Tuesday, December 15, 2015

श्रीराम का पिताकी आज्ञा के पालन को ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मण को समझाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकविंशः सर्गः

लक्ष्मण का रोष, उनका श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिए प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिताकी आज्ञा के पालन को ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मण को समझाना 

जैसे कोई गजराज विशाल, अंधकूप में गिर जाये
जलते हुए लुआठों से फिर, लोग उसे पीड़ा पहुँचायें

जल उठता क्रोध से ज्यों वह, राम हुए थे आवेशित
करुण विलाप यह माँ का सुन, दुःख से जो हुईं अचेत

धर्म में स्थित हो दृढ़ता से, धर्मानुकूल तब बात कही
व्याकुल माता व लक्ष्मण से, कह सकते थे यह राम ही

नहीं छिपा है प्रेम तुम्हारा, भाई, क्या तुम्हें नहीं जानता  
समझो तुम मेरा अभिप्राय, माँ के साथ न तुम दो पीड़ा

धर्म पूर्वक जो भी कृत्य, किये गये हैं पूर्वकाल में
जहाँ धर्म हो अर्थ, काम के, फल वहाँ अवश्य मिलते

धर्म, अर्थ, काम की जैसे, तीनों की साधन है भार्या
रह अनुकूल धर्म पालती, पुत्रवती हो अर्थ साधिका

धर्म आदि चारों पुरुषार्थ, जिस कर्म में नहीं समाहित
नहीं करणीय है वह कर्म, धर्म विरुद्ध कर्म है निन्दित

महाराज हमारे पिता, गुरु हैं, राजा और अति माननीय
क्रोध, हर्ष, या काम से प्रेरित, हर आज्ञा उनकी पालनीय

क्रूर नहीं जो आचरण में, कौन पुत्र होगा ऐसा
बात पिता की जो न माने, धर्म आचरण करने वाला

पालन करूंगा आज्ञा उनकी, नहीं मोड़ सकता हूँ मुख मैं
हम दोनों उनकी आज्ञा में, पति, गति, धर्म हैं वे माँ के

जीवित अभी हैं धर्म प्रवर्तक, धर्ममार्ग पर स्थित हैं वे
माँ कैसे साथ चल सकती, मेरे साथ यहाँ से वन में

आज्ञा दो मुझे जाने की, स्वस्ति वाचन भी कराओ
अवधि पूर्ण होने पर मुझको, निज सम्मुख फिर से पाओ

धर्महीन राज्य के हेतु, नहीं त्याग सकता धर्म को
जीवन अल्पकाल ही रहता, कैसे अपनाऊं अधर्म को

इस प्रकार नर श्रेष्ठ राम ने, माता को प्रसन्न किया
भाई को धर्म समझाकर, मन ही मन संकल्प लिया


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ. 

Monday, December 7, 2015

श्रीराम का पिताकी आज्ञा के पालन को ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मण को समझाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकविंशः सर्गः

लक्ष्मण का रोष, उनका श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिए प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिताकी आज्ञा के पालन को ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मण को समझाना 

नर्क तुल्य कष्ट पाओगे, ऐसा होने पर हे पुत्र !
है समान ब्रह्महत्या के, दुखी हुआ पा जिसे समुद्र

देख दुखी मा कौसल्या को, धर्मयुक्त कहे वचन राम ने
चरणों में तुम्हारे झुकता, करना चाहता सुखी तुम्हें मैं 

किन्तु नहीं है शक्ति मुझमें, करूं अवज्ञा मैं पिता की
पालन करने उनकी आज्ञा, जाना चाहता वन को ही

वनवासी विद्वान् कन्डु मुनि, गौ वध अधर्म जानते
पिता वचन के पालन हेतु, यह कर्म भी कर डालते

राजा सगर के पुत्र हुए हैं, अपने ही इस कुल में पहले
पित्राज्ञा से धरा खोदते, बुरी तरह से मारे गये थे

जमदग्नि पुत्र परशुराम ने, पिता की आज्ञा को माना
फरसे से अपनी माता का, वन में गला काट डाला था

इन जैसे और बहुत से, देवतुल्य मानवों ने भी
कर विचार न अन्य कोई, पिता की आज्ञा ही मानी

कायरता को त्याग इसलिए, पिता का हित-साधन करूंगा
नहीं नवीन धर्म यह कोई, पूर्वजों की राह चलूँगा

जो सबके करने योग्य है, वही मैं करने को जाता हूँ
धर्म से भ्रष्ट न कोई होता, कुछ अयोग्य नहीं करता हूँ  

कहकर अपनी माता से यह, लक्ष्मण से यह कहा राम ने
परम स्नेह जो मेरे प्रति है, उसको भी जानता हूँ मैं

हो पराक्रमी, धैर्यवान भी, दुर्धुर्ष तेज का भी है ज्ञान
माँ को है महान दुःख जो, कारण उसका सुनो लक्ष्मण

