Wednesday, February 9, 2011

कोटि नमन निज सु-मन, सुमति को


कोटि नमन निज सु-मन, सुमति को

नमन धरा को और गगन को
नमन नीर को और पवन को,
नमन सर्वदा पूत अगन को
कोटि नमन निज सुमन, सुमति को !

शत-शत नमन संत जनों को
ऋषियों, मुनियों की वाणी को,
नमन अनंत तुम्हें हो सदगुरु
जिसने नमन सिखाया हमको !

जिन पितरों के हुए वंशधर
 उनको शत-शत बार नमन,
मातृदेव भव, पितृदेव भव
उनसे ही पाया है जीवन !

नमन सूर्य को नमन धरा को
हो नमन सभी दिक्पालों को,
साक्षी हों सम्पूर्ण दिशाएं
सादर नमन परम ब्रह्म को !

अनिता निहालानी
९ फरवरी २०११      

Monday, February 7, 2011

मुक्ति की कामना

मुक्ति की कामना

किसे नहीं है कामना मुक्ति की
जड़ –चेतन सभी तो हैं
उस पथ के राही !

बंधें हैं, तोडना चाहते बंधन
एक-दूजे से दूर भागते नक्षत्र
फ़ैल रहा है ब्रह्माण्ड !

अनंत की चाह है आकाशगंगाओं को
भी उतनी ही, जितनी
एक मानवीय आत्मा को !

अनिता निहालानी
७ फरवरी २०११

Saturday, February 5, 2011

पावन गोपियों के प्रेम सम


पावन गोपियों के प्रेम सम

मन खाली है
क्या बोले !
मन खाली है
क्यों बोले !

हम जो न माटी थे न आकाश
उलझे रहे पंचभूतों के जाल में
शिकार हुए द्वन्द्वों के,
औरों को किया !

हम जो हैं शुद्ध, बुद्ध, निर्मल
सुखातीत, दुखातीत
धवल हिम शखिर से अमल
पावन गोपियों के प्रेम सम !

अनिता निहलानी
५ फरवरी २०११

Friday, February 4, 2011

नृत्य करती है आत्मा


नृत्य करती है आत्मा

कृष्ण की वंशी बजी
थिरक उठीं थी गोपियाँ,
तुम्हारे भीतर से फूटता है संगीत
तो नृत्य करती है आत्मा !

जब जगाया प्रज्ञा को
जड़ता से मुक्त किया
दिशाहीन सा था जो जीवन
दिशाबोध उसे दिया !

इधर-उधर बिखरा मन
समेटा, सहेजा, संवारा उसे
कण-कण में व्याप्त
चैतन्य से मिला निखारा उसे !

अनिता निहालानी
४ फरवरी २०११


Wednesday, February 2, 2011

जीवन सूत्र

जीवन सूत्र

शरणागत हो जाओ,
गूंज उठती है जब तब कानों में यह ध्वनि
लक्ष्य हो सम्मुख, पथ भी अजाना नहीं
फिर भी जब कदम न बढ़ें
तो शरण में आ जाओ !

अभयदान देती है वाणी
जब माना कि हममें सामर्थ्य नहीं
तुमने सूत्र दिया
खाली हो जाओ !
मन जो भरा है
खाली कर दो
ध्यान में कुछ करना नहीं
बस हो रहो !

जगत बनेगा क्रीड़ास्थल
घर सहज अंतर्मन निश्छल
जगे जब भीतर देवत्व
मिलेगी सत्य की राह अटल !

अनिता निहालानी
३ फरवरी २०११


Tuesday, February 1, 2011

बने तेरा मधुबन, ओ कान्हा ! हमारा मन



बने तेरा मधुबन, ओ कान्हा ! हमारा मन

सद्भावों की लताओं पर उगें शांति पुष्प
 झर सम सहज अश्रु हों तुझी को अर्पण !

प्रेम जलधार बहे उड़े उमंग की फुहार
स्नेह सुवास भरे चले शीतल बयार !

अंतर की पुलक शुभ्र माल बन सजे
श्रद्धा, ज्ञान, निष्ठा के दीप जल उठें

दोष कंटक बीन सुख शिला पर हो अर्चन
शुभ संकल्पों से आरती श्वासों से वन्दन

बने तेरा मधुबन, ओ कान्हा ! हमारा मन

अनिता निहालानी
२ फरवरी २०११


शांति सुमन

शांति सुमन

लाखों हृदयों में बोये क्रिया बीज
बिखेरी ज्ञान की खाद,
अमिय सम सत्संग के जल से
किया सिंचन, हे सदगुरु

.....और फिर फूटे अंकुर
पनपने लगे प्रेम वृक्ष
अखिल विश्व में महकते
शांति सुमन !

शांति जो अपरिहार्य है
सुख हेतु, विकास हेतु
शांति में ही होता
सम्यक सृजन !

आज समवेत स्वरों में
गुंजित हैं शांति गान
सिखाते धर्म का मर्म
बन प्रेम किरण, हे सदगुरु !

अनिता निहालानी
१ फरवरी २०११