Friday, March 4, 2011

इक पल

इक पल

कितनी अद्भुत शक्ति समाये  
अनगिन भीतर भेद छिपाए
देखो, अगला पल आता है !

खो जाये न पकड़ो इसको
मन की डोर से जकड़ो इसको
देखो, पल में यह जाता है !

अनिता निहालानी
४ मार्च २०११

Thursday, March 3, 2011

कोई

कोई

अदेखा, अनजाना कोई
बैठा भीतर, बोल रहा है
उन्हीं मौन से उपजे शब्दों को
कागज पर उकेरती है कलम !

कलम जाहिर है
वह छिपा है
पर छिपकर भी क्या
वही नहीं झलकता
कवियों की वाणी में
चित्रकार के अंकन में
शिल्पी की  कला में !

अदेखे अनजाने हाथ
बिखेरते हैं ओस की बूंदें
बहाते हैं जलधार
रंग जाते हैं आकाश नित नए रंगों से
बिखराते चाँदनी, सुगंध छितराते !

अदेखा, अनजाना कोई
थामता है हाथ
देता अभयदान
युगों से तापसों के ध्यान में आता
ज्ञानियों का ज्ञान वही
  रीत वही भक्ति की
राधा बन श्याम को
प्रीत की आवाज दे
देखो बुलाए वही !

अनिता निहालानी
२ मार्च २०११  



Monday, February 28, 2011

प्रभु, जीवन का राज खोल दो



प्रभु, जीवन का राज खोल दो


प्रभु, भीतर से द्वार खोल दो
सदियों से जो भटक रहे हैं,
उनके मन मंदिर में आकर
उजियाले की आस घोल दो !

यह जग अद्भुत भूल भुलैया
पग-पग पर संकट ने घेरा,
नहीं किसी को मिला मुक्कमल
रात कहीं तो कहीं सवेरा !

प्रभु, जीवन का राज खोल दो
जिसे खोजते आतुर प्राणी,
जिसको ढूँढ रही हैं ऑंखें
कहाँ हो तुम यह बात बोल दो !

बड़ी कठिन माया की माया
पार न कोई इसका पाया,
जोगी, जती, मुनि तक हारे
जप, तप चाहे लाख कमाया !

प्रभु, तुम्हारा नाम मोल दो
यह जग तुमसे ही चलता है
पर हम तुमको ढूँढ न पाए
जो अमोल है ज्ञान तोल दो !

अनिता निहालानी
२८ फरवरी २०११




Friday, February 25, 2011

कौन है वह


कौन है वह

रचे किसने अनंत ब्रह्मांड 
आकाशगंगाएँ, अनगिनत नक्षत्र, सौर मंडल
ग्रह, उपग्रह प्रकटे कहाँ से
इस असीम को कर ससीम
धारे जो भीतर
कौन है वह?

झांकता है कौन मन से
पुलक, चाह, हँसी, गति
क्यों छलके नयन से
कौन जिसको थपकियाँ देती हवा
लोरियाँ प्रकृति सुनाती
गीत गा गा खग जगाते  
कौन वह? किसके लिये
ये चाँद सूरज जगमगाते ?

अनिता निहालानी
२६ फरवरी २०११



नज्म

नज्म

आँखें हँसतीं रहीं लब मचलते रहे
नंगे पावों से राहों पे चलते रहे !

मेरी आहट पे खिलती बहारें हँसीं
फूल शाखों से राहों पे झरते रहे !

मीठी खुशबू मेरे खोये से गाँव की
जिसकी चाहत में आँसू पिघलते रहे !

मन जो रोशन हुआ जग भी रोशन हुआ
कदम बहके मगर फिर सम्भलते रहे !

अनिता निहालानी
२५ फरवरी २०११

Thursday, February 24, 2011

अपेक्षाएँ

अपेक्षाएँ

टूटती हैं अपेक्षाएँ
क्योंकि टूटना ही उनकी नियति है
टूटकर बिखर नहीं जाते क्या बूढ़े सितारे
टूटते हैं महल, टूटते हैं दिल !

पर कौन है ?
जो टूटते हुए देखता है सबकुछ
स्वयं अटूट बन,
रह निरपेक्ष !

घटना घटती है
पर उसका कुछ नहीं घटता
रत्ती भर भी नहीं
घटे भी किससे
और बढ़े भी किसमें ?

जब वही वह व्याप्त है
वहाँ कौन करेगा अपेक्षा
किससे करेगा ?
वहाँ जो है, वैसा ही प्रिय है
तो टूटती रहें अपेक्षाएँ !

अनिता निहालानी
२४ फरवरी २०११

Tuesday, February 22, 2011

अबदल

अबदल

अंतर अकुलाता नहीं अब
गीत उगाता नहीं
तकता है निर्निमेष
पल पल बदलते परिवेश को
भर उठता है कृतज्ञता से
कि वह है अबदल
ध्रुव तारे की तरह अटल !

अनिता निहालानी
२२ फरवरी २०११