Wednesday, August 3, 2011

एकादशोऽध्यायः विश्वरूपदर्शनयोग (शेष भाग)


एकादशोऽध्यायः
विश्वरूपदर्शनयोग (शेष भाग) 

मुखों से अग्निलपटें निकलें, हे केशव ! अनंत यशस्वी  
 सूर्य चन्द्र दो नेत्र तुम्हारे, हो असंख्य भुजा धारी

जल रहा सम्पूर्ण जगत यह, है प्रचंड तेज तुम्हारा
भय से कम्पित हैं लोक सभी, कैसा व्यापक रूप तुम्हारा

देव शरण में हुए आपकी, कुछ प्रवेश करते हैं मुख में
कर जोड़े कर रहे प्रार्थना, सिद्ध महर्षि मग्न स्तुति में

रूद्र, वसु, आदित्य, साध्य गण, यक्ष, असुर गन्धर्व, पितरगण
सिद्ध्देव, अश्विनीकुमार भी, तुम्हें देखते होकर विस्मित

है विकराल रूप आपका, मुखों, उदरों, दाढों वाला
व्याकुल हैं सब लोक देख यह, मैं भी हूँ व्याकुल मन वाला

गगन तक विस्तार तुम्हारा, सर्वव्यापी हे विष्णु ! तुम हो
नेत्र विशाल चमकते अनुपम, हूँ अधीर, व्याकुल लख तुमको

हे देवेश, जगन्निवास, प्रलयाग्नि सम रूप छिपाओ
मोहग्रस्त हुआ मैं जाता, भीषण इन दाढों को हटाओ

भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजागण, पुत्रों सहित धृतराष्ट्र के
इक-इक करके चले जा रहे, मुख में इस विकराल आपके

कुछ योद्धा हमारे भी तो, कर रहे प्रवेश उसी में
चूर्ण हुए जाते हैं सब वे, विकट आपके इन दातों में

जैसे नदियाँ मिले सागर में, योद्धा सब जाते हैं मुखों में
हर दिशा से बढ़ते आते, पतिंगों से जलते लपटों में

प्रज्ज्वलित है सारा ब्रह्मांड यह, है प्रखर तेज तुम्हारा
झुलसाती किरणें फैलाते, अद्भुत भीषण ताप तुम्हारा

हे देवेश ! कृपा कर कहिये, कौन आप हैं उग्र रूप धर
नमन ग्रहण कर हो प्रसन्न तुम, नहीं जानता तुम्हें ईश्वर !

केशव बोले, मैं ही काल हूँ, मैं विनाश हेतु आया हूँ
केवल पांडव शेष रहेंगे, अन्यों का अंत लाया हूँ

युद्ध हेतु तत्पर हो जाओ, यश के भागी बनो हे अर्जुन
मेरे द्वारा मारे जा चुके, निमित्त मात्र बनो तुम अर्जुन 

Monday, August 1, 2011

एकादशोऽध्यायः विश्वरूपदर्शनयोग



एकादशोऽध्यायः
विश्वरूपदर्शनयोग

मुझपर है अनुग्रह तुम्हारा, परम गोपनीय ज्ञान बताया
सुना आध्यात्मिक वचन हे केशव, मेरा घोर अज्ञान मिटाया

कैसे उत्पन होती सृष्टि, प्रलयकाल कैसे आता है
कैसे अविनाशी परमेश्वर, सब संसार रचा जाता है

तुम जैसा कहते हो केशव, ऐसा ही है, यही मानता
ऐश्वर्यशाली रूप तुम्हारा, मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता

हे प्रभु यदि मैं सक्षम हूँ, देख सकूं वह विश्वरूप
कृपा कर हे योगेश्वर !, दिखाएँ वह अविनाशी रूप

देख पार्थ, नाना रूपों को, मेरे अद्भुत ऐश्वर्य को
शत, सहस्त्र विविध वर्णों को, नाना दैवी आकृतियों को

आदित्यों, वसुओं, रुद्रों को, अश्विनीकुमारों व देवों को
पहले कभी न देखा किसी ने, ऐसे अद्भुत कई रूपों को

जो भी तू देखना चाहे, तत्क्षण इस रूप में देख
वर्तमान या भविष्य में, चर अचर सभी को देख

किन्तु इन मृण्मयी आखों से, देख न सकता इस रूप को
दिव्य दृष्टि देता हूँ तुझको, देख मेरे ऐश्वर्य को

