Wednesday, December 8, 2010

भावांजलि

युग-युग से तुम आते हो,
प्रतिदिन, प्रतिक्षण निज आहट से
उर आंगन को गुंजाते हो !
सुखमय दिवस, रात्रि दुखमय
स्पर्श तुम्हारा ही सहलाये,
चहुँ ओर संगीत तुम्हारा
गूंजे नित संदेशा लाए !

आज ही वह आने वाला है !
कोई कहकर गया कान में,
मीत वही, कह रही सुगंध
डोलें पात-पात पवन सँग
ऑंखें भी प्रतीक्षा में रत !

5 comments:

  1. बहुत ही संवेदनात्मक काव्य रचना

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  2. बहुत सुन्दर काव्य रचना| आभार!

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