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Wednesday, March 14, 2012

शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

पिछले वर्ष अक्तूबर की २३ तारीख को मैंने यह श्रृखला आरम्भ की थी. आज १४ मार्च २०१२ को इसका अंतिम भाग प्रस्तुत कर रही हूँ. आप सभी का सहयोग मिला और यह कार्य सम्पन्न हुआ. आगे भी इसी तरह का कार्य करने की इच्छा है आपमें से कोई सुझाव दें तो स्वागत है.

 श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


उपसंहार
शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

बंधन, मुक्ति हैं माया में, नहीं आत्मा में हो सकते
सर्प का होना या न होना, भ्रम है क्रिया हीन रज्जु में

बंधन है अज्ञान के कारण, दूर हुआ तो मुक्ति घटती
ब्रह्म को कैसे ढके आवरण, द्वैत नहीं मानती श्रुति

सूर्य को ढका हम कहते, चाहे मेघ ढके आँखों को
ब्रह्म को न ढक सकता कोई, बुद्धि के ही गुण हैं दोनों

ब्रह्म सदा एक अविनाशी, होना, न होना न उसमें
बुद्धि में ही भाव, अभाव, बंध, मोक्ष कल्पित माया में  

निर्मल, शांत, निरंजन, है वह, नभ जैसा विस्तीर्ण विशाल
निरवयव, निष्क्रिय ब्रह्म में, कैसे हो कल्पना जाल

नहीं नाश होता है उसका, ना मृत्यु ही संभव है
न कोई साधक न मुमुक्षु, सदा आत्मा मुक्त ही है

दोष रहित, हे तृष्णा शून्य, तुझे पुत्र समान ही जान
गुह्य ज्ञान कहा है मैंने, सकल शास्त्र का अनुपम सार

शिष्य की विदा

किया शिष्य ने नमन गुरु को, मुक्त हुआ किया प्रस्थान
आनंद मग्न हुए गुरुवर भी, धरती पर फिर करें विहान

आत्मज्ञान का यह निरूपण, कहा गया साधक के हित में
बोध करें सुगमता से वह, पढ़ संवाद गुरु-शिष्य में

शास्त्र श्रवण से हुए शुद्ध जो, शांत चित्त, मुमुक्षु जन
 हितकारी उपदेश को पढ़कर, करें ज्ञान का समुचित आदर

जग के पथ में दाह बहुत है, हैं दुःख रूपी सूर्य की किरणें
जल की इच्छा से भ्रमते हैं, मरुथल में जन थके-थके से

अति निकट ही ब्रह्म सिंधु है, जिसमें भरा है अमृत सा जल
शंकराचार्य की मोक्ष प्रदायिनी, वाणी देती है अद्भुत फल   

इति

Monday, March 12, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

नट जैसे पुरुष ही रहता, स्वांग करे या रहे अयुक्त
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है, उपाधि युक्त हो या हो मुक्त

जहाँ-तहाँ ज्यों पत्र गिरे हों, सूखे हुए किसी वृक्ष के
उसका तन भी दग्ध हुआ है, चाहे गिरे किसी स्थल पे

वृक्ष का सूखा पत्ता चाहे, कहीं भी गिरे न पड़ता अंतर
नाली, नदी, शिवालय में या, गिरे किसी चबूतरे पर

सत्स्वरूप में हुआ वह स्थित, देह भाव से मुक्त हुआ वह  
कहीं भी त्यागे देह, न अंतर,  देशकाल न देखे वह

हृदय की अविद्या ग्रंथि, जिसकी नष्ट हुई वह मुक्त
देह त्याग नहीं है मोक्ष, रहता वह आनंद से युक्त

वृक्ष के पत्ते, पुष्प, डाल सम, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ मिटते
आनंद रूप आत्मा अमर है, उसे न देखा किसी ने मरते

आत्मा का लक्षण प्रज्ञानघन, उसकी सत्यता को बतलाता
अविनाशी है यह आत्मा, उपाधि का ही नाश है होता

