Wednesday, April 15, 2026

सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम में ठहरना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तम: सर्ग: 


 सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम पर

जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो

रात में वहीं ठहरना 


सीता, लक्ष्मण व ब्राह्मणों को, लेकर अपने साथ श्री राम 

चल पड़े सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम, तय किया दीर्घ मार्ग अगाध 


कुछ नदियों को पार किया, फिर ऊँचा पर्वत पड़ा दिखायी 

उससे आगे बढ़ते गये, इक्ष्वाकु कुल के दोनों भाई 


अति घोर वन के एकांत में, मुनिवर आश्रम में बैठे थे 

वृक्ष प्रचुर फल-फूल से लदे, इधर-उधर कई चीर टंगे 


श्रीराम ने विधिवत् मुनि को, करके प्रणाम दिया निज परिचय 

श्रीरामचन्द्र  का दर्शन करके, सुतीक्ष्ण मुनि हुए ज्यों धन्य 


आलिंगन में बाँधा उनको, दोनों बाहों से मुनिवर ने 

मैं प्रतीक्षा किया करता था, हुआ सनाथ आश्रम आपसे 


इस पृथ्वी पर देह त्यागकर, इसके कारण गया नहीं मैं 

चित्रकूट पर जब रहते, सुनी थी आपकी गाथा मैंने


देवराज इंद्र ने स्वयं आ, मुझको शुभ लोक प्रदान किए 

उन लोकों में आप विहारें, देता हूँ मैं आपको उन्हें 


जैसे इंद्र से ब्रह्मा बोलें,  राम ने कहे वचन वैसे

प्रदान कराऊँगा आपको, वे सब लोक तो स्वयं ही मैं


इस समय भिन्न अभिलाषा लाया, आप इसे ही पूर्ण करें 

सबके हित में तत्पर मुनि, कहिए, मैं कहाँ रहूँ इस वन में ?


श्रीराम के यह कहने पर, मधुर वाणी में मुनि यह बोले 

यही आश्रम है उत्तम अतीव, यहीं पर आप निवास करें 


फल-मूल उपलब्ध सदा रहें, ऋषिगण आते-जाते रहते 

बिना भय के झुंड मृगों के, शोभा दिखाकर वापस जाते 


थोड़ा सा उपद्रव मृगों का, और नहीं कोई दोष यहाँ 

वचन सुना महर्षि का जब, लेकर धनुष-बाण राम ने कहा 


यदि उपद्रवकारी मृग को, कभी बाण की नोक से मारूँ 

होगा यह अपमान आपका, जिसको मैं कैसे सह पाऊँ 


इसीलिए मैं अधिक समय तक, नहीं रहूँगा इस आश्रम में

इतना कहकर चुप हुए, गये सांध्यकाल उपासना करने 


रात हुई स्वयं सुतीक्ष्ण मुनि, गये उनके हित भोजन लेकर 

पुरुष शिरोमणि भाई  व सीता, तृप्त हुए अन्न वह पाकर 




इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के

अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 


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