Wednesday, July 3, 2019

निषादराज गुह का भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुर शीतितमः सर्गः
निषादराज गुह का अपने बन्धुओं को नदी की रक्षा करते हुए युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश दे भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिए अनुरोध करना 
गंगा तट पर ठहरी सेना, देख कहा निषाद राजा ने
है अपार सागर के समान, पार नहीं मिलता चिंतन से 

निश्चय ही दुर्बुद्धि भरत भी, संग आया इस सेना के
कोविदार चिह्नित पताका, फहराती उसके ही रथ पे

अपने मंत्रियों से यह पहले, वध हमारा करवाएगा
मुझे ज्ञात होता है ऐसा, फिर राम को मरवाएगा

राजलक्ष्मी दशरथ की यह, केवल स्वयं के लिए चाहता
श्रीराम को वन में मारने, इसीलिए यह वन में आया

किंतु राम सखा हैं मेरे, कामना उनके हित की रखो
हो सुसज्जित अस्त्र-शस्त्र से, गंगा तट पर मौजूद रहो

नदी की रक्षा करने हेतु, मल्लाह सभी रहें तट पर
रात आज की यहीं बिताएं, नौका पर रखे फल खाकर 

कुल पांच सौ नौकाएं हैं, एक-एक पर सौ जन बैठें
लैस हुए अस्त्रों-शस्त्रों से, प्रति पल सभी तैयार रहें

पुनः कहा निषादराजा ने, सेना भरत की पार लगेगी
यदि श्रीराम के प्रति भरत का, भाव हुआ संतोष जनक ही

ऐसा कहकर मिश्री, फल, मधु, ले गुह गये निकट भरत के
आते देख उसे सुमन्त्र ने, विनीत की भांति  शब्द  कहे

वृद्ध हुआ गुह संग परिजन के, यहाँ निवास किया करता
दंडकारण्य का मार्ग जानता, श्रीराम का यह है सखा

राम, लक्ष्मण कहाँ गये हैं, इसे ज्ञात है यह निश्चय ही
तुमसे आकर मिले दो अवसर, शीघ्र करो व्यवस्था इसकी

मिलने की अनुमति पाकर तब, गुह आया प्रसन्न चित्त से
बड़ी नम्रता से तब बोला, मिलकर राजकुमार भरत से

वन प्रदेश आपके लिए यह, घर में लगे बगीचे सा है
जो कुछ भी है पास हमारे, वन-जंगल सभी आपका है

रखा धोखे में हमें आपने, आने की नहीं दी सूचना
आपके स्वागत की तैयारी, कुछ भी तो हम कर पाए ना

सेवा में फल-मूल आपके, स्वयं निषाद तोड़ लाये हैं
कुछ सूखे, कुछ ताजे फल हैं, वन्य पदार्थ अन्य लाये हैं

आशा करते हैं आपकी, सेना रात यहीं ठहरेगी
दिया हुआ हमारा भोजन, आदि सहर्ष स्वीकार करेगी

नाना विध वस्तुओं से हम सब, सेना सहित सत्कार करें
प्रातः काल सैनिकों के संग,  यहाँ से आप प्रस्थान करें
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Thursday, June 27, 2019

भरत की वनयात्रा और श्रृंगवेरपुर में रात्रिवास


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


त्र्यशीतितमः सर्गः
भरत की वनयात्रा और श्रृंगवेरपुर में रात्रिवास

तत्पश्चात प्रातः होते ही, आरूढ़ हुए उत्तम रथ पर
चले श्रीराम के दर्शन हेतु, शीघ्रता पूर्वक भरत फिर

आगे-आगे सभी मंत्री, और पुरोहित बैठेे रथों पर
सूर्य देव के रथ जैसे वे, अति तेजस्वी थे और प्रखर

जो विधिपूर्वक गये सजाये, नौ हजार हाथी चलते थे
पीछे-पीछे दशरथ नन्दन के, साठ हजार रथ गये थे 

आयुध ले कई प्रकार के, वीर धनुर्धर योद्धा भी थे
एक लाख ही घुड़सवार भी, अनुसरण उनका करते थे

कैकेयी, सुमित्रा, कौसल्या, तीनों ने प्रस्थान किया
ब्राह्मण आदि सभी आर्यजन, हर्षित हो करते थे यात्रा

उतम व्रत के पालनकर्त्ता, स्थितप्रज्ञ, दुःख हरने वाले
कब श्रीराम का दर्शन होगा, आपस में कहे जाते थे

जैसे सूर्यदेव उदित हो, हर लेते हैं सभी अँधेरा
श्रीराम के सम्मुख आते, मिट जायेगा शोक हमारा

इस प्रकार चर्चा करते थे, हर्षित होकर सभी नागरिक
सम्मानित जन, व व्यापारी, मणिकार, कुम्भकार, मायूरक

