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Tuesday, May 3, 2011

जीवन चलते-चलते बीता


जीवन चलते-चलते बीता

थके कदम दो पल सुस्ता लें
कहीं न मिलती छांव,
जीवन चलते-चलते बीता
पाया नहीं पड़ाव !

काल शिकारी घात लगाये
बैठा लेकर दांव,
कब पासा सीधा पड़ जाये
थम जाएँ कब पांव !

क्या खोया क्या पाया हमने
कोई नहीं हिसाब,
जीवन भूलभुलैया या फिर
इक जादुई किताब !

अनिता निहालानी
३ मई २०११
  

Monday, March 14, 2011

जीवन जैसे एक बुलबुला

जीवन जैसे एक बुलबुला


जीवन जैसे एक बुलबुला
या फिर कोई स्वप्न सलोना
छाया हो इक चलती फिरती
किसी कवि की मधुर कल्पना !

ओस बूंद सा क्षणिक है जीवन
विद्युत दमके पल भर को ज्यों
एक ध्वनि घन श्याम रात्रि में
चौंध दामिनी खो जाये ज्यों

जैसे कोई मृग मरीचिका
उड़ता हुआ ख्याल किसी का
छाया हो इक चलती फिरती
किसी कवि की मधुर कल्पना !

अनिता निहालानी
१४ मार्च २०११