Thursday, September 12, 2013

श्रीराम द्वारा ताटका वध -अंतिम भाग

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षड्विंशः सर्गः
श्रीराम द्वारा ताटका वध 

इच्छाधारी थी ही ताटका, रूप अनेकों धारण करती
राम-लखन को डाल मोह में, पल भर में अदृश्य हो गयी

विचरण करने लगी गगन में, पत्थर की वर्षा तब हुई
कहा मुनि ने श्री राम से, व्यर्थ तुम्हारी करुणा गयी  

दुराचारिणी है यह पापिनी, विघ्न सदा यज्ञों में डाले
सांयकाल में होकर दुर्जय, पुनः प्रबल हो न माया से

बात सुनी जब मुनिवर की तब, शब्दबेधी बाण चलाया
प्रस्तर की वर्षा करती हुई, यक्षिणी को अवरुद्ध किया

घिर गयी जब बाण समूह से, गर्जन करती लपकी उनपर
इंद्र वज्र सा देखा आते, आहत किया था बाण मारकर

गिरी भूमि पर मृत होकर जब, देवों ने की थी सराहना
सुंदर वचन कहे ये मुनि को, इंद्र सहित वहाँ आए देवता

 प्रकट करें राम पर स्नेह अब, देवों को किया संतुष्ट
अर्पित करें शस्त्रों को जो, प्रजापति कृशाश्व के पुत्र

ये सुपात्र हैं अस्त्र दान के, सेवा करते सदा आपकी
 सम्पन्न होगा कार्य महान, देवों का इनके द्वारा ही

ऐसा कह देव चले गये, संध्या की हुई फिर बेला  
विश्वामित्र ने मस्तक सूंघा, फिर राम से वचन कहा

आज रात यही ठहरेंगे, कल पुनः जायेंगे आश्रम
सुख से यहाँ बिताओ रात, शापमुक्त हो गया है वन

चैत्ररथ था जैसा मनहर, वैसा ही वन बना था सुन्दर
प्रातःकाल की. की प्रतीक्षा, रात्रि वहीं बिताई सुखकर  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छबीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Friday, September 6, 2013

श्रीराम द्वारा ताटका वध

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षड्विंशः सर्गः

श्रीराम द्वारा ताटका वध 

जोश भरे ये वचन मुनि के, सुन बोले उत्तम व्रती राम
पिता की यह आज्ञा है मुझको, वचन आपके सदा प्रमाण

हो निशंक मैं माँनू उनको, जो आदेश आपका होगा
पिता का वह उपदेश स्मरण कर, मैं ताटका वध करूंगा

गौ, ब्राह्मण, तथा देश का, हित करने का मैं इच्छुक
अनुपम मुनिवर ! आप कहें जो, कार्य पूर्ण करने को उत्सुक

 धनुष संभाला मध्य भाग से, ऐसा कहकर वीर राम ने
प्रत्यंचा पर दी टंकार, गूँज उठीं सम्पूर्ण दिशायें

उस शब्द को सुनकर काँपे, प्राणी सभी ताटका वन के
पहले हुई अधीर ताटका, फिर दौड़ी वह क्रोध में भरके

अति विशाल काया थी उसकी, मुखाकृति भी विकृत सी
अति क्रोध में भरी हुई थी, जब श्रीराम ने दी दृष्टि

 कैसा दारुण और भयंकर, इस निशाचरी का है तन
कहा लक्ष्मण से राम ने, दर्शन से भयभीत हों जन

मायाबल से दुर्जय है यह, इसे पराजित करूंगा मैं
स्त्री होने से रक्षित है, नष्ट करूं गति को इसकी मैं

श्रीराम ने कहा ही था, जब आयी वहीं ताटका भीषण
एक हाथ उठाकर दौड़ी, की गर्जना उसने दारुण

मुनि ने तब हुंकार भरी, विजय कामना की राम की
धूल उड़ाना शुरू किया तब, दोनों पर ताटका ने भी

 पल भर लख धूल के बादल, मोह में पड़े थे दोनों भाई
आश्रय ले माया का उसने, तब पत्थर की वर्षा बरसाई

बाणों की वर्षा के द्वारा, रोक दिया शिलाओं को जब
आती हुई उस निशाचरी के, काट दिए दो हाथ थे तब

दोनों भुज कट जाने से, थकी ताटका करती गर्जन
नाक-कान भी काट लिए तब, कुपित हुए सुमित्रा नन्दन