निज दिव्य स्वरूप दिखलाया, इतना कहकर योगेश्वर ने
कृष्ण महाशक्तिशाली हैं, संजय बोले धृतराष्ट्र से

मुख अनेक, अनेक नेत्र थे, अद्भुत था दर्शन उसका
दिव्य अस्त्र, दिव्य भूषण थे, दिव्य हार ,वस्त्र धारे था

दिव्य अनोखी सुगंध आ रही, तेजोमय असीम रूप था
चारों ओर व्याप्त था अनुपम, सब ओर ही उसका मुख था

हजार सूर्य साथ उगे हों, उससे तेज प्रकाश था उसका
पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को, एक जगह पर उसने देखा

विस्मित हुआ और रोमांचित, अर्जुन का मन झुका प्रेम से
हाथ जोड़ कर शीश झुकाए, करने लगा प्रार्थना प्रभु से

कमलासीन ब्रह्मा, शिव शंकर, अन्य ऋषिगण और देवता
दिव्य सर्प, विविध जीव भी, सबको तुममें मैंने देखा

हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप,  हस्त, उदर, मुख, नेत्र अनेक
आदि, मध्य, अंत न दिखता, सब ओर फैले तुम एक

हे मुकुटयुक्त, गदाधारी, चक्रपाणि हे प्रकाश पुंज
अग्नि और सूर्य सम प्रज्ज्वलित, नेत्र चुंधियाते हैं देख

परम जानने योग्य आप हैं, परम आश्रय इस सृष्टि के
अव्यय तथा पुराण पुरुष भी, रक्षक हैं आप धर्म के 

Friday, July 29, 2011

दशमोऽध्यायः विभूतियोग (अंतिम भाग)



दशमोऽध्यायः
विभूतियोग (अंतिम भाग)

सर्वभक्षी काल भी मैं हूँ, जन्म सभी का मुझसे जान
कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, क्षमा, धृति भी मान

सामवेद का गीत वृह्त्साम, गायत्री छंदों में हूँ
सब मासों में मार्गशीर्ष हूँ, ऋतुराज वसंत भी हूँ

छलियों में जुआ भी मैं हूँ, तेजवान का तेज है मुझसे
साहस, शौर्य, विजय भी मैं हूँ, सत्व सात्विकों का मुझसे

वासुदेव वृष्णियों में हूँ, अर्जुन वीर पांडवों में
व्यासदेव मुनियों में श्रेष्ठ, शुक्राचार्य हूँ कवियों में

दमन के साधन में दंड हूँ, विजयाकांक्षी की नीति
मैं ही मौन रहस्यों में हूँ , बुद्धिमानों की मैं ही मति

जनक बीज हूँ इस सृष्टि का, मुझसे परे नहीं है कोई
चर-अचर जो भी इस जग में, मेरे सिवा न उसका कोई

अंत नहीं है विभूतियों का, संक्षेप से तुझे कहा
एक अंश मात्र से उपजा है, सौंदर्य इस महा जगत का

जहाँ-जहाँ भी पड़े दिखाई, कांति, सौंदर्य हे अर्जुन !
वहाँ–वहाँ मुझको ही देख, मेरा ही है सभी सृजन

क्या करेगा बहुत जान के, इतना ही तू जान ले पार्थ
मेरे एक अंश में स्थित, योगशक्ति है मेरी अद्भुत 

Thursday, July 28, 2011

दशमोऽध्यायः विभूतियोग (शेष भाग)


दशमोऽध्यायः
विभूतियोग (शेष भाग)

सत्य मानता वचन आपके, जो कुछ आप मुझे हैं कहते
लीलामय स्वरूप आपका. देव, असुर दोनों न जानते

हे भूतेश, जगत्पते, भूतभावन, हे पुरुषोत्तम !
स्वयं ही तुम स्वयं को जानते, देव देव, हे पुरुष परम !

