श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि
नानात्व विचार
अनादि, अनंत, अप्रमेय, है सर्वत्र एक ही ब्रह्म
नानात्व नहीं कहीं उसमें, है अविकारी सदा ही ब्रह्म
घनीभूत सत् चित् आनंद, नित्य, अक्रिय, अद्वितीय ब्रह्म
नानात्व नहीं कहीं उसमें, है नित्य सदा ही ब्रह्म
एकरस, परिपूर्ण, अनंत, सर्व व्यापक अंतरात्मा
नानात्व नहीं कहीं उसमें, एक ही है वह परम आत्मा
न त्याज्य, न ही ग्राह्य, न किसी में स्थित ब्रह्म
जिसका कोई नहीं आधार, ऐसा एक अद्वितीय ब्रह्म
स्वतः सिद्ध, शुद्द सत्य जो, बोध स्वरूप नित्य है जो
वैभवपूर्ण, परम ब्रह्म वह, अद्वितीय एक है वो
आत्मानुभव का उपदेश
जिनका राग नहीं वस्तु में, अंत हुआ भोग का जिसके
चित्त शांत, इन्द्रियाँ संयत, परम शांत हैं सन्यासी वे
जगो, वत्स ! अज्ञान नींद से, निज सत स्वरूप में जागो
मोह त्याग मुक्त हुए फिर, आत्मा के आनंद को पा लो
प्राप्त समाधि, फिर निश्चल हो, ज्ञान नेत्र से स्वयं को देखो
सुने हुए का अनुभव कर लो, संशय मुक्त हृदय को पा लो
अज्ञान रूप जो बंधन भारी, तज कर प्राप्त करो सुख, ज्ञान
शास्त्र, युक्ति व गुरु वाक्य सँग, अपना अनुभव है प्रमाण
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