श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकादश: सर्ग:
पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन
कुछ काल तक बसे रहे वहाँ, सम्मानित होकर मुनियों से
कहा एक दिन श्रीराम ने, विनीत भाव से मुनि सुतीक्ष्ण से
मैंने सुना है, निकट कहीं पर, मुनि अगस्त्य वास करते हैं
अति विशाल जंगल के कारण, उनके दर्शन नहीं किए हैं
उनका वह आश्रम कहाँ हैं, मनोरथ मेरा उनसे मिलना
सीता और लक्ष्मण सहित, मैं चाहूँ उनके दर्शन पाना
‘स्वयं उनकी सेवा करना चाहूँ’, श्रीराम का वचन सुना
सुतीक्ष्ण मुनि अति हुए प्रसन्न, तब दशरथनंदन से यह कहा
मैं भी यही चाहता था, कि, आप सभी मिलें जाकर उनसे
उसका पता मैं अभी बताता, अगस्त्य मुनि जहाँ हैं रहते
चार योजन दक्षिण में जायें, वहाँ रहते उनके भाई
बहुत सुंदर विशाल आश्रम, पिप्पली वन पड़ेगा दिखाई
धरती वहाँ अति समतल है, बहुतायत है फूलों-फलों की
चक्रवाक, हंस, कारंडव, सरवर में आबादी खगों की
एक रात्रि वहीं बिताकर, प्रातः दक्षिण दिशा को जायें
योजन भर चलने के बाद, मुनि अगस्त्य का आश्रम पाएँ
आश्रम अति ही रमणीक है, घिरा है बहु संख्यक वृक्षों से
सीता व लक्ष्मण के साथ, वहाँ सानंद विचरण आप करें
निश्चय किया है यदि आपने, इसी मार्ग पर बढ़ते जायें
आज ही आरंभ करें गमन, मुनि अगस्त्य के दर्शन पाएँ
मुनि का वचन जब सुना राम ने, भाई सहित प्रणाम किया
सीता तथा उसे संग लेकर, आश्रम से प्रस्थान किया
राह में मिले विचित्र वन कई, पर्वतमाला व नदियाँ भी
हुए देखकर अति सुखी वे, लक्ष्मण को राम ने बात कही
पुण्यकर्म का करते अनुष्ठान, अगस्त्य मुनि के भाई का
सुतीक्ष्ण मुनि के कहे अनुसार, आश्रम यहाँ दिखाई पड़ता
फूलों, फलों के भार से झुक, वृक्ष सहस्रों शोभा पाते
पकी पीपलियों की कटु गंध, संग पवन देव लिए आते
No comments:
Post a Comment