जैसे अन्न अग्नि बन जाता, जब अग्नि में उसे डालते
देह आदि भी ज्ञानाग्नि में, भस्म हुए परम हो जाते

सूर्य उदित होने पर जैसे, अंधकार का नाश हो जाता
ज्ञान हुए से दृश्य प्रपंच, ब्रह्म में ही लीन हो जाता

घट के नाश हुए से जैसे, घटाकाश, महाकाश बनता
लय होता जब उपाधि का, ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हो जाता

एक हुआ दूध मिल दूध, तेल, तेल से मिलकर एक
आत्मा में मिल ज्ञानी आत्मा, जल, जल से मिलकर हो एक

एक अखंड सत्ता शेष हो, वही विदेह-कैवल्य कहलाता
ब्रह्म भाव को प्राप्त हुआ जो, भव बंधन से मुक्त हो जाता

ब्रह्म-आत्मा के ऐक्य से, दग्ध हुए अज्ञान, अविद्या
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हुआ फिर, जन्म न फिर होता है उसका 

Monday, March 5, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)
चैतन्य ही वस्त्र है उसका, सहज हुआ डोला करता
सर्वात्म भाव से हो स्थित, आत्मतुष्ट रहा करता

कहीं मूढ़, कहीं विद्वान, कहीं ठाठबाट से रहता
कहीं भ्रांत, कहीं शांत, निश्चल कहीं पड़ा रहता

सम्मानित हो या अपमानित, उसे भेद न पड़ता कोई
कहीं ज्ञात कहीं अज्ञात, सदा संतुष्ट रहे ज्ञानी

नित्य तृप्त, महा बलवान, समदर्शी ही वह कहलाता
सब कुछ करता हुआ अकर्ता, फल भोगे पर रहे अभोक्ता

देह होने पर हुआ विदेही, सर्वव्यापी होकर परिछिन्न
प्रिय अप्रिय नहीं है कोई, शुभ अशुभ न कोई दिन

देह अभिमानी को ही छूते, सुख-दुःख अथवा शुभ-अशुभ
देह पृथक है जो यह जाने, उसे न छूता कोई फल

तथ्य नहीं जानते जो जन, रवि को राहू ग्रस्त मानते
देह से परे हुए ज्ञानी को, अज्ञानी जन नहीं जानते

मुक्त पुरुष का देह आभासी, जैसे केंचुल सर्प की होती
प्राण वायु से हो संचालित, उसमें आसक्ति नहीं रहती

फल की वह चिंता न करता, आत्मस्वरूप में स्थित रहता
श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताओं में वह, शिव स्वरूप ही कहलाता

नहीं अभाव है उसको कोई, न ही ज्ञान शून्य सुप्त सम
जीवित है तो मुक्त सदा है, मर कर ब्रह्म में होता लीन





Thursday, March 1, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते रहे स्वयं में
आत्मा में ही रमा करे वह, चाहे हो किसी दशा में

जिसने आत्मस्वरूप को जाना, आत्मतत्व की सिद्धि करता
देश काल से परे हुआ वह, नियम, लक्ष्य सब कुछ ही तजता

‘यह घट है’ इसको जो जाने, किस नियम की उसे अपेक्षा
मैं ब्रह्म हूँ, इस ज्ञान को, ज्ञानी जन स्वयं ही कहता

जगत प्रकाशित है सूर्य से, असत् पदार्थ भासते सत् से
उस सत् को कौन प्रकाशे, सत् प्रकाशित होता स्वयं से

वेद, शास्त्र, प्रमाण व प्राणी, अर्थवान हैं जिस परम से
कौन प्रकाशित करेगा उसको, परम प्रकाशित है स्वयं से

स्वयंप्रकाश, अनंत शक्ति, अप्रमेय, अनुभव स्वरूप यह
जान इसे ही मुक्त हुआ, ज्ञानी जन हुआ है धन्य