नहीं जानती अभिप्राय मेरा, सत्य व शम के विषय में
धर्म श्रेष्ठ है संसार में, सत्य प्रतिष्ठित है धर्म में

धर्म आश्रित वचन पिता का, इससे ही परम उत्तम है
प्रतिज्ञा करके पालन की, वचन तोड़ना अति अधम है

पिता के कहने से कैकेयी ने, वन जाने की आज्ञा दी है
नहीं उल्लंघन कर सकता मैं, यही धर्म दृष्टि कहती है

केवल क्षात्र धर्म को माने, ओछी बुद्धि का त्याग करो
त्याग कठोरता हो धर्म आश्रित, मेरे कहे अनुसार चलो

सौहार्द वश कहकर ऐसा, माता को प्रणाम किया
दो आज्ञा वन जाने की, हाथ जोड़कर उन्हें कहा

पूर्वकाल में राजर्षि ययाति, स्वर्ग से भूतल पर आये  
लौट आऊँगा मैं अयोध्या, उसी प्रकार पुनः वन से

स्वस्ति वाचन तुम कराओ, प्राणों की शपथ खा कहता
धरो शोक को अंतर में ही, वनवास से मैं लौटूंगा

पिता की आज्ञा में रहना है, तुम्हें, मुझे, सीता, सबको ही
मन का दुःख मन में दबा लो, रख दो यह अभिषेक सामग्री

धर्मानुकूल सुन बात राम की, व्यग्रता, आकुलता से मुक्त   
देवी कौसल्या होश में आयीं, जैसे पुनः हो जीवित, मृत

जैसे पिता तुम्हारे गुरुजन, वैसे ही तो हूँ मैं भी
वनगमन आज्ञा नहीं देती, क्यों करते हो मुझे दुखी

व्यर्थ है जीवन बिना तुम्हारे, पूजा व अमृत भी व्यर्थ
दो घड़ी भी साथ तुम्हारा, है देने वाला सारे सुख 

Wednesday, December 2, 2015

लक्ष्मण का रोष, उनका श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिए प्रेरित करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकविंशः सर्गः

लक्ष्मण का रोष, उनका श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिए प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिताकी आज्ञा के पालन को ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मण को समझाना

ऐसे जो विलाप करती थी, श्रीराम माता कौसल्या
दुःख से अति व्यथित हो उनको, लक्ष्मण ने यह वचन कहा

नहीं मुझे भाता, बड़ी माँ ! राज्य त्याग जाएँ वन राम
महाराज तो वृद्ध हुए हैं, वश में उन्हें किये है काम

रानी की बातों में आकर, प्रकृति के विपरीत हो गये
कैकेयी से प्रेरित होकर, क्या नहीं वह कह सकते

कोई दोष नहीं राम में, रहना हो इनको वन में
कोई नहीं जगत में ऐसा, दोष बता दे जो इनमें

शत्रु और तिरस्कृत भी हो, नहीं दोष इनमें पा सकता
देव समान शुद्ध, सरल यह, कौन भला परित्याग करेगा

धर्म पर दृष्टि रखने वाला, राजा ऐसा नहीं करेगा
बालभाव को प्राप्त पिता हैं, उनका वचन कौन मानेगा  

हे रघुनन्दन ! जब तक कोई, वनवास की बात न जाने
तब तक आप सम्भाले शासन, मुझे साथ अपने माने

धनुष लिए रक्षा करता मैं, काल समान आप डट जाएँ
कौन समर्थ है अधिक आप से, पौरुष को सहज प्रकटाएँ  

यदि विरोध करेंगे लोग, तीखे बाण सहेंगे मेरे
जो भी भरत के पक्ष में हों, प्राण नहीं उनके बचेंगे

तिरस्कार होता है उनका, कोमल या नम्र होता जो
किस न्याय से लेते राजा, राज्य आपको प्राप्त हुआ जो

यदि बनें हैं पिता भी शत्रु, कैकेयी के उकसाने पर
उचित होगा ममता त्याग, मारें या रखें कैद कर

क्योंकि यदि गुरू भी कोई, हो अभिमानी छोड़े ज्ञान
दण्ड उसे भी दे सकते हैं, जो चल पड़ता है कुमार्ग

भारी बैर बांधकर हमसे, क्या है इनकी शक्ति, दमखम
राज्यलक्ष्मी भरत को दे दें, नहीं यह सम्भव शत्रुदमन !