रोचक, दंतकार, दरजी व, सुधाकार, गंधी, सोनार
बुनकर, वैद्य, धूपक, धोबी, गोपालक, केवट, मनिहार

सदाचारी कई वेदवेत्ता, था समाहित मन जिनका
बैल गाड़ियों पर चढ़कर, सब करते थे वन की यात्रा

शुद्ध वस्त्र किये थे धारण, अंगराग भी लाल लगाये
भरत के पीछे सभी जा रहे,  कई प्रकार के वाहन से

भातृवत्सल कैकेयी नंदन, भाई को लौटाने जाते
हर्ष और आनंद में भरी, सेना चलती पीछे-पीछे

रथ, पालकी, घोड़े, हाथी से, लंबा मार्ग तय कर पहुँचे 
श्रंगवेरपुर में आकर तब, गंगा जी के तट पर आये

राम सखा गुह निषादराज, भाई-बन्धु सहित रहता था
चक्रवाकों से अलंकृत वह, गंगा का तट अति सुंदर था

सेना ठहर गयी जब आकर, कहा भरत ने तब सचिवों से
आज रात्रि विश्राम यहाँ कर, कल हम गंगा पार करेंगे

जलांजलि दूँ महाराज को, इक यह भी है मेरा प्रयोजन
पारलौकिक कल्याण हो उनका, गंगाजी का हो पूजन

तथास्तु कहकर मंत्रियों ने, आज्ञा उनकी की स्वीकार
भिन्न-भिन्न स्थानों पर तत्क्षण, सब सैनिकों को दिया उतार

खेमे आदि हुए सुशोभित,उस तट पर महानदी गंगा के
श्रीराम का चिन्तन करते, वहीं रात्रि निवास किया भरत ने

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Friday, June 14, 2019

भरत का वन में चलने की तैयारी के निमित्त सबको आदेश देना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


द्व्यशीतितमः सर्गः

वसिष्ठ जी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिए आदेश देना तथा भरत का उसे अनुचित बताकर अस्वीकार करना और श्रीराम को लौटा लाने के लिए वन में चलने की तैयारी के निमित्त सबको आदेश देना

अपने उर में रखकर इसको, धर्मसंगत बात तब कहें
श्रेष्ठ गुणों में हैं श्रीराम, अवस्था में भी मुझसे बड़े

दिलीप और नहुष की भांति, हैं अति तेजस्वी भ्राता राम
महाराज दशरथ की भांति, है राज्य पर उनका अधिकार

पाप आचरण नीच ही करते, निश्चय ही नर्क ले जाता
राज्य राम का लेकर मैं भी, पापी व कलंकी कहलाता 

माँ का पाप मुझे नहीं भाता, इसीलिए यहाँ रहकर भी
दुर्गम वन में रहने वाले, श्रीराम को करता विनती

उनका ही अनुसरण करूंगा, नरश्रेष्ठ, राजा हैं वही
अवध ही नहीं तीन लोक के, राजा होने के योग्य वही

धर्मयुक्त वचन ये सुनकर, हर्ष के आँसूं बहे सभी के
श्रीराम में चित्त लगाकर, भरत को देखा बड़े प्रेम से

पुनः कहा भरत ने सब से, राम को यदि लौटा न पाऊँगा 
नरश्रेष्ठ लक्ष्मण की भांति, मैं भी वन में निवास करूँगा

आप सभी पूज्यों के सम्मुख, सद्गुणों से जो हैं युक्त 
पूर्ण चेष्टा मैं करूँगा, श्रीराम को लौटा लाने हित

मार्गशोधन में जो कुशल हैं, वेतन भोगी व अवैतनिक
पहले ही भेजा है उनको, अब हमारा भी जाना उचित

सभासदों से ऐसा कहकर, भातृवत्सल श्रेष्ठ भरत तब
मंत्रवेत्ता सुमन्त्र से बोले, आज्ञा पालन हो तुरंत अब

सबको वन जाने को कहिये, सेना को भी शीघ्र बुलाएं
बड़े हर्ष से तब सुमन्त्र ने, सबको यह आदेश सुनाये

श्रीराम को लौटा लाने, भरत और सेना जायेंगे
प्रसन्न हुए प्रजाजन यह सुन, सेनापति भी अति हर्षाये

घर-घर में स्त्रियाँ हो हर्षित, पतियों को करने लगीं प्रेरित
अश्व, गज, बैल गाड़ी, रथ, सभी जुतेंगे यात्रा के हित

सेना को उद्यत देखकर, अपने रथ को भी मंगवाया
बड़े वेग से गये सुमन्त्र, जुता हुआ उत्तम रथ आया

तब प्रतापी भरत ने कहा, कल ही सेना कूच करेगी
श्रीराम को लाना चाहता, कर प्रसन्न, जगत के हित ही 

उत्तम आज्ञा भरत की पा, सुमन्त्र ने आदेश सुनाया
घर-घर में सबने उठकर तब, हाथी घोड़ों को जुतवाया


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.