघ्नों की संभावना होती, ऐसे ही शुभ कार्यों में

जब तक भरत हैं ननिहाल में, तब तक पूर्ण कार्य हो    
भरत सत्पुरुष व जितेन्द्रिय, इसमें नहीं संदेह किसी को
बड़े भाई का करें अनुसरण, धर्मात्मा दयालु भी हैं
धर्म परायण सत्पुरुषों का, चित्त डोल सकता किन्तु है 

पिता के ऐसा कहने पर, व्रत पालन की आज्ञा पाकर
निज महल में राम चले गये, राजा को तब प्रणाम कर

सीता को बताना चाहा, पिता ने जो व्रत कहा राम से
किन्तु न पा महल में उसको, गये तुरंत माँ के महल में

मौन, रेशमी वस्त्र पहन कर, देवपूजा में वह लगी थीं
राजलक्ष्मी की ही याचना, पुत्र हेतु माँ करती थीं

राज्याभिषेक का समाचार सुन, सुमित्रा व लक्ष्मण आये   
सीता को भी वहीं बुलाया, कौसल्या थीं ध्यान लगाये

सीता, लक्ष्मण और सुमित्रा, उनकी सेवा में खड़े थे
परम पुरुष के ध्यान में थीं, पुत्र के मंगल के भाव से

माँ के निकट गये तब राम, कर प्रणाम कहा माता से
प्रजापालन के कर्म में मुझको, किया नियुक्त पूज्य पिता ने

कल होगा राज्याभिषेक भी, पिता ने यह आदेश दिया  
सीता को भी मेरे साथ, रात्रि में उपवास है करना

जो भी मंगलकारी कर्म हों, इस निमित्त आप कराएँ
माता को अति हर्ष हुआ सुन, आँखों में आँसू भर आये

चिर काल से जिस बात की, हृदय में अभिलाषा की थी
बात सुनी पूर्ति की उसकी, राम से तब यह बात कही

चिरंजीवी हो, हे पुत्र ! तुम, विघ्नकारी शत्रु मिट जाएँ
राजलक्ष्मी प्राप्त करो तुम, हर्ष सभी बंधुगण पायें

मंगलमय नक्षत्र में जन्मे, प्रिय पुत्र तुम हो मेरे
पिता को प्रसन्न किया है, गुणों द्वारा तुमने अपने
सफल हुए मेरे व्रत आदि, कमलनयन विष्णु के हित
इक्ष्वाकु कुल की राजलक्ष्मी, मिली है तुमको इस निमित्त

माता के ऐसा कहने पर, लक्ष्मण से यह कहा राम ने
संग मेरे तुम भी करो शासन, अंतरात्मा तुम हो मेरे

राजलक्ष्मी मिली है तुमको, भोगो अभीष्ट भोग व फल
तुमसे ही मेरा जीवन है, राज्य की इच्छा भी तुम संग

कह कर ऐसा भाई से तब, कर दोनों माओं को प्रणाम
सीता को साथ चलने की, दिला के आज्ञा गये तब राम


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ.

Tuesday, July 14, 2015

राजा दशरथ का वसिष्ठ और वामदेवजी को श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी करने के लिए कहना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

तृतीयः सर्गः

राजा दशरथ का वसिष्ठ और वामदेवजी को श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी करने के लिए कहना और उनका सेवकों को तदनुरूप आदेश देना; राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को राज सभा में बुला लाना और राजा का अपने पुत्र श्रीराम को हितकर राजनीति की बातें बताना

सभासदों ने कमलपुष्प सी, अंजलियाँ लगायीं सिर से
 किया समर्थन प्रस्ताव का, हर प्रकार से मिलकर सब ने

पद्मान्जलि को स्वीकार कर, राजा ने प्रिय वचन कहे
बड़ी ख़ुशी है मुझे जान यह, राम शीघ्र युवराज बनें

अनुपम हुआ प्रभाव भी मेरा, चैत्र मास भी सुंदर, पावन
शुभ कार्य की हो तैयारी, खिले हुए हैं सब वन उपवन

राजा की यह बात सुनी तो, हर्षित हुए सभी पुरवासी
कोलाहल छा गया सभा में, शांत हुआ फिर बात कही

मुनि वसिष्ठ से पूछी नृप ने, सांगोपांग अभिषेक की रीति
करें आज्ञा सेवक जन को, शीघ्र ही हो तैयारी इसकी

महाराज का वचन सुना जब, मुनिवर ने दिया आदेश
हाथ बांधकर खड़े थे सेवक, सूची कही, दिया संदेश  

सोना आदि रत्न, कलश संग, पूजन की सभी सामग्री
श्वेत पुष्प की मालाएँ, औषधियां भी सब प्रकार की

 खील, शहद, घी, वस्त्र नये, अस्त्र, शस्त्र, चतुरंगिणी सेना
उत्तम लक्षण वाला हाथी, व्याघ्रचर्म भी एक समूचा

चमरी गाय के पूंछ की, बालों से बने व्यजन दो
स्वर्ण मढ़े सींगों का सांड, श्वेत छत्र, ध्वज, स्वर्ण कलश सौ

