Wednesday, July 22, 2026

श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

त्रिंश: सर्ग:


श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना, श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा 


खर की गदा राम ने काटी, मुस्का कर यह कटु वचन कहे 

 मात्र यही तेरा सारा बल, क्यों व्यर्थ डींग मारता फिरे ?


शक्तिहीन है तू मुझसे अति, पूर्ण सिद्ध हो गया इसी क्षण 

भू पर गदा पड़ी है तेरी, कर तेरी बातों का खंडन 


तूने कहा, मेरा वध कर , राक्षसों के आँसू पोछेगा 

झूठ हुआ वचन वह तेरा, क्षुद्र स्वभाव कैसे छोड़ेगा 


हर लूँगा तेरे प्राणों को, जैसे अमृत हर लिया गरुड़ ने 

शीश काट डालूँगा तेरा, कर विदीर्ण शरीर को तेरे 


धूल से धूसर होंगे अंग, दो बाँहें भी कट जायेंगी 

फेन और बुदबुदों से युक्त, लहू का भूमि पान करेगी 


राक्षस कुलों का कलंक तू, महानिद्रा में सो जाएगा 

दंडक वन हो पुनः सुरक्षित, मुनियों का घर बन जाएगा 


जनस्थान में निर्मित तेरे, निवास-स्थान नष्ट होंगे अब 

निर्भय होकर विचरेंगे मुनि, इस अरण्य में नि:शंक होकर 


जो अब तक कारण बनीं भय का, राक्षसियाँ भाग जायेंगी 

जिनका स्वामी तुझ जैसा है, आतुर होकर शोक करेंगी 


क्रूर स्वभाव किया है धारण, क्षुद्र विचार ह्रदय में धरता 

कंटक तू ब्राह्मणों के हित, शंकित सदा उनका मन रहता 


श्रीराम कह रहे थे जब यह,  क्रुद्ध हुआ बोला तब खर भी 

निश्चय ही तुम बहुत घमंडी,  हो निर्भय, भय होने पर भी


 हो गये हो मृत्यु के अधीन, ऐसा मुझे जान पड़ता है 

 इसी कारण तुमको भान नहीं है, कब क्या कहना उचित है 


पड़े काल के फंदे में जो, उसकी इंद्रियाँ व्यर्थ हो जातीं 

कर्त्तव्य का भान न रहता, व्यर्थ कामों में वे लग जातीं 


ऐसा कहकर उस राक्षस ने, भौहें टेढ़ी कर के देखा 

लख रणभूमि में चारों ओर, साखू का इक वृक्ष उखाड़ा 


विकट गर्जना करके उसने, श्रीराम पर उसे दे मारा 

श्रीराम ने बाणों से ही, उस पादप को अधर में काटा 


खर को मार डालने हेतु तब, राम ने अति क्रोध दिखाया 

स्वेद आ गया उनके तन में, रक्त वर्ण आँखों में प्रकटा


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