Thursday, April 7, 2011

इस जग का खालीपन भर दें

इस जग का खालीपन भर दें

जाने कितने कोष छुपाये हम थक जाते
खो जाये ना, इस भय से मुस्कान छिपाते !
क्यों न मन को खाली कर दें
इस जग का खालीपन भर दें !
खोल झरोखों को अन्तर के
नया उजाला उनमें भर दें !

अनगिन निधियां छिपी हुई हैं मानव मन में
अंधियारों में बीज ढके हैं मानस भू में !
क्यों न स्वयं को हल्का कर दें
सारी निधियां यही लुटा दें
धूप, हवा, जल के छीटों से
क्यों न उनमें फूल खिला दें !

इक पावन सी पहले भीतर जगह बना लें
अपने हिस्से की खुशियाँ फिर जग से ले लें !
बस थोड़ा सा उद्यम करके
पल-पल मन को चेतन रख के
कुछ न कुछ इस जग को देके
हम रह सकते कमल सरीखे !

अनिता निहालानी
७ अप्रैल २०११   

8 comments:

  1. जाने कितने कोष छुपाये हम थक जाते
    खो जाये ना, इस भय से मुस्कान छिपाते !
    क्यों न मन को खाली कर दें
    इस जग का खालीपन भर दें !

    बहुत गहन सकारात्मक सोच..बहुत प्रेरणादायक सुन्दर अभिव्यक्ति...आभार

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  2. बस थोड़ा सा उद्यम करके
    पल-पल मन को चेतन रख के
    कुछ न कुछ इस जग को देके
    हम रह सकते कमल सरीखे !मन को चेतन रखने की कला ही तो सीखनी है.
    एक प्रेमभरी कविता.

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  3. बहुत खूब !शुभकामनायें आपको !!

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  4. बस थोड़ा सा उद्यम करके
    पल-पल मन को चेतन रख के
    कुछ न कुछ इस जग को देके
    हम रह सकते कमल सरीखे

    बहुत सुन्दर गीत ...

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  5. कुछ न कुछ इस जग को देके
    हम रह सकते कमल सरीखे
    शुभकामनायें .....

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  6. अनीता जी ,
    आपकी रचनायें मुझे अपने बहुत करीब लगती हैं.. खुशकिस्मत हूँ जो आपका ब्लॉग मिला मुझे ...


    बस थोड़ा सा उद्यम करके
    पल-पल मन को चेतन रख के
    कुछ न कुछ इस जग को देके
    हम रह सकते कमल सरीखे !

    बहुत सुन्दर ....

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