श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
अष्टाविंश: सर्ग:
खर के साथ श्रीराम का घोर युद्ध
त्रिशिरा व दूषण मारे गये, खर को इससे भय हो आया
श्रीराम का देख पराक्रम, भीतर-भीतर बहुत घबराया
एक अकेले श्रीराम ने, राक्षस सेना का वध कर डाला
दूषण,त्रिशिरा के साथ ही, सेना प्रमुखों को मार गिराया
इसके बारे में सोच-सोच, खर अत्यंत उदास हो गया
ज्यों नमुचि ने किया इंद्र पर, आक्रमण वैसा राम पर किया
एक प्रबल धनुष खींचकर, कई नाराच चलाये उनपर
विषधर सर्पों के समान थे, मारे उसने रोष में भरकर
वह प्रत्यंचा हिला रहा था, कई अस्त्रों का कर प्रदर्शन
रथारूढ़ खर दिखा पैंतरे, युद्ध क्षेत्र में करता विचरण
सभी दिशाएँ ढक दीं उसने, कई तीक्ष्ण कठोर बाणों से
देख उसे श्रीराम ने नभ, आच्छादित कर दिया तीरों से
दोनों के पैने बाणों से, अवकाश रहित हुआ आकाश
रवि देव भी पीछे छिप गये, नहीं प्रकट होता था प्रकाश
नाराच, नालीक, विकर्णि, तीखी नोकों वाले तीरों से
खर ने प्रहार किया राम पर, मानो गज मारे अंकुश से
रथ में स्थिर बैठा हुआ राक्षस, पाशधारी यम लगता था
महाबलशाली श्रीराम को, उसने थका हुआ समझा था
यद्यपि सिंह समान चलता, तो भी राम न उद्गविन होते
जैसे छोटे मृग को देखें, सिंह कभी भयभीत न होते
तत्पश्चात ज्यों कोई पतंगा, निकट आग के चला गया
खर अपने विशाल रथ पर चढ़, श्रीरामचन्द्र के निकट गया
जाकर वहाँ दिखाकर फुर्ती, धनुष श्रीराम का काट दिया
उनके मर्मस्थल में वज्र सम, सात बाणों से वार किया
उसके बाद बलशाली राम को, पीड़ित किया गर्जना की
खर के छोड़े हुए बाणों से, गिरा टूट उनका कवच भी
खर के बाण धँसे तन में, वे अग्नि समान शोभित होते थे
धावा बोला राम ने खर पर, अगस्त्यमुनि के दिये धनुष से
स्वर्ण पंख लगे हुए जिनमें, झुकी हुई गाँठों वाले थे
खर की ध्वजा राम ने काटी, भरे क्रोध में उन बाणों से
दर्शनीय सुवर्णमयी ध्वज, कई टुकड़ों में गिरा भूमि पर
क्रोधित खर ने मारे कई बाण, श्रीराम के वक्ष स्थल पर
जैसे किसी महावत ने गज पर, तोमर से प्रहार किया हो
श्री राम का तन घायल था, तत्पर हुए वह अति क्रोधित हो
छह बाण चलाये उन्होंने, एक लगा उसके मस्तक पर
दो बाण भुजाओं में लगे, तीन लगे उसकी छाती पर
उसके बाद क्रोधित होकर फिर, छोड़े तेरह तीखे बाण
काटा जुआ उसके रथ का, लिए सारथि व घोड़े के प्राण
खंडित हुआ धनुष उसका, राम के छोड़े हुए बाणों से
कूदा, खड़ा हो गया धरती पर, गदा हाथ में लिए हुए
हर्षित हुए देवता व महर्षि, देख रहे बैठ विमान पर
वीर श्रीराम के उस कर्म की, भूरि-भूरि प्रशंसा की तब
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।
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