जो कुछ भी वांछनीय हो, उन सबको एकत्र करो
प्रातःकाल महाराज की, अग्नि शाला में पहुंचा दो

अंतः पुर व नगर द्वार सब, चन्दन व माला से सजाओ
गंध करे आकर्षित जिनकी, ऐसे धूप वहाँ सुलगा दो

दही, दूध, घी आदि से मिल, उत्तम अन्न तैयार करो  
एक लाख ब्राह्मणों के हित, जो भोजन पर्याप्त हो

श्रेष्ठ ब्राह्मणों का आदर कर, प्रातः उन्हें प्रदान करो
स्वस्ति वाचन हित भी उनके, आसन का प्रबंध करो

फहरायें पताकाएं भी, हो राजमार्गों पर छिडकाव
संगीतज्ञ, नर्तकियां भी, ड्योढ़ी में हों विद्यमान

देव मन्दिरों, चैत्यवृक्षों, पूज्य देवों को चौराहों के  
पृथक-पृथक भक्ष्य-भोज्य, संग दक्षिणा अर्पित करें

गोधाचर्म के पहन दस्ताने, ले लंबी तलवार हाथ में
कमर कसे आयें बलवान, शूरवीर योद्धा आंगन में

दे आदेश सेवकों को यह, वामदेव व मुनि वसिष्ठ ने
पुरोहित द्वारा हों संपादित, पूर्ण किये वे कर्म उन्होंने

हर्षित हो नृप से द्विज बोले, सम्पन्न हुआ कार्य सभी
कहा सुमन्त्र से तब राजा ने, बुला लाये राम को अभी

जो आज्ञा कह गये सुमन्त्र, रथ पर ले आये राम को
रथियों में थे श्रेष्ठ अति, बलशाली उन राजपुत्र को

राज भवन में बैठे राजा, शोभित होते इंद्र समान
वन वासी संग करें उपासना, चार दिशाओं के भूपाल

राम को आते देखा नृप ने, गजराज सम जिनकी चाल
कान्तिमान था मुखड़ा जिनका, प्रजा को करते थे निहाल

तृप्ति नहीं होती राजा को, रहें निहारें एक दृष्टि से
रथ से उतरे राम जब चले, थे सुमन्त्र भी उनके पीछे

राजमहल कैलाश शिखर सम, उज्ज्वल व ऊंचा भी था
राम चढ़े संग सुमन्त्र के, सादर उनको प्रणाम किया

राजा ने तब उन्हें देखकर, हाथ पकड़ अंक लगाया
मणिजटित सुवर्ण से भूषित, सिंहासन प्रदान किया

जैसे सूर्य उदयकाल में, मेरुपर्वत करे प्रज्ज्वलित
उसी प्रकार सिंहासन को, निज प्रभा से किया प्रकाशित

शरद काल का आकाश ज्यों, शोभित होता है चन्द्र से
सभा भी वह शोभा पाती थी, हो प्रकाशित श्रीराम से

लख दर्पण में निज प्रतिबिम्ब, होता है संतुष्ट ज्यों मानव 
दशरथ भी प्रसन्न हुए थे, शोभाशाली प्रिय पुत्र देख कर

राजा ने तब उन्हें पुकारा, कश्यप जैसे देवराज को
पुत्र बड़ी महारानी के तुम, माता के अनुरूप ही हो

गुणों में मुझसे बढ़कर हो, प्रिय पुत्र मेरे तुम राम
 गुणों से प्रजा प्रिय बने हो, पुष्य नक्षत्र में हो युवराज

हो गुणवान स्वभाव से ही तुम, सबका निर्णय यही सदा है
स्नेहवश फिर भी कुछ कहता, जिससे हित ही सधे तुम्हारा

जितेन्द्रिय बने रहो तुम, आश्रय अधिक विनय का लो
काम, क्रोध से होने वाले, दुर्व्यसनों का त्याग करो

परोक्ष और प्रत्यक्ष नीति से, न्याय विचार में हो तत्पर
मंत्री, सेनापति सभी संग, प्रजा, प्रकृति के हो हितकर

कोष्ठागार व शस्त्रागार में, संग्रहित हों पर्याप्त वस्तुएं
मित्रों भी होंगे आनंदित तब, अमि पा जैसे देव हुए थे

राजा की ये बातें सुनकर, तुरंत राम के गये सुह्रद
माँ कौशल्या को जाकर यह, कहा शुभ समाचार सुखद  

श्रेष्ठ नारियों में कौशल्या, सुह्रदों को दिया इनाम
रत्न, सुवर्ण, गौएँ बाँटी, सुन कर यह प्रिय संवाद

किया प्रणाम पुनः राजा को, छवि जिनकी अति अभिराम
प्रजाजनों से हो सम्मानित, रथ पर बैठ भवन गये राम

आज्ञा लेकर तब राजा की, नगरवासी भी लौट गये
वस्तु अभीष्ट मिले अति शीघ्र, कहकर देव पूजने लगे


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ.




 ण्डम्