    

Friday, August 23, 2013

विश्वामित्रजी का ताटका वध के लिए प्रेरित करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


पंचविंशः सर्गः

श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उनसे ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका वध के लिए प्रेरित करना

अपरिमित प्रभावशाली जो, विश्वामित्र का कथन सुना जब
पुरुष सिंह श्रीरामचन्द्र ने, अति शुभ यह वचन कहा तब

मुनिश्रेष्ठ, जब अबला है वह, उसका बल थोड़ा ही होगा
एक हजार हाथियों का बल, कैसे उसमें सम्भव होगा

अमित तेजस्वी रघुनाथ के, कहे हुए इस वचन को सुनकर
 राम, लक्ष्मण को हर्षित कर, कहे मुनि ने वचन मधुर

सत्य कहा, वह अबला ही थी, वर पाकर वह सबल हुई है
किस कारण वर पाया उसने, सुनो कथा जो मैंने कही है

पूर्वकाल की बात है यह, था एक महान यक्ष सुकेतु
बड़ा पराक्रमी, सदाचारी भी, की तपस्या पुत्र के हेतु

ब्रह्माजी प्रसन्न हुए पर, कन्या रत्न का दान किया
एक हजार हाथियों का बल, उन्होंने ही प्रदान किया

बढ़ने लगी यक्ष बालिका, रूपवती यौवन पाया
जम्भू पुत्र सुन्द से तब, पिता ने उसका ब्याह रचाया

कुछ काल के बाद उसे, दुर्जय पुत्र मारीच हुआ
दे शाप अगस्त्य मुनि ने, राक्षस उसको बना दिया

 मुनि द्वारा पति सुन्द भी, मारा गया था शापित होकर
मुनिवर को मारने हेतु, पुत्र सहित थी ताटका तत्पर

कुपित हुई दौड़ी गरजती, मुनि को खा जाने के हेतु
मारीच को शाप दिया तब, देव योनि से निष्कासन हेतु

फिर अत्यंत अमर्ष में भरकर, शाप दिया ताटका को भी
तू है वैसे महा यक्षिणी, नरभक्षण कर बन राक्षसी

इस प्रकार शाप मिलने से, क्रोधित हो उठी ताटका
 सुंदर वन को दिया उजाड़, जहाँ मुनिवर का निवास था

वध कर डालो इस राक्षसी का, गौओं व ब्राह्मणों के हित
कोई नहीं समर्थ है इसमें, करो रघुकुल को आनन्दित

नहीं दिखाओ करुणा इस पर, राजपुत्र का धर्म यही है
चारों वर्णों का यदि हित हो, स्त्री वध भी तब उचित है

प्रजापालक नरेश प्रजाहित, दोषयुक्त कर्म भी करते
क्रूरकर्म में भी यदि उनको, होना हो रत नहीं वे रुकते

राज्य भार हो जिनके ऊपर, उनका तो यह धर्म सनातन  
महापापिनी है ताटका, वध उचित है धर्मविहीन

पूर्वकाल में हुई मंथरा, थी विरोचन की जो पुत्री
इंद्र ने वध किया उसका, थी पृथ्वी नाश की इच्छा उसकी

शुक्राचार्य की माता थी जो, भृगु की पतिव्रता पत्नी थी
विष्णु ने वध किया था उसका, जग इंद्र शून्य करना चाहती थी

इसी तरह अन्यों ने भी, किया दुष्ट स्त्रियों का वध
दया या नफरत को त्याग कर, कर डालो ताटका का वध

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पच्चीसवां सर्ग पूरा हुआ.





Wednesday, August 7, 2013

ताटका वन का परिचय देते हुए इन्हें ताटका वध के लिए आज्ञा प्रदान करना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

चतुर्विंशः सर्गः


श्रीराम और लक्ष्मण का गंगा पार होते समय विश्वामित्र से जल में उठती हुई तुमुल ध्वनि के विषय में प्रश्न करना, विश्वामित्रजी का उन्हें इसका कारण बताना तथा मलद, करुष एवं ताटका वन का परिचय देते हुए इन्हें ताटका वध के लिए आज्ञा प्रदान करना

तदन्तर निर्मल प्रभात में, नित्यकर्म से निवृत्त होकर
विश्वामित्र को आगे करके, दोनों भाई आये तट पर 

