श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
अष्टम: सर्ग:
प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान
सुतीक्ष्ण मुनि से पूजित होकर, भली-भाँति वह रात्रि बितायी
प्रातःकाल समय से उठकर, स्नानादि दिनचर्या निभायी
विधिपूर्वक तीनों ने मिलकर, अग्नि व देवों की पूजा की
सूर्यदेव का दर्शन करके, स्वयं जा मुनिवर से भेंट की
भगवन ! आपने वन्द्य होकर, हम लोगों का किया सत्कार
अब यहाँ से जाना चाहते, करें हमारी विनय स्वीकार
दण्डकारण्य में रहने वाले, मुनियों से मिलना चाहें
तेजस्वी, श्रेष्ठ तापसों संग, जाने की हमें आज्ञा दें
सूर्य प्रचंड नहीं हुए जब तक, उससे पूर्व प्रस्थान करें
ऐसी ही अभिलाषा रखते, राम ने अति मधुर वचन कहे
चरणों का स्पर्श कर रहे थे, उन्हें उठाया सुतीक्ष्ण मुनि ने
लगा ह्रदय से कहा स्नेह से , जायें संग सिया -लक्ष्मण के
मंगलमय हो मार्ग आपका, विघ्न और बाधा मत आयें
पुनीत ह्रदय वाले मुनियों के, आश्रमों के दर्शन पाएँ
सुंदर वन, सरवर, झरने भी, इस मार्ग में अनेक मिलेंगे
झुंड मृगों के, सुंदर पंछी, पंकज आदि पुष्प देखेंगे
हे लक्ष्मण ! तुम भी संग जाओ, किंतु लौट पुन: आओ यहीं
उन दोनों ने की परिक्रमा, अच्छा, कहकर उन मुनिवर की
बड़े नेत्र वाली सीता ने, उनको धनुष-बाण पकड़ाये
बाँध पीठ पर तूणीरों को, धनुष लिए वे बाहर निकले
दोनों वीर अति रूपवान थे, खड्ग और धनुष धारण कर
सीता सहित किया प्रस्थान, पूज्य मुनिवर की आज्ञा लेकर
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ।
No comments:
Post a Comment