व्यर्थ ही हम बोझिल हो फिरते
तुच्छ कामना से इस मन की
सुंदर जग को आहत करते,
ज्योतिर्मय को हो समर्पित
क्यों नही निर्भार रहते ?
जिसका न कोई संगी साथी
उसका है वह जगन्नाथ,
निर्बल का बल, नाथ दीन का
सरल चित्त का भोलानाथ !
श्रम सीकर भूमि भिगोते
श्रमिकों का बलिदान जहाँ,
हरि वहीं ग्वालों सँग फिरते
कृषकों ने बोया धान जहाँ !
तुच्छ कामना से इस मन की
सुंदर जग को आहत करते,
ज्योतिर्मय को हो समर्पित
क्यों नही निर्भार रहते ?
जिसका न कोई संगी साथी
उसका है वह जगन्नाथ,
निर्बल का बल, नाथ दीन का
सरल चित्त का भोलानाथ !
श्रम सीकर भूमि भिगोते
श्रमिकों का बलिदान जहाँ,
हरि वहीं ग्वालों सँग फिरते
कृषकों ने बोया धान जहाँ !
nice blog!
ReplyDeletenice renderings!!!