उत्तम व्रत धारी मुनियों ने, सुंदर नाव एक मंगवाई
विश्वामित्र से कहे वचन तब, राजपुत्रों संग हो उतराई

बैठ गये वे सब नाव में, सिन्धु गामिनी गंगा में तब
तुमुल ध्वनि सुनी थी सबने, आये नदी के मध्य में जब

श्रीराम ने पूछा कारण, उत्कंठा थी उनके स्वर में
विश्वामित्र ने कहे वचन, ये ध्वनि है जल के टकराने से

कैलाश पर्वत पर स्थित, एक सरोवर है अति सुंदर
ब्रह्मा जी के मन से उपजा, कहलाता है मानसरोवर

उससे एक नदी निकली है, अवध से सटकर जो बहती
पावन नदी कहाए सरयू, ब्रह्मसर से है निकली

उसका जल गंगा में मिलता, जिससे यह आवाज हो रही
करो प्रणाम संगम के जल को, तुलना नहीं है इसकी कोई

कर प्रणाम फिर दोनों भाई, उतरे गंगा के दक्षिण तट पर
जल्दी-जल्दी लगे वे बढ़ने, सम्मुख वन को एक देखकर

बड़ा भयंकर वन था जिसमें, मानव का प्रवेश नहीं था
 अति अद्भुत, दुर्गम था भारी, हिंसक पशुओं से भरा हुआ

झिल्लियों की झंकार भरी थी, पक्षी बोलें भीषण स्वर में
क्या नाम है इस जंगल का,  मुनिवर से पूछा राम ने

महा तेजस्वी, महामुनि ने, कहा, सुनो, कहता मैं परिचय
जिसके ये अधिकार में था, पूर्वकाल में कौन थे वे

मलद और करुष नामके, दो जनपद समृद्धिशाली थे
देवों के प्रयत्न से निर्मित, वे दोनों देश अति सुंदर थे

वृत्रासुर का वध करने से, इंद्र हुए थे मल से लिप्त
पीड़ित किया क्षुधा ने उनको, ब्रह्म हत्या से भी तप्त

ऋषियों देवों ने नहलाया, गंगाजल कलशों में भरकर
मल व कारुष छूट गये तब, इंद्र हुए निर्मल, निष्करुष

हो प्रसन्न इंद्र ने तब यह, वर दे डाला इस प्रदेश को
होंगे सम्पन्न तथा सुखी, मलद, करुष ये जनपद दो

आई कुछ काल के बाद, एक यक्षिणी इच्छाधारी
एक हजार हाथियों का बल, निज तन में धारण करती  

सुन्द दैत्य की पत्नी है वह, उसका नाम ताटका है
है बलवान इंद्र समान जो, मारीच पुत्र उसी का है

बड़ा भयानक रूप है उसका, सदा प्रजा को देता कष्ट
दुःख देती ताटका भी है, दोनों जनपद उससे त्रस्त

डेढ़ योजन तक मार्ग को, घेर के रहती है यक्षिणी
राम तुम्हारे बाहूबल से, पाए मृत्यु वह दुराचारिणी

पुनः बने भूमि निष्कंटक, सबके लिए हो सुगम प्रयाण
उसने इसे उजाड़ दिया है, तभी है सूना यह स्थान


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौबीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Thursday, July 25, 2013

विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगा संगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

त्रयोविंशः सर्गः

विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगा संगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना

बीती रात हुआ प्रभात जब, वचन मुनि ने उन्हें कहे ये  
कुकुत्स्थ वंशी राजपुत्र जो, तृण-पत्र शय्या पर सोये

नरश्रेष्ठ हे राम ! प्रातः अब, सन्ध्यावन्दन करो जागकर
कहलाती सुपुत्र जननी है, कौशल्या तुम सा सुत पाकर

परम उदार वचन सुने जब, किया देव तर्पण, स्नान कर
परम जपनीय गायत्री का, करने लगे मंत्र जप वे फिर

नित्यकर्म समाप्त हुए जब, श्रीराम व वीर लक्ष्मण
कर प्रणाम तपोधन मुनि को, आगे जाने को थे उद्यत

जाते-जाते उन दोनों ने, किये पुण्य दर्शन हर्ष भर
त्रिपथगा नदी गंगा के, सरयू के शुभ संगम तट पर