आप स्वयं ही कह सकते हैं, दिव्य विभूतियों का वर्णन
व्याप्त हो रहे जिनके द्वारा, इस अखिल ब्रह्मांड में हर क्षण

कैसे चिंतन करूं आपका, कैसे मैं तुमको जानूँ
किन रूपों में ध्याऊं तुमको, केशव मैं कैसे पाऊँ

निज शक्ति व परम विभूति, सविस्तार मुझे कहिये
तृप्त नहीं होता मन मेरा, सुनकर अमृत वचन तुम्हारे

मुख्य-मुख्य रूपों का वर्णन, सुन मेरे मुख से हे अर्जुन !
है असीम वैभव मेरा, संभव नहीं सुनाना पूर्ण

जो सबके अंतर में बसता, परमात्मा मुझको ही जान
आदि, मध्य, अंत भी मैं हूँ, हे अर्जुन तू मुझको मान

आदित्यों में विष्णु हूँ मैं, सूर्य ज्योतियों में प्रचंड
मरुतों में मरीचि हूँ मैं, नक्षत्रों में पावन चन्द्र

सामवेद वेदों में हूँ मैं, देवताओं का राजा मान
इन्द्रियों में मन हूँ मैं, जीवों में चेतना जान

रुद्रों में शंकर भी मैं हूँ, यक्ष, राक्षसों में कुबेर
वसुओं में अग्निदेव हूँ, पर्वतों में हूँ सुमेरु

पुरोहितों में बृहस्पति हूँ, कार्तिकेय सेनानायकों में
सागर हूँ जलाशयों में, महर्षियों में भृगु भी हूँ मैं

वाणी में ओंकार हूँ, यज्ञों में जप मुझको जान
अचल, अडिग जो भी भू पर, उनमें मुझे हिमालय जान

वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि मैं
गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ, कपिल मुनि सिद्धों में मैं

शस्त्रों में वज्र शस्त्र हूँ, कामधेनु गौओं में जान
संतति उत्पत्ति का हेतु, कामदेव भी मुझको जान

Tuesday, July 26, 2011

दशमोऽध्यायः विभूतियोग


दशमोऽध्यायः
विभूतियोग

अति गोपन ज्ञान यह मेरा, अति प्रभावी है यह वचन
तेरे हित में इसे कहूँगा, तू मेरा अति प्रिय हे अर्जुन !

देव न जानें न ही महर्षि, भेद मेरी उत्पत्ति का
 कैसे जान सकेंगे रहस्य, मैंने ही है उनको सिरजा

मैं हूँ अजन्मा और अनादि, जो नर इसे यथार्थ जानता
ज्ञानवान वह सब भूतों में, सब पापों से तर जाता

बुद्धि, ज्ञान, सम्मोह, क्षमा, सत्य और दम, शम दोनों
सुख-दुःख होना व मिटना, भय, अभय, मुझसे ही दोनों

समता और अहिंसा के गुण, तप, संतोष, दान भी मुझसे
यश, अपयश आदि का कारण, नाना भाव सभी मुझी से

सप्तमहर्षि, सनकादि भी, तथा मनु चौदह भी अर्जुन
मेरे ही संकल्प से उपजे, उनसे ही उपजे सब जन

परम ऐश्वर्य रूप विभूति, योग शक्ति को जो जानता
तत्वज्ञानी वह महापुरुष, भक्तियोग युक्त हो जाता

वासुदेव मैं कारण सबका, क्रियाशील है जग मुझसे  
श्रद्धा भक्ति से युक्त हुए जन, मुझ परमेश्वर को भजते

मन जिनका मुझमें ही लगा है, मुझमें गुणों को अर्पित करते
मेरी भक्ति की चर्चा से, मेरी महिमा से हर्षाते

मेरे ध्यान में मग्न हुए जो, प्रेमपूर्वक मुझको भजते
तत्वज्ञान उनको मैं देता, प्राप्त मुझे ही वे नर होते

उनके अन्तकरण में स्थित, कर कृपा अज्ञान को हरता
ज्ञान का दीपक जला के भीतर, मैं उनको मुक्त कर देता

परम पावन तुम हो केशव, ब्रह्म परम, परम धाम हो
ऋषिगण, आदिदेव कहते हैं, सर्वव्यापी अजन्मा तुमको  

 तुम दिव्य नारद भी कहते, देवल, असित, व्यास की वाणी
हे केशव ! तुम वैसे ही हो, तुमसे भी यही महिमा जानी 

Friday, July 22, 2011

नवमोऽध्यायः राजविद्याराजगुह्ययोग (अंतिम भाग)



नवमोऽध्यायः
राजविद्याराजगुह्ययोग (अंतिम भाग)

श्रद्धायुक्त सकाम भक्त जो, अन्य देवों की पूजा करते
वे भी अंततः मुझे ही पूजें, उचित विधि नहीं अपनाते