विषय प्राप्त होते हैं उसको, सुखी-दुखी न होता ज्ञानी
न आसक्त न हुआ विरक्त, स्वयं में ही रस पाता ज्ञानी

आत्मा के आनंद का रस पा, वह स्वयं में ही क्रीड़ा करता
ममता, अहं से मुक्त हुआ वह, निज स्वरूप में ही रमता

जैसे बालक मग्न हुआ सा, खेल में ही लगा रहता
भूख और नींद को भुला के, खिलौने से तृप्त हो रहता

चिंता व दीनता छूटी, मुक्त हुआ सा वह विचरे
अभय हुए वह घूमे वन-वन, सारा जग अपना माने

दिशा वस्त्र है, धरा बिछौना, परब्रह्म में क्रीड़ा करता
सदा सुखी हो तृप्त हुए वह, मुक्त जगत में घूमा करता

बालवत् हुआ वह ज्ञानी, देह का मात्र आश्रय लेता
आसक्ति न रहती उसमें, चिह्न न कोई प्रकट करता 

Tuesday, February 21, 2012

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)

श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)

है सबका आधार वही, वही प्रकाशक है सबका
सर्वरूप व सर्व व्याप्त वह, नित्य, शुद्ध, अद्वैत आत्मा

भेद रहित, अंतर आत्मा, अदृश्यमान है अनंत
आनंद स्वरूप निर्विकल्प, वही एक हूँ परम ब्रह्म

क्रिया रहित, विकार रहित हूँ, निराकार, निरालम्ब
हूँ अद्वितीय, आत्मा सबका, ज्ञान स्वरूप, आनंद रूप

हे सदगुरु, मैंने पाया है, कृपा आपकी है मुझपर
बारम्बार नमन है तुमको, ज्ञान की है महिमा अनुपम

माया में मैं भटक रहा था, जन्म-मृत्यु, जरा के भय से
मेरी रक्षा की आपने, जगा दिया है गहन नींद से  

हे सदगुरु, नमन है तुमको, सत स्वरूप तुम तेजवान हो
विश्व रूप हो व्याप रहे हो, परम पूज्य तुम ज्ञानवान हो      


Monday, February 6, 2012

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)


सदा एकरस और निरवयव, एक रूप मैं घनीभूत हूँ
कैसे हो प्रवृत्ति मुझमें, निवृत्ति से भी अशेष हूँ

इंद्रिय, चित्त, विकार नहीं हैं, निराकार आनंद स्वरूप
पाप-पुण्य से रहित सदा मैं, श्रुति भी कहे बोध स्वरूप

उष्ण-शीत या भली-बुरी हो, वस्तु कोई छाया को छू ले
व्यक्ति को न छू सकती है, ज्यों प्रकाश को कुछ न छुए

देह के धर्म न छू सकते हैं, देह से परे आत्मा को
निर्विकार, उदासीन जो, क्या छुए परमात्मा को

सूर्य साक्षी सब कर्मों का, अग्नि साक्षी है ज्वलन की
रज्जु से ज्यों सँग सर्प का, आत्मा साक्षी है विषयों की

न मैं कर्ता, न ही कराता, न भोक्ता न भुगतवाता
न ही देखता, न दिखलाता, हूँ विलक्षण साक्षी आत्मा

चंचल जल में बिम्ब भी चंचल, सूर्य किन्तु अचल है नभ में
सूर्य समान आत्मा निश्चल, चित्त ही चंचल होता देह में

घट से ज्यों अलिप्त आकाश, देह से भिन्न आत्मा है
बुद्धि का ही खेल है सारा, प्रकृति से अतीत आत्मा  

प्रकृति में विकार हजारों, क्या संबंध आत्मा का है
मेघ न छू सकते हैं नभ को, बस आभास दृष्टि का है

अव्यक्त से स्थूल भूत तक, जिसमें यह आभास मात्र है
आदि-अंत से रहित सूक्ष्म यह, परम ब्रह्म आत्मा है 

Wednesday, January 25, 2012

आत्मानुभव का उपदेश


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

आत्मानुभव का उपदेश

बंधन, मोक्ष, तृप्ति और चिंता, स्वयं ही जाने जाते हैं
स्वास्थ्य लाभ या भूख लगी हो, दूजे अनुमान लगाते हैं

श्रुति सम गुरु भी बोध कराते, ब्रह्म का केवल शब्द ज्ञान से
स्वयं को ही अनुभव करना है, प्रभु कृपा से दिव्य भान से

निज अनुभव जब हो जाता है, सिद्ध हुआ साधक हो हर्षित
निर्विकल्प हुआ वह साधक, रहे आत्मा में ही स्थित

जीव और जगत सारा यह, ब्रह्म ही है कुछ और नहीं
अद्वितीय उस ब्रह्म में रहना, मोक्ष यही कुछ और नहीं

बोधोपल्ब्धि  

गुरु के शब्द सुने शिष्य ने, चित्त और इन्द्रियाँ हुईं शांत
आत्मस्वरूप में टिक जाता वह, निश्चल वृत्ति से हो स्थित

परब्रह्म में चित्त समाहित, परमानंद को पाकर हर्षित
बुद्धि खो गयी ज्ञान को पाकर, कहने लगा शिष्य हो चकित

विषयों में न रस कोई है, न यह और न वह मैं मानूँ
कैसा और कहाँ से आया, परम हर्ष यह कैसे जानूँ

जैसे ओला गल जाता है, सागर की जल राशि में
वैसे ही है लीन हुआ, मन आनंद सिंधु अंश में

Wednesday, January 18, 2012

प्रारब्ध विचार


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


प्रारब्ध विचार

आत्म चिंतन में जो रत है, जग उसको यदि भासित होता
फल भोग भी यदि वह पाए, प्रारब्ध ही वह कहलाता

जब तक सुख-दुःख अनुभव होते, प्रारब्ध तब तक माना जाता
क्रिया हुए से ही फल मिलता, कर्म बिना कोई फल न पाता

जग जाने पर स्वप्न टूटता, स्वप्न, कर्म लीन हो जाते
बोध हुआ जब निज स्वरूप का, संचित कर्म नष्ट हो जाते

सपने में जो पाप-पुण्य हों, जग कर उनका फल न मिलता
जो स्वयं को असंग जानता, लिप्त नहीं कर्मों से होता

जैसे घट में मदिरा भी हो, घटाकाश अछूता उससे
है उपाधि ऊपर ऊपर ही, नहीं आत्मा लिप्त हो उससे

कर से छूटा हुआ बाण ज्यों, लक्ष्य भेद कर ही रहता
ज्ञान पूर्व किया कर्म जो, अपना फल लाकर ही रहता

प्रारब्ध बड़ा बलवान सभी का, उसे भोगना ही पड़ता
संचित और क्रियमाण का, ज्ञानी नाश किया करता

जो सदा ब्रह्म में स्थित, प्रारब्ध उसको नहीं सताता
जाग्रत भाव में सदा रहे जो, अहं, मम से मुक्त हो जाता

न तो मिथ्या सिद्ध करे वह, न ही संग्रह में है रूचि
फिर भी यदि प्रवृत्ति में रत, निद्रा अभी टूटी ही नहीं

   





 

Sunday, January 15, 2012

जीवन्मुक्त के लक्षण (शेषभाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

जीवन्मुक्त के लक्षण (शेषभाग)

ममता नहीं देह आदि में, सहज भाव से कर्म वह करता
 उदासीनवत् जग में विचरे, जीवन्मुक्त वही कहलाता

ब्रह्म आत्मा के ऐक्य को, श्रुति प्रमाण से जिसने जाना
जग बंधन से मुक्त हुआ वह, जीवन मुक्त उसी को माना

देह ‘मैं’ ‘यह’ जगत शेष है, ऐसा भाव न जिसमें रहता
आत्म भाव में हुआ मग्न जो, जीवन मुक्त कहा जाता

जिसकी प्रज्ञा प्रखर हुई है, ब्रह्म जगत में भेद न जाने
स्वयं भी ब्रह्म से एक हुआ जो, जीवन मुक्त उसी को माने

साधु पुरुष से पा सम्मान, दुष्टों से पाकर अपमान
जिसका चित्त एक सा रहता, जीवन मुक्त उसी को जान

सागर में कोई क्षोभ न होता, जब नदियाँ उसमें आ मिलतीं
सारे विषय समाते उसमें, चित्त में समता फिर भी रहती

ब्रह्म तत्व को जिसने जाना, जग की नहीं आस्था उसको
यदि आस्था शेष किसी में, ज्ञान नहीं सधा उसको

पूर्व वासना के कारण भी, यदि माने आस्था जग में
संभव नहीं कभी होता यह, क्षीण वासना, ज्ञान करे

काम वृत्ति कुंठित हो जाती, अतिकामी की माँ के सम्मुख
ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त हुआ जो, होगा जग वासना से विमुख



Monday, January 2, 2012

प्रपञ्च का बाध


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


प्रपञ्च का बाध

आत्मा में जो भी आरोपित, हर कल्पना का करे निरास
स्वयं अद्वितीय, अक्रिय पूर्ण, परब्रह्म सा करे विलास

मन जब स्थिर हुआ स्वयं में, निर्विकल्प ब्रह्म ही रहता
दृश्य, विकल्प खो जाता सब, कहने मात्र को ही रह जाता

एक ही तत्व ब्रह्म है केवल, जग मिथ्या कल्पना मात्र
निर्विकार है निराकर जो, भेद नहीं होता तब ज्ञात

द्रष्टा, दृश्य, दर्शन से शून्य, निर्विकार बस एक तत्व है
भेद नहीं जब उसमें संभव, कैसे जग का पृथक अस्तित्त्व है

प्रलयकाल का सागर हो ज्यों, कुछ भी शेष नहीं रहता
उसी एक में सब खो जाता, जगत ब्रह्म में लीन हो जाता

ज्यों प्रकाश में लीन हुआ तम, भ्रम लीन होता ज्ञान में
वह अद्वितीय, निर्विशेष तत्व, भेद सभी खो जाते उसमें

एकात्मक अद्वितीय तत्व है, भेद भला क्योंकर होता
सुख-स्वरूप सुषुप्ति में ज्यों, कोई भेद नहीं रहता

परमतत्व का बोध हुआ तो, विश्व कहीं खो जाता है
रज्जु सर्प में ज्यों खो जाती, जल मरीचिका में खो जाता

श्रुति का भी तो यही कथन है, द्वैत है केवल मिथ्या माया
एक ही अद्वैत तत्व है, भ्रम से ही जग जिसमें पाया

Wednesday, December 28, 2011

आत्म दृष्टि(शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

आत्म दृष्टि

ज्यों फेन, तरंग, बुलबुले, आदि स्वरूप से जल ही हैं
देह से अहंकार तक जग यह, एक शुद्ध आत्मा ही है

ज्यों घट, कलश, कुम्भ सब मिट्टी, सत् से ही है सारी सत्ता
माया से भेद दिखता है, आत्मनिष्ठ को सत् ही दिखता

ज्ञानी एक ही देख रहा है, अद्वैत में उसकी निष्ठा
भ्रम से द्वैत जगत में है, ‘मैं’ ‘तू’ का यह झगड़ा दिखता

परब्रह्म है आकाश सा निर्मल, निर्विकल्प, निस्सीम, अटल
निर्विकार, शून्य, अनन्य, परे ज्ञान से है निश्चल

है अद्वितीय, विस्तृत सब ओर, जीव रूप से वही हुआ है
ब्रह्म भाव आनंद रूप में, त्याग विषय वह ब्रह्म हुआ है

नहीं देह, न मन बुद्धि हो, ब्रह्म स्वरूप में निश्चय दृढ़ हो
शुद्ध आत्म स्वरूप को पाकर, सब दुखों से मुक्त रहो