Monday, February 14, 2011

मन की दुनिया अजब निराली

मन की दुनिया अजब निराली

भीतर कितने भेद छिपाए
बाहर रूप बदल कर आये,
द्वन्द्वों का शिकार हुआ जो
मन हाँ पागल मन कहलाये !

मन मतवाला हुआ डोलता
 स्वयं ही स्वयं के राज खोलता,
कभी प्रीत के गीत सुनाये
वाणी व्रज सी कभी बोलता !

जाने कहाँ कहाँ की बातें
रचता खुद घातें-प्रतिघातें,
स्वयं आहत हो मरहम धरता
स्वयं से करता नई मुलाकातें !

मन की दुनिया अजब निराली
अनजानी भी देखीभाली
मन के पार न जाने देती
भूलभुलैया उलझन वाली !

अनिता निहालानी
१४ फरवरी २०११  

6 comments:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  2. bahut khub........kya kahne hain...:)

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  3. सच में मन की बात निराली ही है -
    बहुत सुंदर रचना -

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  4. जाने कहाँ कहाँ की बातें
    रचता खुद घातें-प्रतिघातें,
    स्वयं आहत हो मरहम धरता
    स्वयं से करता नई मुलाकातें
    आपकी कविता पढ़कर लगता है जैसे हम इसे जी रहे हों !
    सच्चाई की इतनी सुन्दर और सरल अभिव्यक्ति !
    धन्यवाद

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  5. realy man ,man hi hota hai. man ke aankh hajar....bahut sundar rachana.

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  6. sach hai man bas aisahi hai sunder rachna........

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