मैं ही भोक्ता सर्व यज्ञों का, मैं ही स्वामी हूँ उनका 
वे न जानें परम तत्व को, पुनर्जन्म होता उनका

पितृ पूजक, पितृ लोक को, देव पूजक देव ही पाते
भूतों के भी हैं उपासक, भूतों को ही वे नर पाते

पत्र, पुष्प, जल, फल, कुछ भी, प्रेम से जो अर्पण करता
शुद्ध हृदयी उस भक्त से वह, मैं स्वीकार किया करता

हवन, दान, तप जो भी करे तू, या कोई भी कर्म करे
भोजन रूप में ग्रहण करे जो, सब मेरे अर्पण कर दे

जिसके छोटे-बड़े कर्म सब, प्रभु को अर्पण होते हैं
युक्तचित्तवाले योगी वे, बंधन में न फंसते हैं

में हूँ सब भूतों में व्यापक, प्रिय-अप्रिय कोई न होता  
किन्तु भजे जो प्रेम से मुझको, मैं उसमें वह मुझमें बसता

यदि कोई दुराचारी भी, भक्त हुआ मुझको भजता है
दृढ़ संकल्प किया है जिसने, वह भी साधु बन सकता है

भक्ति से हुआ परिवर्तित, जो धर्म मार्ग पर चल पड़ता
हे अर्जुन, यह अटल सत्य है, मेरा भक्त सुरक्षित रहता

स्त्री, वैश्य, शुद्र, या पापी, चांडाल भी यदि कोई हो
मेरी शरण में जो भी आता, परम गति को प्राप्त हुआ वो

पुण्यशील, राजर्षि, ब्राह्मण, मेरी शरण में जो भी आते
कोई नहीं है संशय इसमें, परम गति वे सब हैं पाते

क्षणभंगुर यह मानव तन है, नित्य निरंतर मुझको भज
मुझमें मनवाला प्रेमी हो, निश्चित प्राप्त मुझे ही कर  

Tuesday, July 19, 2011

नवमोऽध्यायः राजविद्याराजगुह्ययोग (शेष भाग)


नवमोऽध्यायः
राजविद्याराजगुह्ययोग (शेष भाग)

अनभिज्ञ मेरे परम भाव से, मूढ़ मुझे मानव मानें
योगमाया से जन्मा हूँ मैं, इस रहस्य को न जानें

व्यर्थ है आशा, व्यर्थ कर्म है, व्यर्थ ज्ञान धारे हैं जो
मोहित हुए अज्ञानी जन वे, आसुर भाव के मारे हैं जो

कुन्तीपुत्र हे अर्जुन किन्तु, संत सदा ही मुझको भजते
दैवी भाव से भरे हुए वे, आदि कारण अक्षर है कहते

दृढ़ निश्चय उनका है अर्जुन, महिमा मेरी वे गाते
मेरे ध्यान में डूबे प्रेमी, नित्य स्तुतियाँ भी सुनाते

जो दूजे हैं पथिक ज्ञान के, निर्गुण की उपासना करते
अन्य कई जन विविध रूप में, मुझ विराट की पूजा करते

क्रतु हूँ मैं, यज्ञ भी मैं हूँ, स्वधा, औषधि, मंत्र भी मैं
घृत, अग्नि, हवन भी मैं हूँ, हे अर्जुन धाता भी हूँ मैं

फल कर्मों का देने वाला, माता-पिता, पितामह जान
ओंकार भी मैं ही तो हूँ, तीनों वेद मुझे ही मान

परमधाम हूँ, भर्ता भी हूँ, स्वामी भी, आधार सभी का
शरण भी मैं हूँ, सुह्रद अकारण, अविनाशी कारण सबका

शुभाशुभ देखने वाला, हेतु प्रलय का और उत्पत्ति
मुझमें स्थित होती सृष्टि, प्रलय काल में लय भी होती

मैं ही सूर्यरूप से तपता, वारिद मेघों से बरसाता
मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ, सत्-असत् का मैं ही ध्याता

वेदों में जिसका विधान है, ऐसे कर्मों को जो करते
पाप रहित सोमरस पायी, यज्ञों द्वारा स्वर्ग चाहते

स्वर्ग मिला करता है उनको, जब पुण्य क्षीण हो जाते
पुनः-पुनः काम्य को पाकर, मृत्युलोक में वे आते

जो अनन्य प्रेमी जन मुझको, निष्काम हुए से भजते
योग-क्षेम वहन मैं करता, वे निश्चिन्त रहा करते