Wednesday, April 27, 2016

गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कल-धारण का अनौचित्य बताना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

सप्तत्रिंश सर्गः

श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र धारण, सीता के वल्कल धारण से रनिवास की स्त्रियों को खेद तथा गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कल-धारण का अनौचित्य बताना

बात सुनी मंत्री की जब, विनय के ज्ञाता कहा राम ने
भोगों का परित्याग कर चका, क्या प्रयोजन है सेना से

निर्वाह होगा फल-मूल से, छोड़ चका हूँ सब आसक्ति
भरत को अर्पित करता हूँ मैं, मेरे लिए पर्याप्त चीर ही

गजराज का दान करे, पर रस्से को रखना चाहे
नहीं है उचित ऐसा लोभ, क्यों आसक्ति हो रस्से में

खंती और पिटारी ही अब, उपयोगी हो सकती वन में
शर्म-लाज सब छोड़ चुकी थी, कैकयी स्वयं लायी उन्हें

चीर लिए उसके हाथों से, मुनियों के से वस्त्र धरे
वल्कल वस्त्र किये धारण तब, इसी प्रकार लक्ष्मण ने

तब धर्मज्ञा जनक नंदिनी, अपने लिए चीर देखकर
उसी प्रकार भयभीत हो गयीं, मृगी ज्यों होती जाल देखकर

लज्जित हुईं वस्त्र लेकर वह, नयनों में अश्रु भर आये
तेजस्वी पति से पूछा, वनवासी कैसे चीर बाँधते

वल्कल एक गले में डाला, दूजा लिए हाथ में वे
बस चुपचाप खड़ीं थीं वह, स्वयं बांधा तब राम ने

सीता को वल्कल पहनाया, उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर
रोने लगीं देख रानियाँ, आँखों में आँसू भरकर

हुईं खिन्न बोलीं राम से, न सीता को वनवास मिला
तुम जब तक वन में रहोगे, देख इसे हम रहें यहाँ

लक्ष्मण को संग ले जाओ, किन्तु नहीं सीता हित वन
पूर्ण करो याचना हमारी, सफल बने हमारा जीवन

माताओं की बातें सुन भी, पहनाया सीता को वल्कल
पति समान शील था जिसका, उसे देख गुरु हुए व्याकुल

कैकेयी से कहा उन्होंने, किया उल्लंघन मर्यादा का
पैर अधर्म की ओर बढ़ाती, है कलंक तू अपने कुल का

राजा को धोखा देकर अब, शील का परित्याग किया
सीता वन नहीं जाएँगी, उनका ही राज्य यह होगा

यह अर्धांगिनी हैं राम की, हैं आत्मा श्रीराम की
उनकी जगह यही लेंगी अब, राज सिंहासन पर बैठेंगी

वन को गयीं यदि जनक नन्दिनी, हम भी साथ चले जायेंगे
सभी नागरिक, रक्षक सारे, धन-दौलत भी ले जायेंगे

भरत और शत्रुघ्न दोनों, चीर वस्त्र धारण कर लेंगे
वन में जाकर श्रीराम की, दोनों मिल सेवा करेंगे

निर्जन व सूनी पृथ्वी का, रह अकेली राज्य करना
दुराचारिणी, अहितकारी, राज्य नहीं वह वन होगा

स्वतंत्र राष्ट्र बनेगा वह वन, राम जहाँ निवास करेंगे
भरत यदि हैं पुत्र पिता के, राज्य नहीं लेना चाहेंगे

पुत्रवत् बर्ताव भी करें, ऐसा नहीं कदापि होगा
अप्रिय ही किया है तूने, प्रिय करना चाहा भरत का

कोई ऐसा नहीं है जग में, श्रीराम का जो न भक्त हो
तू आज ही देखेगी कि, पशु, पक्षी, मृग जाते वन को

औरों की क्या बात वृक्ष भी, उत्सुक संग चले जाने को
सीता से वल्कल ले उनको, दे वस्त्र धारण करने को

राम का ही वनवास हुआ है, सीता न वल्कल धरें
वस्त्रों से होकर आभूषित, वन में यह निवास करें

सेवक और सवारी भी हों, वस्त्र व उपकरण सारे
अप्रतिम मुनि वसिष्ठ के, सीता ने ये वचन सुने

किन्तु प्रियतम पति समान ही, इच्छा थी वेश धरने की
विदेह नंदिनी, जनक दुलारी, चीर धारण से नहीं विरत हुईं


