Saturday, October 9, 2010

कण-कण में संगीत तुम्हारा गूंजा करता
नभ धरती को अद्भुत स्वरलहरी में बांधे
युगों-युगों से स्वर सरिता अम्बर में बहती
ऐसा वर दो प्रभु ! गाऊं मैं भी उस स्वर में


तुम तन में, तुम ही तो मन में, बसे हुए
तन-मन पावन कर, तुम्हें रिझाना है
तुम्हीं भाव हो, ज्ञान स्वरूप तुम्हीं
भेद तुम्हारी शक्ति का कर्म से पाना है


आज समर्पित होने दो व्याकुल अंतर
यह क्षण शायद लौट के फिर से ना आये
रह जाने दो जग को, जग के व्यापारों को
उर मेरा गीत समर्पण का अब तो गाये

5 comments:

  1. bhaavanuwad sundar ban pada hai ... blog bhi achchha hai .

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया!

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  3. तुम तन में, तुम ही तो मन में, बसे हुए
    तन-मन पावन कर, तुम्हें रिझाना है
    तुम्हीं भाव हो, ज्ञान स्वरूप तुम्हीं
    भेद तुम्हारी शक्ति का कर्म से पाना हैbahut hi sunder bhav liye prabhu bhakti ko darshati bhavmai rachanaa.badhaai sweekaren.


    please visit my blog.thanks.

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  4. बहुत सुंदर....

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