हे देवी ! शपथ लेता मैं, सत्य, धनुष, दान, यज्ञ की
है अनुराग हार्दिक मेरा, श्रीराम में, बात यह सच्ची

यदि प्रवेश करें अग्नि में, या फिर घोर अरण्य में ये  
इनसे पहले मैं जाऊँगा, हे माँ ! यह विश्वास रखें

आप, राम व सारे लोग, देखें अब पराक्रम मेरा
सारे दुःख दूर कर दूंगा, सूर्य नाश करता ज्यों तम का   

कैकेयी में हो आसक्त, दीन और अविवेकी बने हैं
वह मुझसे मारे जायेंगे, वृद्धावस्था से निन्दित हैं

ओजस्वी ये वचन सुने जब, कौसल्या जो शोकमग्न थी
तुमने सुनी लक्ष्मण वाणी, श्रीराम से वह यह बोली

यदि जंचे तो उसके बाद, जो उचित हो वही करो तुम
जाना नहीं चाहिए तुमको, किन्तु सौत की बातें सुनकर

 धर्मज्ञ ! तुम यदि चाहते, धर्म का ही पालन करना
उत्तम धर्म का कर आचरण, रहकर यहाँ करो सेवा

नियम पूर्वक घर में रहकर, माता की सेवा करते थे
कश्यप उत्तम तप से युक्त हो, स्वर्गलोक चले गये थे

जैसे पूज्य हैं पिता तुम्हारे, वैसे ही हूँ मैं भी तो
देती नहीं आज्ञा तुमको, वन जाने की, मत जाओ

साथ तुम्हारे तिनके खाकर, रहना भी स्वीकार मुझे
किन्तु विलग हो नहीं प्रयोजन, जीवन और किसी सुख से

यदि शोक में डूबी मुझको, त्याग, राम ! वन को जाओगे
कर उपवास प्राण त्यागूँगी, जीवित नहीं मुझे पाओगे


Tuesday, December 1, 2015

कौशल्या का अचेत होकर गिरना और श्रीराम के उठा देने पर उनकी और देखकर विलाप करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

विंश सर्गः

राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी के भवन में जाना और उन्हें अपने वनवास की बात बताना कौशल्या का अचेत होकर गिरना और श्रीराम के उठा देने पर उनकी और देखकर विलाप करना

एक ही शोक सताता उसको, संतान के न होने का
मात्र मानसिक शोक यही, और नहीं कोई दूजा होता  

पति के प्रभुत्व काल में, जयेष्ठ पत्नी जो सुख पाती
नहीं मिला है कभी पूर्व में, सोचा था अब पा लूँगी  

इस आशा में जीती आयी, किन्तु अब भय है भारी
होकर जयेष्ठ भी सौतों से, दुख ही तो पाती आयी

शायद अन्त नहीं इस दुख का, पति से भी सम्मान न मिला
कैकेयी की दासी से भी, कभी अधिक समझा न गया

मेरी सेवा में जो रहता, वह भी उसको नहीं निभाता
कैकेयी के पुत्र को देख, वह भी चुप धारण कर लेता

क्रोधी कैकेयी के मुख को, कैसे देख सकूँगी मैं
कटु वचन जो सदा बोलती, तिरस्कृत रहूँगी मैं

सत्रह वर्ष बीत गये हैं, उपनयन को हुए तुम्हारे
आशा यही लगाये बैठी, दुःख मिट जायेंगे अब सारे

जरावस्था में अब आकर, तिरस्कार नहीं सह सकती
चन्द्र समान तुम्हारे मुख को, देखे बिन नहीं रह सकती

तुम्हें यदि चले जाना है, व्यर्थ ही थे मेरे उपवास
बड़े कष्ट से पालन-पोषण, देवों की पूजा और ध्यान

निश्चय ही है अति कठोर, यह प्रतीत मुझे होता
सुन बिछोह की बात तुम्हारे, हृदय फटा नहीं जाता

वर्षाकाल का नूतन जल जब, जा किनारों से टकराता
फट जाता कगार नदी का, किन्तु नहीं मेरा उर फटता

निश्चय ही यम के भी घर में, नहीं जगह है हित मेरे
सिंह मृगी को ले जाता ज्यों, यम न चाहे प्राण मेरे

लोहे सा कठोर हृदय है, न फटता न टुकड़े होता
निश्चय ही बिना काल के, नहीं मरण किसी का होता

पुत्र के सुख हित जो भी मैंने, व्रत, दान संयम साधे थे  
दुःख की बात अधिक यही है, सारे ही वे व्यर्थ हो गये

ऊसर में बोया ज्यों बीज, निष्फल हुआ है तप वह सारा
हे रघुनन्दन ! बिना तुम्हारे, व्यर्थ ही होगा जीवन मेरा

दुर्बल होने पर भी जैसे, गौ पीछे जाती बछड़े के
उसी तरह मैं साथ तुम्हारे, वन की तरफ चलूँगी मैं

आने वाले दुःख को देख, करें विलाप कौसल्या भारी
बंधन में ज्यों देख पुत्र को, बिलख रही किन्नरी कोई

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.