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Tuesday, April 26, 2016

सिद्धार्थ का कैकेयी को समझाना तथा राज का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

षट्त्रिंशः सर्गः
राजा दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, सिद्धार्थ का कैकेयी को समझाना तथा राज का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना 

राजा का यह क्रोध देखकर, कैकेयी भी हुई कुपित
राजा सगर की याद दिलायी, उसने हो दुगनी क्रोधित

असमंज पुत्र था उनका, देश निकाला दिया जिसे
इसी तरह चाहिए इनको, जाएँ निकल राम यहाँ से 

‘है धिक्कार’ कहा राजा ने, सब लोग गड़ गये लाज से 
किन्तु समझ न पायी रानी, औचित्य को धिक्कार के

उस समय वहाँ बैठे थे, वयोवृद्ध प्रधान मंत्री
सिद्धार्थ नाम था उनका, धर्म युक्त यह बात कही

असमंज दुष्ट अति था, बच्चों को सरयू में फेंकता
ऐसे ही कार्यों से वह, अपना मनोरंजन था करता

नगरनिवासी बोले नृप से, उसकी यह करतूत देखकर
या तो असमंज को रखें, या हमसब ही रहें यहाँ पर

प्रजाजनों की बात सुनी जब, त्याग दिया पुत्र राजा ने
पत्नी सहित उसे बिठाकर, बाहर निकाला सामग्री दे

फाल और पिटारी लेकर, कन्दराओं में वह विचरा
दुर्गम गुफा बनी निवास, पापाचारी था, त्यागा

किन्तु राम का क्या दोष है, रोका जिन्हें राज्य पाने से
शुक्ल द्वितीया के चन्द्र समान, कोई अवगुण नहीं है इनमें

यदि दोष कोई हो उनमें, उसे कहो ठीक तुम आज
सन्मार्ग में जो स्थित है, धर्म विरुद्ध है उसका त्याग

कोई लाभ न होगा तुमको, राज्याभिषेक रोकने में
इंद्र तेज भी दग्ध हो सके, रक्षा करो लोकनिंदा से  

सिद्धार्थ की बातें सुनकर, थके हुए राजा भी बोले
हित अहित का ज्ञान न रहा, तुझको मेरे या अपने  

दुःखद मार्ग का आश्रय लेकर, कर रही ऐसी कुचेष्टा
साधू पुरुषों के विरुद्ध है, यह तेरी सारी चेष्टा

धन, राज्य व सुख त्याग कर, मैं भी चला राम के पीछे
राज्य अकेली तू भोगना, ये लोग भी साथ चलेंगे


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ

Tuesday, April 19, 2016

राजा दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

षट्त्रिंशः सर्गः
राजा दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, सिद्धार्थ का कैकेयी को समझाना तथा राज का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना

इक्ष्वाकु कुल नन्दन राजा, होकर पीड़ित निज प्रण से
अश्रु बहाते, श्वास खींचते, फिर सुमन्त्र से यह बोले

रत्नों से भरी-पूरी जो, चतुरंगिणी उस सेना को
श्रीराम के पीछे-पीछे, वन जाने की आज्ञा दो

रूपाजीवा सरस स्त्रियाँ, महाधनी व कुशल वैश्य भी
करें सुशोभित सेनाओं को, जाये संग खजाना भी

वीर मल्ल जो प्रिय राम के, आयुध, व्याध और पशु संपदा
संग चले यदि राम के वे सब, नहीं करेंगे स्मरण राज्य का

यज्ञ करेंगे वे वनों में, राज्य करें भरत अवध का
ऋषियों से मिल रहेंगे सुख से, आचार्यों को दे दक्षिणा

मनोवांछित भोग से उन्हें, सम्पन्न करके भेजा जाये
महाराज की बातें सुनकर, कैकेयी का मन घबराए

गला रुंधा, सूखा मुख उसका, त्रस्त हुई दुखी वह बोली
 स्वाद विहीन वह सुरा न लेगा, सार भाग ले जिसका कोई

सेवन करने योग्य न होगा, धनहीन राज्य यह सूना
भरत कदापि न लेंगे इसे, सुन कर तब राजा ने कहा

अनार्ये, अहित कारिणी, दुर्वह भार दिया है तूने
शब्दों के चाबुक मारती, ढो रहा उस भार को जब मैं

पहले तो यह नहीं कहा था, जाना है अकेले वन में
जो प्रतिबन्ध लगाती है अब, सेना, सामग्री देने में  



  

Tuesday, April 12, 2016

सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस से मस न होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

पञ्चत्रिंशः सर्गः
सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस से मस न होना

तत्पश्चात सारथि सुमन्त्र, सहसा उठकर खड़े हो गये
अमंगलकारी संताप से, क्रोध से कम्पित, दुखी हुए वे

देह, मुख की कांति बदल गयी, रक्तिम नयन, श्वासें लम्बी 
क्रोध से हाथ हाथ से मलते, दांत भींचते, वाणी तीखी

अशुभ व अनुपम वचन वज्र से, कैकेयी को किया प्रताड़ित
पति का ही जब त्याग कर दिया, कर्म कौन सा तुमसे बाधित

देवराज के सम अजेय जो, पर्वत से थिर रहने वाले
सागर सम जो क्षोभ रहित, दुःख देती उनको कर्मों से

राजा दशरथ पति तुम्हारे, पालक और हैं वर दाता
कोटि पुत्रों से बढ़कर होती, नारी हेतु पति की इच्छा

ज्येष्ठ पुत्र ही बनता राजा, राजा की मृत्यु होने पर
 इस कुल की यही परंपरा, तुम इसे मिटा देने को आतुर

राजा हो भरत करें शासन, हम जायेंगे किन्तु राम संग
ब्राह्मण नहीं निवास करेगा, मर्यादा यदि होगी भंग

क्या आनन्द मिलेगा तुमको, फिर ऐसा राज्य पाकर
अचरज होता है मुझको क्यों, भूमि न फटती अत्याचार पर

ब्रह्मर्षियों के शाप भयंकर, क्यों न तुमको भस्म कर रहे  
श्रीराम को बाहर करती, तुम पाषाणी का नाश कर रहे

आम काटकर कौन भला, नीम का सेवन करना चाहे
नीम को जो दूध से सींचे, नीम ना मीठा हो जाये

तुम भी अपनी माँ जैसी हो, जो अपने कुल स्वरूप थी
नीम से मधु नहीं टपकता, यही सत्य है कैकेयी

एक समय किसी साधु ने, उत्तम वर दिया पिता को
कैकय नृप लगे समझने, सभी प्राणियों की बोली को

शय्या पर लेटे थे एक दिन, जृम्भ की ध्वनि पड़ी कानों में
हँसी आ गयी सुनकर उसको, अभिप्राय जब आया समझ में

निकट ही उसी शय्या पर, सो रहीं थीं माँ तुम्हारी
राजा मेरी हँसी उड़ाते, यह समझ वह कुपित हो उठी

क्या है कारण इस हँसी का, यह जानना चाहती हूँ मैं
यदि बता दूँ कहा नरेश ने, मर जाऊँगा नहीं है संशय

यह सुनकर कहा रानी ने, मरो या जीयो, मुझे न मतलब
हँसी न फिर उड़ा सकोगे, शीघ्र ही बता दो कारण  

प्रिय रानी के यह कहने पर, राजा गया साधु के पास
रानी रहे या घर से जाये, नहीं उसे बताना बात

राजा ने उसे घर से निकाला, स्वयं कुबेर सा करें विहार
तुम भी पाप मार्ग पर जाकर, अनुचित करती हो व्यवहार

लोकोक्ति यह सत्य लग रही, सोलह आने आज मुझे
पुत्र पिता समान होते हैं, कन्याएं समान माता के

तुम न बनो ऐसी रानी, राजा को स्वीकार करो
पति की इच्छा को मानकर, जन समुदाय को शरण दो

पापपूर्ण विचार जो रखते, न उनके बहकावे में आओ
 लोक प्रतिपालक पति को, अनुचित कर्म में नहीं लगाओ

कमलनयन राजा दशरथ, दूर पाप से ही रहते
देवराज इंद्र के तुल्य, प्रतिज्ञा झूठी न करेंगे

श्रीराम ज्येष्ठ, उदार हैं, कर्मठ व स्वधर्म के पालक
जगत के रक्षक, बलशाली, होने दो इनका अभिषेक

राम यदि चले जायेंगे, निंदा होगी बड़ी तुम्हारी
तुम निश्चिन्त रहो कुशल से, अतः बनें युवराज राम ही

श्रीराम के सिवा न कोई, रह सकता अनुकूल तुम्हारे
महाराज वन को जायेंगे, पूर्वजों का स्मरण करके

इस प्रकार की विनती सुमन्त्र ने, किन्तु न विचलित हुई कैकेयी
कोई फर्क न पड़ा चेहरे में, न ही क्षोभ न कोई दुःख ही


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