संगम के निकट था स्थित, इक पवित्र आश्रम ऋषियों का
 हजार वर्षों से तप करते थे, शुद्ध था अंतः करण जिनका

हर्षित हुए थे दोनों भाई, पूछा मुनि से अति विनीत हो
कौन यहाँ रहता है मुनिवर ? जगी उत्सुकता अति प्रबल हो

हँसते हुए मुनि बोले तब, सुनो राम मैं परिचय देता
जिसे ‘काम’ कहते विद्वजन, पूर्व में वह मूर्तिमान था

इसी आश्रम में तप करते, स्थाणु शिव रहा करते थे
उठे समाधि से थे शिव, मरूद्गणों संग जा रहे थे

तभी किया आक्रमण उन पर, दुर्बुद्धि काम ने आकर
शिव ने तब हुन्कार भरी थी, रोषपूर्ण दृष्टि से लख कर  

 तब उस दुर्बुद्धि के सारे, जीर्ण-शीर्ण हो गिरे थे अंग
कहलाया प्रदेश वह ‘अंग’ तब, काम हुआ तब से अनंग

उन्हीं महादेव का आश्रम, मुनि जन ये शिष्य थे उनके
पाप नष्ट हुआ है इनका, धर्म परायण हैं सब ये

शुभदर्शन हे राम ! रात्रि को, यहीं विश्राम करेंगे हम
पुण्य सलिला सरिताओं को, कल प्रातः पार करेंगे हम

चलें इसी आश्रम में हम, होगा वास यहाँ उत्तम
जप-हवन कर सुख पूर्वक, रात्रि में करें विश्राम

वे संलग्न थे बातचीत में, उस आश्रम के मुनियों ने
जान लिया आगमन उनका, तप से मिली दूर दृष्टि से

हर्षित हुए आश्रम वासी, अर्ध्य पाद्य किया अर्पित
मुनि का स्वागत किया प्रेम से, राम लक्ष्मण को पूजित

भांति-भांति की कहीं कथायें, मनोरंजन भी किया था उनका
संध्या वन्दन, जप आदि कर, अतिथियों का सत्कार किया

उत्तम व्रत धारी मुनियों संग, शयन किया आश्रम में तब
सुखपूर्वक रात्रि बितायी, उस पुण्य स्थान में मिलकर  


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तेईसवां सर्ग पूरा हुआ.


Tuesday, July 23, 2013

मार्ग में उन्हें विश्वामित्र की बला-अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

द्वाविंशः सर्ग

राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना, मार्ग में उन्हें विश्वामित्र की बला-अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति 

जाकर दूर अयोध्या से कुछ, सरयू के दक्षिण तट पर
‘करो आचमन सरयू जल से’, कहे मुनि ने मधुर ये स्वर

ग्रहण करो इस मंत्र समूह को, ‘बला अतिबला’ जो कहलाये  
श्रम का अनुभव नहीं करोगे, ज्वर, विकार भी नहीं सताये

निद्रित या असावधान भी, राक्षस आक्रमण नहीं करेंगे
तुम बाहुबल में आगे सबसे, तुमसे बलशाली नहीं रहेंगे

तीनो लोकों में अति वीर, ज्ञानवान व चतुर बनोगे
भूख-प्यास का कष्ट न होगा, प्रश्न सभी के हल करोगे

कोई तुमसा नहीं रहेगा, ये विद्याएँ ज्ञान की जननी
अध्ययन इनका कर लेने पर, यश का ये विस्तार करेंगी

ब्रह्मा जी की हैं पुत्रियाँ, तेजस्विनी, अति समर्थ ये
तुममें सब उत्तम गुण हैं, तुम्हीं पात्र योग्य हो इनके

मैंने इनका किया है अर्जन, निसंशय निज तप के बल से
बहुरुपिणी होंगी तुम हित, फल प्रदान करें अनेक ये

हुए पवित्र कर राम आचमन, खिल उठा प्रसन्नता से मुख
ग्रहण की दोनों विद्याएँ, अंतःकरण था उनका शुद्द

सूर्य समान हुए शोभित, विद्या से होकर सम्पन्न
गुरुजनोचित सेवा करके, सुखमय रात्रि बिताई तट पर

योग्य नहीं जो राजपुत्र के, तृण की शय्या पर सोये
 स्नेह जताते थे दोनों से, विश्वामित्र मधुर वाणी से


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ.